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गुरुवार, 8 नवंबर 2007

माँ-(मेरा एक महत्वाकांक्षी लेख)-भाग-तीन

मेरे पिछले लेख माँ-(मेरा एक महत्वाकांक्षी लेख)-भाग-प्रथम एवं माँ-(मेरा एक महत्वाकांक्षी लेख)-भाग-द्वित्तीय को जिस तरह से आपने अपना प्यार व स्नेह देकर मुझे उत्साहित किया था, उसी के परिणामस्वरूप मैनें इसके विस्तार करने के लिये कोशिश कर रहा हूँ.
मैं पहले ही कह चुका हूँ कि अगर मेरी कहानी किसी की जिंदगी के करीब हो यां किसी को बुरा लगे भी तो मुझे जरूर लिखे. किसी की भावनाएं आहत करने का मुझे कोई हक नहीं है लेकिन् अगर कोई त्रुटि हो जाये तो क्षमा करना आप बडे लोगों का काम है.
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दीवाली!
आज दीवाली है...... ये सोचकर मन ही मन सुनीता खुश हो रही थी कि उसका बेटा जो दूसरे शहर से आज आ रहा है उसके साथ ही दीवाली मनायेगी.

पर आज उसका बेटा विनय काफ़ी बदला-बदला सा लग रहा था उसने एक दो बार अपने बेटे से पूछने की हिम्मत भी की थी लेकिन उसने टाल दिया कुछ देर के बाद जब उसने विनय को कहा कि बाहर अपने पुराने दोस्तों से मिल आये तो उसने इंकार कर दिया.
अब सुनीता को कुछ संदेह सा हुआ फ़िर भी संयत होकर बेटे को दीवाली पूजन में बैठा ही लिया.बेटे का पूजन में मन नहीं लग रहा था और वो उठकर अपने कमरे में चला गया. आज पहली बार शायद वो अकेला बैठा हुआ था उसके पिता के मरने के बाद उसने अपने बेटे के लिये कोई कमीं नहीं रहने दी थी लेकिन आज!.....
कुछ दिनों के बाद उसका बेटा वापस दूसरे शहर पढ्ने चला गया और पीछे छोड़ गया हजारों सवाल जो उस वक्त सुनीता के मन में कौंध रहे थे.

ठीक एक महीने बाद उसके घर पर फ़ोन की घंटी बजी और फ़ोन सुनते ही सुनीता के पैर काँपने लगे.. मानो धरती अभी फ़ट गयी हो.

आज जो उसे फ़ोन पर पता चला कि उसके बेटे का एक किडनी खराब हो गया था क्योंकि उसे सिगरेट पीने की लत लग चुकी थी.
वो अस्पताल में लेटा हुआ था और जब उसे होश आया तो उसने अपनी माँ के बारे में पूछा. अब उसे अपनी गलती का एहसास हो रहा था लेकिन वो चाहता था कि माँ उसे एक बार माफ़ कर दे लेकिन अब काफ़ी देर हो चुकी थी
उसकी माँ ने इलाज के पैसों के लिये अपनी एक किडनी बेच दी थी और एक किडनी अपने बेटे के लिये दान कर दी थी. अस्पताल के बेड पर सुनीता का चेहरा आसमान की ओर देख रहा था और मानों कह रहा हो कि

आज दीवाली है....

बुधवार, 1 अगस्त 2007

माँ-(मेरा एक महत्वाकांक्षी लेख)-भाग-दो

मेरे पिछले लेख माँ-(मेरा एक महत्वाकांक्षी लेख)-भाग-प्रथम को जिस तरह से आपने अपना प्यार व स्नेह देकर मुझे उत्साहित किया था, उसी के परिणामस्वरूप मैनें इसके विस्तार करने के लिये दूसरी कोशिश कर रहा हूँ.
मैं पहले ही कह चुका हूँ कि अगर मेरी कहानी किसी की जिंदगी के करीब हो यां किसी को बुरा लगे भी तो मुझे जरूर लिखे. किसी की भावनाएं आहत करने का मुझे कोई हक नहीं है लेकिन् अगर कोई त्रुटि हो जाये तो क्षमा करना आप बडे लोगों का काम है.

.....तूने मुझे माँ की गाली दी,साले देख लूंगा तुझे" यह कहकर राकेश गुस्से से ऑफ़िस से बाहर निकल गया. अमित जो उसका मित्र था आज उससे किसी बात पर अनबन होने पर बात गाली-गलौज पर उतर आयी थी. किसी तरह साथी लोगों ने झगडा शान्त करवाया लेकिन राकेश स्वंय को अपमानित महसूस कर रहा था क्योंकि अमित ने उसे माँ की गाली दी थी.

घर पहुचँते ही दरवाजे पर बीमार माँ के चिल्लाने की आवाज आने लगी. बीवी जो अपने रोते हुये बच्चे को मार-मारकर चुप करवा रही थी. ये देखकर राकेश का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया था.

