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बुधवार, 28 जनवरी 2009

मेरा देश : गली,मोहल्ले, कॉलोनी और सोसाइटी और अब टाउनशिप की वैराइटी वाला गणतंत्र दिवस कैसे मनाया जाता है? आइये जानें

पहला सीन - एक तंग गली में कुछ बच्चे जो मैले कुचैले फ़टेहाल कपड़ों में कचरा बीन रहे हैं,कुछ सुअर साथ दे रहे हैं और कुछ कुत्ते उनकी पहचान को सार्थक बना रहे हैं.
इस गली के आखिरी छोर पर एक लड़की भीख मांगने का नाटक करते हुये अपने जिस्म के खरीददार को खोज रही है तो सामने से ही उसका नशेड़ी बाप उसे गालियाँ देते-देते नाली की कीचड़ में सरोबार होकर उसी में लोटपोट है

दूसरा सीन- मोहल्ले में आज दो औरतें रोज की तरह एक दूसरे को गालियां दे रही हैं, तो वहीं कुछ बच्चे कंचे और गिल्ली डंडे में व्यस्त हैं, अल्हड़ लड़कियाँ जानबूझकर छत पर बाल सुखाने को चली आयी हैं और उन्ही को देखने मोहल्ले के "नामी" नौजवान अपनी बाइक और किसी न किसी बहाने से इन घरों में तांक-झांक कर रहे

तीसरा सीन- शहर की पॉश कॉलोनी में आज सुबह से ही हलचल है....
कुछ पढे-लोखे बुजुर्गों ने सांस्क्रतिक कार्यक्रम आयोजित किये हैं जिसमें क्षेत्र के ही किसी छुटभैये नेता(गुंडे) को बतौर चीफ़ गैस्ट बुलाया गया है...
बच्चे जो अपनी-अपनी मम्मियों के साथ आये हैं और मन मारकर ह्रितिक-रोशन और राखी सावंत के आइटम नम्बरों पर पैर पटक-पटक कर स्टेज को तोड़े जा रहे हें

इन सबके बीच लड़कियां अपने-अपने मोबाइल फ़ोन्स पर अपने-अपने ब्वाय-फ़्रेंडस के साथ बातों में मशगूल हैं, किसी का मॉल तो किसी का पिक्चर देखने का प्रोग्राम फ़िट हो चला है

अब बारी सोसाइटी की ये सीन बिल्कुल ही डिफ़रेंट हैं इस लिये इसे कोई क्रम नहीं दे सकता-- तो सीन इस प्रकार है कि आज सोसाइटी की महिलाओं की किटी पार्टी है जिसमें आज फ़लां श्रीमती ने आयोजित किया है, कारण चाहे जो कोई भी हो आज गणतंत्र दिवस और अपने सारे पड़ोसियों को अपनी नयी ज्वैलरी और नया फ़र्नीचर जो दिखान है....
हाँ शाम को एक अनाथालय में जाकर कुछ फ़टे कपड़े दान देते हुये अपनी महिला संगठन का अखबार में महिमा-मंडन सहित चित्र छपवाना है

क्या कहा बच्चे और लड़कियां?
बच्चे तो अपने-अपने स्कूल में गये हैं मजबूरीवश लेकिन लड़कियों के लिये सोसाइटी के बाहर काले रंग के शीशे ऊपर किये हुये चमचमाती कारें इंतजार कर रही हैं,


इन सबके बीच शहर के बाहर बनी टाउनशिप में एकांत का वातावरण है इन सबमें गली-मोहल्ले-कॉलोनी-सोसाइटी से पटायी,बहलायी,फ़ुसलायी,मजबूरी मे बुलायी गयी लड़कियां अपने-अपने जोड़ीदारों के साथ गणतंत्र-दिवस को इंज्वाय कर रहे हैं,और इनके जोड़ीदार वो पति-लड़्के हैं जो अपने-अपने गली-मोहल्ले-कॉलोनी और सोसाइटियों से अपने घरवालों-पत्नियों से दूर हैं

बुधवार, 5 नवंबर 2008

मेरा देश प्यासा है और आप गंगाजल को बचाने में लगे हुये हैं

ये सवाल मैं नहीं आज लगभग देश का हर नागरिक सोच रहा है क्या वाकई में गंगा को बचाने के लिये देश के प्रधानमंत्री इस कमेटी के अध्यक्ष होंगे ? अगर जवाब हाँ है तो उनके कार्यकाल के बाद क्या अगले प्रधानमंत्री को ये सब कार्य करने की सुध रहेगी ? क्या राज्यों के मुख्य मंत्री गंगा बचाने की मुहिम में अपने लिये गंगा का अधिकांश जल मांग उठे तो...?

और तो और गंगा नदी तो एक अविरल धारा है लेकिन लुप्त होती नदियों के बारे में क्या होगा ? क्या दिल्ली में मेट्रो रेल के अध्यक्ष श्रीधरन जी यमुना को नाला बनाकर छोड़ देंगें ? क्या ब्रहमपुत्र नदी के अस्तित्व को चीन जैसे देशों से खतरा है?

ये तो कुछ सवाल हैं जो मेरे जेहन में हैं लेकिन क्या देश की इन नदियों के बारे में हमारे देश के प्रधानमंत्री जी को भी चिंता है जो इस लिस्ट में दी हुयी है ?

अरे अभी जाइये मत! आगे भी सुनिये... क्या आपके आसपास बढते वैश्वीकरण से आपको क्या नुकसान हो रहा है तो देख लीजिये कहीं आपके आस-पास किसी बिल्डर नें किसी तालाब यां पोखर को मल्टीस्टोरी बिल्डिंग में तो नहीं बदल दिया ? यां आपके शहर की नदियों से बालू उत्खनन तो नहीं हो रहा है ? जवाब यदि हाँ है तो आपका शहर और नदी दोनों खतरे में है.

पहले वाटर लेवल 70-80 फ़ुट था अब 250-300 फ़ुट हो गया है ? सरकारी नल के पीने के पानी में बदबू आ रही है नि:सन्देह वो पानी शहर के नालों को साफ़ करके पिलाया जा रहा है.
अब आगे की एक और कहानी विदर्भ और बुन्देलखंड में जाकर देख सकते हैं, बाकी हमारे देश के प्रधानमंत्री और उनकी सलाहकार कमेटी को जो दिखायी देता है वो सरमाथे पर !

बुधवार, 5 मार्च 2008

क्या ओरकुट (orkut) और और सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स भविष्य का सबसे बड़ा खतरा हैं यां कुछ और?


आज अचानक बैठे-बैठे टेलीफ़ोन डायरेक्ट्री उठाकर उसके पन्ने पलट रहा था कि अचानक एक बात दिमाग में कौंधी कि क्या वर्तमान में दुनिया की सबसे बड़ी डायरेक्ट्री ओरकुट है?

सोचते हुये थोड़ा डर सा लगा और मन में सिहरन सी दौड़ गयी कि वाकई में ओरकुट हमारी निजता में कितनी दखलंदाजी कर चुका है इसका भान शायद पूरे विश्व को भविष्य में ही होगा.

शायद गूगल ओर्कुट के बहाने अपने प्रचार-प्रसार और भविष्य की भावी योजनाओं को बेचने की जुगत लगा रहा हो लेकिन ये किसी भी प्रकार से किसी भी व्यक्ति की जिंदगी में बिना इजाजत की दखलंदाजी ही है जो शायद कानून के दायरे से बाहर है

लगभग लाखों-करोड़ों यूजर्स ने सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों पर अपना भरोसा जताते हुये अपनी व्यक्तिगत और पारिवारिक सूचनाओं को ऑनलाइन किया है, लेकिन क्या ये सही है ! ये कोई भी नहीं जानता.

लेकिन इसका भविष्य अगर नकारात्मक रूप में लिया जाये तो ये इन वेबसाइटों का सबसे खतरनाक पहलू भी हो सकता है, इसका असर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से हमें दिखायी भी दे रहा है...कहीं बच्चे सामूहिक मौत का खेल खेलने में लगे हैं तो कही कोई किसी के प्रोफ़ाइल से उसके बारे में गोपनीय सूचनायें इकट्ठी कर के उसके अपहरण और हत्या की साजिश रचता है

कभी कहीं सामुदायिक कम्यूनिटी बनायी जा रही है जो हर तरह के अप्राक्रतिक क्रत्यों का मुख्य स्थान हैं तो कहीं ये किसी आतंकवादी गतिविधि का भी केंद्र बनते जा रहे हैं.
बात खत्म कर रहा हूँ लेकिन समस्या खत्म होने का नाम नहीं ले रही बल्कि ये शायद विकराल रूप भी ले सकती है अगर इन वेबसाइटों पर अंकुश न लगाया गया तो....

शनिवार, 1 मार्च 2008

सभी ब्लॉगर्स मित्र ध्यान दें

आज शास्त्री जी के ककनमठ के बारे में लेख पढकर मन में फ़िर से अपने मातृभूमि ब्लॉग को जीवित रखने की इच्छा जाग्रत हुई है ये ब्लॉग केवल हिन्दी विकिपीडिया और देश के लिये समर्पित है, अतः इस ब्लॉग के लिये कोई भी सदस्य बन सकता है क्योंकि ये भले ही सामुदायिक(कम्यूनिटी ब्लॉग) है लेकिन इसमें किसी के भी हित के साथ अन्याय नहीं किया जायेगा! बल्कि सभी लोग इस ब्लॉग में वो जान्कारियां जुटायेंगे जो न पहले कभी सुनी न कभी पहले देखी.

तो फ़िर देर किस बात की मैं बस आपसे एक ई-मेल की दूरी पर हूँ जितने चाहे सदस्य बनें, मैं आपको आमंत्रित करता हूँ.

अगर आपके पास अपने शहर के बारे में जानकारी है तो आप इसमें लिख सकते हैं.

इसमें लिखने के लिये निम्न बातें आप जुटा सकते हैं जैसेः-- इतिहास,भाषा,रहन-सहन,पर्यटन,वर्तमान और औधोगिक जानकारियां भी हो सकती हैं.

तीन बातें जो इस ब्लॉग के लिये समर्पित हैं

1. हिट और आंकड़ों से इसे दूर रखा जायेगा
2. बेकार के वाद-विवाद को तो न कभी प्रकाशित किया जायेगा और न ही उसे कोई रूप दिया जायेगा, और कभी ऐसा हो भी जाता है तो उसे सभी साथियों द्वारा निपटाया जायेगा
3. इसके सारे लेख हिन्दी विकिपीडिया में साथ-साथ प्रकाशित करने की भी कोशिश की जायेगी जिससे विश्व को हिन्दी और भारत देश के बारे में जानने का मौका मिलेगा

नोटः चिट्ठाजगत,नारद,ब्लौगवाणी,हिन्दीब्लौग्स आदि के मुख्य कर्ता-धर्ताओं को इस ब्लॉग को अपने एग्रीग्रेटरों मे शामिल करने के लिये मैं फ़िर से आग्रह करता हूं?

अतः निवेदन स्वीकार किया जाये

आपका
कमलेश मदान

बुधवार, 27 फ़रवरी 2008

मार्लबोरो लाइट (Marlboro Light)

मार्लबोरो लाइट- ये कहानी है एक ऐसी पीढी की जिसने .आधुनिकता की अंधी दौड़ में खुद को पीछे कितना धकेल दिया है, ये कहानी है एक ऐसी लड़की की जिसने अपना चेहरा कितनी बार बदला और हर बार उसका चेहरा पहले से ज्यादा बदसूरत होता चला गया.