माँ ने चिल्लाते हुये पानी माँगां तो राकेश ने पहले तो अपने आप को गाली दी फ़िर पानी का गिलास भरकर् माँ के हाथ में देते हुये उसको गालियाँ बकने लगा.क्योंकि वो बीमार थी और सारा मल-मूत्र उसे ही साफ़ करना पडता था क्योंकि बीवी मॉडर्न थी और दुनियाँ को दिखाने के लिये माँ की सेवा करना भी जरूरी था.

कुछ समय बीतने के साथ-साथ राकेश भी चिड्चिडा हो गया था क्योंकि वजह थी माँ. एक दिन आधी रात को माँ के कराहनें की आवाज आयी क्योंकि उसको प्यास लगी थी. राकेश ने फ़िर से गालियों की बौछार के साथ माँ को पानी का गिलास देने के लिये कमरे में गया तो माँ दम तोड चुकी थी.

पहले तो वो हतप्रभ हुआ लेकिन जल्दी से जल्दी माँ का क्रियाकर्म करने के लिये उतावला होने लगा. क्योंकि आज उसे तंग करने वाल कोई नहीं था और माँ-बाप की सारी दौलत उसकी हो चली थी.

आज उसे अमित की गाली अम्रत समान लग रही थी

बुधवार, 18 जुलाई 2007

माँ-(मेरा एक महत्वाकांक्षी लेख)-भाग-प्रथम

काफ़ी समय से मैं इस लेख के लिये व्यथित हो रहा था कि कब मैं अपना अनुभव और एक खूबसूरत सच्चाई को किस तरह लिखूं । मैने इस लेख के लिये दिन-रात मेहनत की है,और यह सच्चाई लिखने के समय मेरे हाथ काँप रहे थे क्योंकि जिस विषय पर मैं लिख् रहा था वो एक शब्द ही नहीं वरन् अपने आँचल में पूरा संसार समेटे हुये है।

मैं अपने मन की बात छोटी-छोटी कहानियों के द्वारा प्रस्तुत कर रहा हूँ आशा है आप सभी इस छोटे को प्यार देंगे। अगर कोई बात किसी को बुरी यां अपने से जुडी लगे तो मुझे जरूर लिखे जिससे मेरा लिखा सार्थक हो जायेगा|

तपती दुपहरी में कजरी अपने पसीने की परवाह किये बिना सीमेंट-गारे के तसले को सिर पर उठाये हुये तेजी से सामने वाली बिल्डिंग की ओर बढने लगी कि अचानक उसकी दुधमुँही बच्ची (जो लगभग तीन दिन से भूखी थी) भूख से व्याकुल होकर रोने लगी,उधर ठेकेदार चिल्ला रहा था, कजरी ने आव न देखा ताव एक तमाचा बच्ची को दिया जिससे बच्ची सहमकर चुप हो गयी.....

अभी पिछले साल की ही तो बात है उसका पति कल्लू शराब पी-पीकर चल बसा बस छोड गया तो कजरी और उसके पेट में पल रही उसकी संतान.बेचारी कजरी पर मानो दुख का पहाड टूट पडा, घरवालों ने उसे निकाल दिया तब से वो सडकों पर किसी तरह से भटककर अपना और बेटी का पेट भर रही थी.

.....ठेकेदार ने कजरी को गन्दी-गन्दी गालियाँ देते हुये उसे नीचे से ऊपर तक लालची निगाहों से देखा. इस बात को कजरी ने भाँप लिया लेकिन दिहाडी की खातिर वो चुप थी जैसे-तैसे अपने फ़टे हुये आँचल से अपने आपको ढका और काम पर लग गई. शाम को जब काम खत्म हुआ तो ठेकेदार ने कजरी को दिहाडी देने से मना कर दिया और कहने लगा कि तू ठीक से काम नहीं करती है अगर काम सीखना है तो मेरे साथ चल मैं तुझे सिखाउंगा कि काम कैसे होता है? बेचारी कजरी समझ चुकी थी लेकिन भूख और औलाद के आगे विवश इंसान अंधा हो जाता है। कजरी पीछे-पीछे चल दी और लगभग दो घंटे बाद जब ठेकेदार की कोठरी के बाहर निकली तो हाथों में तो कागज के कुछ टुकडे थे लेकिन चेहरे पर एक उदासीनता थी. वो तेजी से अपनी बच्ची की तरफ़ जाने लगी क्योंकि काफ़ी दिन से बच्ची भूखी थी.

कजरी को उसके रोने की आवाज नही आ रही थी लेकिन शायद उसे लग रहा था कि वो भूख से रो-रोकर सो चुकी होगी.इसीलिये वो तेजी से उस ओर कदम बढाने लगी जहाँ बच्ची सो रही थी। पास पहुँचकर जब कजरी ने देखा कि कुछ कुत्ते उसकी बेटी के आस-पास मंडरा रहे हैं तो वो ठिठक गयी. एक पत्थर उठाकर जब कुत्तों को भगाकर देखा तो उसके हाथ से उसकी मेहनत से कमाये हुये रूपये छिटक गये क्योंकि बच्ची ने भूख से दम तोड् दिया था |