आज अपने ऑफ़िस के बाहर एक छोटी सी अच्छी खासी दुकान पर चाय -नाश्ता करने गया तो कुछ ही देर में एक जींस टी-शर्ट पहने एक लड़की प्रकट हुयी,आँखों पर बड़ा सा साठ के दशक का चश्मा चढाये हुये, बड़े ही इत्मीनान से बोलती है "फ़ोर मार्लबोरो लाइट प्लीज".


बस यहीं से कहानी बनाने का आइडिया मिला.......


नोट: ये कहानी लड़कियों और युवा वर्ग में बढते नशे और डिप्रेशन के फ़लस्वरूप लिखी गयी है, इसके पात्र और घटनायें काल्पनिक है अतः कोई भी वाद-विवाद और इस कहानी को अन्यथा ना ले!


अब कहानी की ओर चलें

अनन्या! हाँ उसका नाम अनन्या ही था, पैदा हुयी थी तो माँ-बाप को तो जैसे सारी खुशियाँ एक साथ मिल गयीं थीं, सबकी आँखों का तारा थी वो
उसकी हर फ़रमाइश,हर इच्छा पलक झपकते ही पूरी हो जाती थी.
कुछ बड़ी हुयी तो बोर्डिंग स्कूल भेज दिया गया, बस यहीं से उसकी जिंदगी में दोहराव आने लगा, खालीपन उसकी जिंदगी को एक अनजानी दिशा की ओर धकेल रहा था.
जिंदगी में बदलाव,लोगों के प्रति नजरिया,शारीरिक बनावट और बढती उम्र उसे और भी उलझन में डाले हुये थे, समझ नहीं आता था कि अब क्या करे-क्या न करे?
जैसे तैसे बोर्डिंग से पीछा छुड़ाकर कॉलेज में दाखिला लिया था, पर यहां भी अकेलापन उसका पीछा कर रहा था लेकिन अब उसको उन बातों से लड़ने की शक्ति और समझ आ चुकी थी, दोस्तों की संगत में सिगरेट और शराब उसको अच्छे लगने लगे थे.
सोचती थी जिंदगी के मजे नहीं लूटे तो क्या किया?बस! यही सोच उसे और कमजोर करने लगी,

बात-बात पर चिड़चिड़ापन,मानसिक थकान,लड़ाई झगड़े उसकी पहचान बन चुके थे,भ्रम में थी कि दुनियां से टक्कर लेना कितना आसान है,
कॉलेज के बिगड़े रईसों के ग्रुप की शान थी वो, इसी दौरान जिंदगी के सारे अनछुये पहलुओं को जान गयी थी, अब अनन्या बड़ी हो गयी थी यां ये कह सकते हैं कि "यूथ" लेबल वाली हो गयी थी.

अपने अतीत को तो उसने शायद अपने कपड़ों जैसे चिंदी-चिंदी कर रखा था बस बचा था एक नाम जो उसके माँ-बाप ने बड़ी हसरतों से उसे दिया था.

अभी कल ही की तो बात है एक डिस्को में रेव-पार्टी के दौरान पुलिस के छापे में उसका भी नाम शहर के अखबार में आया था काफ़ी (बद)नाम हुयी थी माँ-बाप ने तो घर से निकाल दिया, लेकिन उसको तो मानों कानों में जूँ तक नहीं रेंगी.

कुछ समय बाद अखबार के एक कोने में एक फ़ोटो दिखायी देता है और साथ में उसके बारें में भी लिखा है कि एक लड़की ने बिल्डिंग के सातवें फ़्लोर से कूदकर आत्म-हत्या कर ली है, मरने का कारण नशीली गोलियों का सेवन बताया गया था लेकिन सुसाइड नोट में उसने लिखा था कि "मैं आजाद होना चाहती हूँ"


वो अनन्या ही थी!.............. अब वो आजाद थी!

शुक्रवार, 22 फ़रवरी 2008

क्या स्त्रियां हीं स्त्रियों की दुश्मन होती हैं यां कुछ और?

ये पोस्ट लिखते समय मैने बहुत सी बातें आगे रखी जो मेरे निजी अनुभव और काफ़ी कुछ इन दिनों चल रही बहस के कारण म्रे दिमाग में घूम रहीं थीं....

मेरी बेटी जो केवल सवा साल की है अभी-अभी चलना ही सीख रही है, आज उसके साथ मैने एक अनुभव सीखा जो मुझे काफ़ी अन्दर तक कचोटता रहा..

हुआ ये कि मेरी बेटी आज चलते-चलते हँस रही थी और मैने अपनी पत्नी जी से कहा कि उसे काला टीका लगा दो ताकि किसी की नजर ना लग जाये!उस पर मेरी पत्नी ने जवाब दिया कि "काला टीका केवल लड़को को ही लगाते है लड़कियों को नहीं लगाते",

ये बात मेरे दिल में गहरे से चुभ गयी क्योंकि आज के जमाने में ऐसी दकियानूसी बातें वो भी किसी माँ और किसी शिक्षित औरत के मुँह से सुनकर शर्म सी आने लगी क्योंकि जो औरते अभी भी अपने आपको इस समाज में ढाल नहीं पायी हैं वो जी कैसे रहीं हैं? बात मेरी पत्नी की नहीं है बल्कि उन तमाम औरतों की है जो इस निर्गुण को अपनी ही बेटियों में सीख के रूप में देती हैं कि " बेटा मर्दों की बराबरी कभी न करना, अपने पति की बात को नीचा नहीं होने देना,चुपचाप एक कोने में पड़ी रहना-दुख हो तो रो लेना लेकिन अपने घर-ससुराल की इज्जत बनाये रखना"आदि

बचपन से ही बेटों और बेटियों के लिये अलग-अलग खिलौने,पसंद,कपड़े,पहचान ये सब किसी हद तक एक बेटी को उसके लड़की होने का एहसास करवाते रहते हैं

बेटियां जब बड़ी होने लगती हैं तो शर्म और संकोच के कारण अपने शारीरिक विकास की बात केवल अपनी माँ के समक्ष ही रखती है और माएं अक्सर उन्हें कई प्रकार की उलझनों में डाले रखती हैं जिससे वो आगे भी किसी मर्द पर भरोसा नहीं कर सकती है शायद उसे अपने स्त्री होना अपराधबोध लगने लगता है

दूसरी बात हर बाप अपनी बेटियों की परेशानी को जानते हुए भी जेन्डर-गैप के कारण अपनी बेटी का मित्र नहीं बन सकता क्योंकि समाज में ये सब बुरा है लेकिन वो चुपचाप अपनी बेटी-पत्नी की पीड़ा को देखता रहता है लेकिन मुहँ से कुछ नहीं कह सकता क्योंकि कुछ मर्द होने का अभिमान और कुछ सामजिक बंधन उसे उस चक्रव्यूह में डाले रखते हैं जिससे वो उस धर्म को निभाने में पीछे हट जाता है.

अब इस बात को समझना ही काफ़ी मुश्किल होता जा रहा है कि हम किसे दोष दें? क्या इस सामाजिक सिस्टम यां किसी माँ द्वारा किसी बेटी को दी गयी नसीहत को?

मंगलवार, 5 फ़रवरी 2008

लो! अब यहाँ भी राजनीति की बू आने लगी

मेरे सभी भड़ासी,मोहल्लेवालों,हिन्दी चिट्ठाकारों, रचनाकारों,ब्लॉगर भाईयों को मैं ये संदेश देना चाहता हूँ कि कुछ अराजकता अब हमारे चिट्ठासमुदाय में भी फ़ैल रही है, क्या आप उस विरोध के स्वरों को दबानें में मेरी मदद करेंगें?

बेनामी ने कहा…

भईया थोड़ा संतुलन बना कर लिखना चाहिये ना… बाल ठाकरे का प्रश्न आज भी अनुत्तरित है कि "यदि बिहारी इतने ही मेहनती, ईमानदार, कर्मठ हैं तो ये सारी बातें वे बिहार में क्यों नहीं लगाते" या शायद बिहार को उन्होंने शहाबुद्दीनों के हवाले कर दिया है? पटना को मुम्बई नहीं बना सकते तो कम से कम मुम्बई को पटना तो मत बनाओ भाई.



मेरी कल की पोस्ट आमची मुम्बई! एक दुःस्वप्न पर एक बेनामी भाई ने सीधे बिहार और उत्तर भारतीयों को खुल्लम-खुल्ला कह दिया है कि उन लोगों को अपने ही प्रदेश में काम करना चाहिये, अब भाई कोई इनको कौन समझायेगा कि मुम्बई इन भाई साहब और राज ठाकरे जैसे छुटभैये नेताओं की बपौती नहीं है जो आप किसी को भी महाराष्ट्र से बेदखल कर दोगे, अरे भाई क्या भारत में रहने के लिये मुम्बई ही मिला है हमको? अगर हमने पलायन करना शुरू कर दिया ना तो खाने लाले ना पड़ जायें तो हमको उत्तर भारतीय कहना.

माना कि हमें अपने ही प्रदेशों में काम नहीं लेकिन हम अपनी सरकारों के कारण ऐसे हैं शहाबुद्दीन जैसे कीड़े तो इसी सरकारों की उपज हैं जो हमेशा धरती को खोखला करते रहते हैं, लेकिन उससे भी घटिया सोच आपने पाल रखी है जो हम उत्तर भारतीयों को नसीहत देकर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं.
अगर इतना ही दम है आपकी बातों में तो सामने आकर बात करनी थी ना कि उन चन्द बीमार मानसिकता वाले लोगों की तरह छिपते-छिपाते फ़िर रहे हो बेचारे टैक्सी-रिक्शा और नौकरीपेशा लोगों को अपना निशाना बना रहे हैं.

सबसे बड़ी बात ये है कि आपने उत्तर भारतीयों की सहनशीलता को ललकारा है जो कदापि शायद किसी को मंजूर होगी क्योंकि हम लोग आप लोगों की तरह गिरी हुई मानसिकता वाले नहीं हैं जो आपने अभी-अभी पूरे देश को दिखायी है.

सोमवार, 4 फ़रवरी 2008

आमची मुम्बई! एक दुःस्वप्न

तो अब नाम मिटाने की बारी अब मुम्बई वालों ने सम्हाल ली है, अब उत्तर भारत को भगाने की तैयारी कर रहा मुम्बई दिल्ली से चार कदम आगे निकल चुका है जहाँ ये सब बातें अभी हो ही रही हैं.

मैने पिछले लेख राजधानी में बिहारी में भी बताया था कि किस तरह की मानसिकता इन महानगरीय लोगों नें पाल रखी है, जिसमें वो सिर्फ़ अपने स्वार्थ को आगे रखकर बल्कि इनके चुप रहने के गुण को अपना हथियार बनाकर इनका शोषण कर रहे हैं.

वो ये नहीं भूल पाते हैं कि वो खुद कमाकर खा नहीं सकते और कोई दूसरा आकर कमा ले तो इनको जलन होती है,
वो ये भूल जाते हैं कि जिस मुम्बई पर उन्हें इतना गर्व है वो हम उत्तर भारतीयों की ही मेहनत और इमानदारी की देन है.

अभी एक-आध साल पहले सोनू निगम ने एक गीत गाया था कि "ईश्वर अल्लाह तेरो नाम, मुम्बई देता सबको काम"
कहाँ हैं वो ईश्वर अल्लाह, कहाँ हैं वो मुम्बई जो किसी के लिये भी बाहें खोले खड़ी रहती है?

"मुम्बई स्पिरिट" ये शब्द शायद मुम्बई का ही दिया हुआ है जिसके बारे में कहा जाता है कि ये शब्द नहीं बल्कि पूरे देश की छवि इसमें दिखायी देती है.कैसी स्पिरिट मुझे तो कहीं दिखायी नहीं देती!

एक बार देखा था और अब घबरा रहा हूँ कि मुम्बई मैं उत्तरांचल नगर और बिहारी टेकरी जैसे अधिक घनत्व वाले इलाके हैं जहाँ उत्तर भारतीयों की संख्या दो-ढाई करोड़ के ऊपर है अब ये ही सोचकर डर लग रहा है कि वो कहाँ जायेंगें?

कुल मिलाकर इन नेताओं को आये दिन देश को आग में धकेलने और उस पर सियासी रोटियां सेकनें में जो मजा आता है वो शायद इस देश को पीछे धकेलने में सहायक हो सकती है क्योंकि धीरे-धीरे देश उन्नति करता है और एक तेज धक्का उसे हर बार पीछे धकेल देता है,

गोधरा,अयोध्या,गुजरात,हैदराबाद और अब मुम्बई ये सब काफ़ी हैं जिनसे हुये जख्मों से रिसता इस देश का खून रूक तो नहीं रहा लेकिन घाव और गहरे होते जा रहे हैं.

गुरुवार, 31 जनवरी 2008

दीप्ति जी क्या केवल किसी महिला से उसके विचार पूछने से ही आप शान्त हो जायेंगी?

दीप्ति जी क्या केवल किसी महिला से उसके विचार पूछने से ही आप शान्त हो जायेंगी? क्या ये चापलूसी नहीं है? क्यों आप खुद को इतना असहज महसूस कर रहीं हैं क्या राजधानी दिल्ली के बाहर कोई और आपका देश नहीं है? मैने देखा है.......

मैने देखा है अभी पिछले महीने आगरा से भोपाल जाते वक्त एक महिला किसी खास स्टेशन से चढती है और आगे जाकर पन्द्रह-बीस मिनट के बाद किसी छोटे से गाँव सरीखे स्टेशन पर चैन स्नैचिंग करती है, उसकी हिम्मत की अभी मैं मन ही मन दाद दे रहा था कि करीब ढाई-तीन सौ महिलाओं-लड़कियों का दल पलक झपकते ही रेलगाड़ी में चढ गया पूछने पर पता चला कि उस स्टेशन पर वो गाड़ी नहीं रूकती है इसलिये उन मोहतरमा ने पिछले स्टेशन से चढकर गाड़ी रूकवाना ठीक समझा. ये सब आंगनबाढी योजना के तहत काम करती हैं इनमे से अधिकांशतः महिलायें टीचर थी कई घरेलू औरते थी तो लगभग सभी अपने-अपने रोजगार चला रहीं हैं


अभी आगे... मुम्बई गया वहाँ जिन्दगी को सबसे करीब से देखा, देखा कि शाम के धुंधलके में लड़कियों की कतारें हैं, मुझे कुछ समझ नहीं आया लेकिन मेरे मित्र ने बताया कि ये लड़कियां वेश्याव्रत्ति करती हैं, मैने कारण भी पूछा तो जवाब आया जो काफ़ी अजीब सा भी लगा और वाजिब भी कि ये लड़कियां अपनी इस हालत के लिये खुद ही जिम्मेदार हैं, कोई हीरोइन बनने के चक्कर में तो कोई किसी के धोखे में मारी गयी है, किसी के घर की ये इकलौती कमाने वाली होती है तो किसी को ये कमाने का सबसे आसान तरीक लगता है. सौ-दौ सौ रूपयों के लिये अपने शरीर को बेचती ये महानगरीय लड़कियां! क्या इन के लिये छोटे शहर और काम की कमी रह गयी है.यां इनका आत्मविश्वास इतना सीमित है कि वो अपने वजूद को नहीं पहचान सकती? क्या उन्हें अब भी किसी से झूठी प्रशंसा के बोल सुनने की जरूरत महसूस होती जो इन शरीर से खेलने के लिये कही गयीं हों?

और हाँ मुद्दा आप को लग रहा है हम पुरूषों को ये समस्या लगती है, क्योंकि हमारे भी परिवार हैं, हमारे यहाँ भी आप जैसी बहन बेटियां हैं क्या हम उनको उनके पहनावे के लिये नहीं कहते? जी कहते हैं, उनकी समस्याऐं सुनते हैं उनसे शेयर करते हैं लेकिन स्त्री गुण होने के कारण वो आज भी बाहरी और घर के पुरूषों से दस गज फ़ासला रखती हैं, क्या हमने मना किया है नहीं ना! लेकिन वो जानती हैं कि उनका नैतिक कर्तव्य क्या है,स्त्री होना इस दुनियां का सबसे पवित्र धर्म है और इस धर्म को बचाये रखने में स्त्री और पुरूष दोनों का परम कर्तव्य है।
कोई स्त्री यां पुरूष खराब नहीं होती बस खराब होती है तो उसकी सोच और उसका नजरिया जिसे चाहकर भी कोई बदल नहीं सकता क्योंकि अगर कोई स्त्री सोचेगी कि हर पुरूष बलात्कारी है तो वो उसकी गलती है और अगर कोई पुरूष सोचता है कि हर स्त्री वेश्या है तो वो उसकी गलती है.

बस!

अब अगर बहस जारी रहती है तो शायद मुझे लगेगा कि अब बात को रबड़ की तरह खींचा जा रहा है.

कमलेश मदान

सोमवार, 28 जनवरी 2008

मेरे ब्लॉगर मित्रों की पोस्ट और शायद उसका अनुचित कारण ये भी हो सकता है.....

जनवरी के पहले ही दिन से काफ़ी सार्थक बहस,चिंतन,चर्चाएं और विवादास्पद लेखों ने जन्म लिया जो केवल नारी-लड़कियों और समाज में बढते खुलेपन और शर्मनाक परिस्थियों के ऊपर केंद्रित हैं......

पहले-पहल भड़ास ने नववर्ष की पूर्व संध्या पर हुयी घटना पर चिंतन और आक्रोश व्यक्त किया जो जायज है, भड़ास का ये रूप भी काफ़ी प्रशंसनीय है,उसके लेख जो क्रमवार प्रकाशित हुये वो ये हैं.......
लड़कियों यदि तुम घर से बाहर निकली तो तुम्‍हारे साथ भी यही होगा
भारत मे नारी का अपमान
हम भारतीय शायद ही कभी जिम्मेवार माता-पिता रहे हो ?

अब उसके बाद जीतू भाई ने भी प्रतिक्रिया स्वरूप एक पोस्ट लिखी जो इसी घटना के ऊपर सचित्र है,जागो मुम्बईकर, ढूंढ निकालो इन दरिंदो को

अभी ये थमा ही नहीं था कि शिवकुमार जी ने एक नया सार्थक मंच बनाकर इस बहस को आगे बढाया जो सराहनीय कदम बना,रीढ़हीन समाज निकम्मी सरकार और उससे भी निकम्मी पुलिस डिजर्व करता है नाम से प्रकाशित ब्लॉग चर्चा में काफ़ी रहा.इस बात की चर्चा टिप्पणीकार ने भी एक पोस्ट में की जो इस चर्चा को आगे बढाने के लिये काफ़ी था.ऐसे-वैसे वस्त्र पहनने या न पहनने वाली स्त्रियों लड़कियों का बलात्कार करना मैन्डेटरी है ये शब्द इस पोस्ट को घातक बनाने के लिये काफ़ी थे.

अब बारी थी एक नारी यानी ममता जी की, उन्होने बदलती मानसिकता के ऊपर जो प्रश्न किया वो काफ़ी हद तक जायज था.काफ़ी कुछ मीडिया और बदलती मानसिकता के ऊपर लिखने का साहस उन्होने इस कपडे या मानसिकता क्या खराब है ... नाम के ब्लॉग मे किया जो सराहनीय कदम था.

तेज रफ़्तार चलते हुये आम से सनसनी बनने वालों में पद्मनाभ मिश्र ने काफ़ी हो-ह्ल्ला मचाकर अपनी सार्थक उपस्थिति को दर्ज करवाया है.

मोहल्ला ये शब्द भी अपने आप में सनसनी है जो तेज प्रतिक्रिया के लिये काफ़ी मशहूर हो चुका है, उन्होने तो लगभग एक सीरीज बनाकर इस समाज की बखिया उधेड़नें में कोई कसर नहीं छोड़ी है..मादा होने से बड़ी सज़ा कुछ नहीं नाम का ब्लॉग अपने आप में काफ़ी कुछ है जो चर्चा बन गया.

मेरे हिन्दी-लेखन प्रेरणा गुरू और सम्मानीय शास्त्री.जे.सी.फ़िलिप. जी ने भी इस पर लेख लिखे जो समाज को आईना दिखाते प्रतीत हो रहे हैं,बलात्कारी एवं मनोविज्ञान नामक लेख एक अपने आप में सार्थक मंच है जो शास्त्री जी की देन है.

एक और महिला चिट्ठाकार जो अपने आप में एक स्तम्भ हैं घुघूती बासूती जी जिनके कटाक्ष के आगे कोई चिट्ठा नहीं टिक पाया है उन्होने सीधे-सीधे खुल्लमखुल्ला मोलेस्ट करेंगे हम इनको की चेतावनी दे डाली है.

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जहाँ तक मुझे दिखायी दे रहा है उसके लिये हमें थोड़ा पीछे पलटकर देखना पड़ेगा क्योंकि शायद इस पलटनें में ही सारे पन्ने खुद-ब-खुद खुल सकते हैं...........
आज से तकरीबन पन्द्रह-बीस साल पहले लोग कितने खुश मिजाज हुआ करते थे, रामायण-महाभारत जैसे सीरियल हर दिल की जान हुआ करती थी लेकिन जब 1996 में तत्कालीन प्रधानमंत्री ने विदेश नीति की घोषणा की तो देश का बुरा वक्त उसी समय से चालू हो गया था.

सबसे पहले हमला बोला केबल-टी.वी.की आँधी ने जो अपने साथ बेवॉच,बोल्ड एंड द ब्यूटिफ़ुल,फ़ैशन टी.वी.,देर रात्रि वयस्क प्रोग्राम लेकर हर घर और हर ड्राइंग रूम तक पहुँच गयी, उसके बाद विदेशी उत्पाद और फ़िर लोक लुभावन नौकरियां और विदेशी बैंको द्वारा प्रदत्त कर्ज ने रही सही भारत के मध्यम वर्ग की कमर तोड़कर रख दी है.

शायद मैने मोहल्ला में ही पढा था कि लार्ड मैकाले ने कहा था कि" भारत के लोगों को जीतना हो तो उसे विदेशी संस्क्रति से रूबरू करवाओ बाकी वो खुद ब खुद हमारे अधीन हो जायेंगें"

ये शब्द स्वर्ण अक्षरों की तरह हमारे देश की किस्मत पर लिखे जा चुके हैं.अब आगे कितनी भी बहस हो यां ना हो इस देश और इसको चलाने वालों को कोई सारोकार नहीं कि कितनी बलात्कार हो रहे हैं यां कितने लोग खुद को नशे यां गर्त में डुबा रहे हैं उन्हें तो बस इकॉनॉमी ग्रोथ दिखनी चाहिये.

शनिवार, 5 जनवरी 2008

राजधानी में बिहारी

द्रश्य एक: सुबह के 8 बजे के लगभग का समय!
पटना से चलकर आने वाली सम्पर्क क्रान्ति एक्सप्रैस में बिहार से आये गरीब तबके के लोग गाड़ी में अपने खड़े होने के स्थान पर गहरी सांसे लेकर दिल्ली के आने का बेसबरी से इंतजार कर रहे हैं......
कुछ लोग बिहार से अपने लोगों से मिलने आये हैं और कुछ काम के सिलसिले में, क्योंकि इनके अपने बिहार में इनके लिये काम नहीं है ये लोग वहाँ रहकर कमा-खा भी नहीं सकते क्योंकि कुछ दबंगई और कुछ वहाँ की सरकारें उनको जीने नहीं देती.

द्रश्य दो: ट्रेन प्लेटफ़ार्म पर धीरे-धीरे रूकने को है, ट्रेन के रूकते ही अचानक रेलवे पुलिस के डंडे चमकने लगे जो इन निरीह प्राणियों पर बरसने लगे. ये बेचारे क्या कहते क्योंकि अगर रोजी-रोटी कमानी है तो ये सब इसकी अच्छी शुरूआत है.रेलवे पुलिस होने का अगर जौहर इन बिहार से आये शांत और भोले-भाले लोगों पर न दिखाया तो वो रेलवे पुलिस का नहीं हो सकता।
चाहे आँखों के आगे से अपराधी निकल जाये और चाहे रेलवे स्टेशन पर बिना इनकी इजाजत के पान-सिगरेट भी बिक जायें लेकिन बिहार से आये इन लोगों को तंग न करें ऐसा नहीं हो सकता।

अब दिल्ली का विहंगम द्रश्य:रिक्शा खींचते, रेहड़ी लगाते,मजदूरी करते, काम के लिये किसी बस में बैठते और कहीं भी इन बिहारियों के लिये बड़ी ही अपमानजनक टिप्पणी सुनने को मिलती है जो लगभग पूरे भारत में एक समान ही है
"साले इन बिहारियों ने तो पूरे देश की ऐसी की तैसी कर रखी है, इनका बस चले तो ये साले पूरे देश को बिहार बना दें"

माफ़ कीजियेगा उपर लिखी गयी गाली का प्रयोग मैं नहीं करना चाहता था लेकिन सच्चाई बयां करने की विवशता के आगे ऐसा करना पड़ा.

दिल्लीवासी कहते हैं कि दिल्ली से अगर बाहरी खासकर बिहार के लोगों को हटा दिया जाये तो दिल्ली न्यूयॉर्क बन जाये!
इनके लिये बिहार शब्द घ्रणा का शब्द बन चुका है और आम बिहारी घ्रणा के पात्र.लेकिन खुद ये लोग भूल जाते हैं कि लगभग 70 प्रतिशत दिल्ली इन बाहरवालों के ही रहमों-करम पर आश्रित है, अगर ये लोग न हों तो कौन इनको जल्दी-जल्दी रिक्शे से घर,ऑफ़िस पहुँचायेगा, कौन इनका बोझा उठाकर इनके लिये काम करेगा वो भी सस्ते में!,दस लोगों के बराबर काम करके आधी मजदूरी में आपकी बिल्डिंग को कौन बनवायेगा?,अरे किसको गाली देंगें किसके ऊपर भड़ास निकालेंगें?
कौन सी फ़ैक्ट्री मैं ये लोग काम नहीं करते? क्या मिलता है बस! तिरस्कार और कुछ रहने ले लिये! माफ़ कीजियेगा छुपने के लिये दड़बा. ये शब्द ठीक है ना? आप अगर कॉलेज में हैं तो कॉलेज आपको तवज्जो नहीं देगा, किसी ऑफ़िस में हैं तो तरक्की का अवसर शायद मिल पाये और अगर तरक्की हो भी जाये तो उतना सम्मान नहीं मिल सकता.

किसी चिट्ठे पर पढा था कि बिहार का नाम सुनते ही बैंक एकाउंट,क्रेडिट-कार्ड,लोन वाले दूर भाग जाते है ये बात बिल्कुल सत्रह आने सच है, क्योंकि ये लोग चोरों,उठाईगीरों बदमाशों और धोखाधड़ी करने वालों का साथ देते हैं लेकिन इनके लियेये अपने दरवाजे बन्द रखते हैं।

अब मतलब की बात:मैं कोई बिहार से नहीं हूँ लेकिन मैं इनका दर्द समझ तो सकता हूँ, किसी ट्रेन में जब ये लोग खड़े-खड़े ही सफ़र करते हैं चाहे वि ट्रेन पूरी की पूरी खाली क्यों न हो! बड़ा विचलित करता है.
किसी भी बिहार से आये व्यक्ति के लिये सम्मान तो दूर उनको टिकट दिलवाने के नाम पर डंडे मिलते हैं,रिक्शावाले से पुलिस वाले गुंडे पैसे लूटते हैं और तो और यहाँ के निक्कमे आवारा टाइप के लोग इनको नशे की लत में डाल देते है ताकि ये लोग कमाते रहें और ये खाते.
इनको चुनाव आयोग दिल्ली का नहीं मानता लेकिन सरकार इन आश्रितों के लिये कुछ भी नहीं करती है क्योंकि बड़े-बड़े दावे और वादे करना ही इन सरकारों का मुख्य शगल रहा है|

तो क्या इन सरकारों का कोई दायित्व नहीं है जो इन लोगों और इस समाज के अभिन्न अंग को मुख्यधारा में लाये,
कब ये सरकारें एयरकंडीशन युग से बाहर निकलेंगी और कब इन ठंड से ठिठुरती इस रीढविहीन दशा से मुक्ती देंगीं?

बुधवार, 26 दिसंबर 2007

कहिये हम किस गली जा रहे हैं ?

अपने वजूद को तलाशती युवा पीढी आज न जाने किस रास्ते को अख्तियार कर ले इस बात का कोई भरोसा नहीं है क्योंकि पैसे की चाह और जल्दी ऊँचा उठने का ख्वाब उन्हे इस मोड़ पर भी ले जाता जहाँ उन्हें सिर्फ़ अराजकता और कुंठा के अलावा कुछ भी हासिल नहीं होता.

इसका ताजा उदाहरण पाकिस्तान भी है तो अमेरिका भी!
भारत भी कम अछूता नहीं है और बाकी सारी दुनियां में भी रोष बढता ही जा रहा है।
बेनजीर की हत्या फ़िदायन और आत्मघाती हमलावर युवा ही थे और ग्लास्गो एयरपोर्ट, लंदन मैट्रो,अमेरिका की यूनिवर्सिटी, भारत की संसद-अक्षरग्राम आदि सब इनके उदाहरण हो सकते हैं

अब असल मुद्दा- ये लोग कैसे बनते हैं हिंसक,कुंठित और द्वेष भावना के शिकार ?

इसका सटीक और एक ही जवाब है वहाँ की सरकारें और उनकी नीतियाँ.

सरकारें और पार्टियों का मकसद युवा पीढी को किसी प्रकार का रोजगार यां सहायता होता है क्योंकि युवा ही देश के कर्णधार होते हैं लेकिन इनका मकसद अब केवल उनको पार्टी हित के लिये मर-मिटने और आत्मघाती बनाया जा रहा है, किसी भी सरकार की युवाओं के लिये कोई रोजगार गारंटी नहीं है अगर है तो वो है आतकवादी और कट्टरपंथी बनने की शर्त पर.

माओवाद जो भारत में दीमक के समान फ़ैल रहा है उसके समानांतर हम बोडो,पाक आतंकियों, दंगईयों और आक्रोशित युवाओं को भी बढते हुये देख रहे हैं, पाकिस्तान और दूसरे अमेरिका विरोधी देशों में अनपढ-बेरोजगार युवकों को केवल आत्माघाती हमलावर और आतंकवाद का प्रशिक्षण दिया जा रहा है जिससे उन देशों की सरकारों का दबदबा कायम रहे और उन्हे बाकी दुनियां से अलग रख सके.

ये सब कहाँ से हो रहा है? कहाँ से पैसा आ रहा है? क्यों ये युवा किसी से नहीं डरते? क्यों सरकारें मूक दर्शक बनी बैठी हैं?

इन सब सवालों के जवाब के लिये सरकारों को अपने गिरेबां मे ही झांकना होगा क्योंकि उन्ही के फ़ैलाये गये अविश्वास के बीज आज आतंकवाद और कुंठा के बबूल के रूप में आगे बढ रहे हैं.

मंगलवार, 30 अक्टूबर 2007

आइये नारद.अक्षरग्राम को बचायें!











सुनकर अटपटा लगा ना ! कभी हम चिट्ठाकार नारद पर अपना चिट्ठा अवतरित होने के लिये लालायित रहते थे कि कब ये चिट्ठा आये और कब हमारा चिट्ठा ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचे पर आज मुझे महसूस हो रहा है कि ये प्रमुख हिन्दी एग्रीग्रेटर जिस तकलीफ़ों के दौर में गुजर रहा है वो शायद अन्य एग्रीग्रेटर भी देख रहे व सुन रहे हैं लेकिन उन सबको नारद से क्या लेना-देना ये बात गले नही उतरती है क्योंकि चिट्ठाजगत,ब्लॉगवानी और नारद के बीच में जो स्वस्थ प्रतियोगिता शुरू हुयी थी व जिससे किसी का भला हो ना हो हिन्दी का भला हो रहा था.पर लगता है कि ये सिलसिला थम सा गया है.

नारद.अक्षरग्राम को हम नजर-अंदाज नहीं कर सकते क्योंकि अगर चिट्ठाजगत और ब्लॉगवानी हिन्दी चिट्ठाकारी का शरीर हैं तो नारद.अक्षरग्राम उसकी आत्मा है लेकिन शरीर आत्मा के बिना कैसे जी पा रहा है ये दुखी करने वाली बात है. अगर नारद् को अपडेटिंग की समस्या से रूबरू होना पड़ रहा है तो हमारे तकनीकी चिट्ठाकारों से निवेदन है कि वो इस काम में आगे आयें और अपना सहयोग प्रदान करें और अगर रखरखाव और समय की कमी महसूस हो रही है तो हम सभी चिट्ठाकारों का कर्तव्य बनता है कि वो बारी-बारी समयानुसार अपना योगदान देकर हिन्दी सेवा में रत इस साइट को नवजीवन दें.

और अगर पैसा आड़े आ रहा है तो शायद हम एक-एक बूंद करके कुछ अपना योगदान तो दे सकते हैं, ये बात तीनों एग्रीग्रेटरों पर समान रूप से लागू हो ताकि हम हिन्दी और चिट्ठाकारी का सिर गर्व से ऊपर उठा सकें और कोई ये ना कहे कि आज किसी भारतीय ने अपनी चलती हुयी वेबसाइट धन और समय की कमी के कारण बंद कर दी.

पैसे के लिये हम कोई बैंक एकाउंट जैसे आई.सी.आई.सी.आई बैंक के एकाउंट की मदद ले सकते है लेकिन जिसके पास उसका डेबिट और क्रेडिट कार्ड दोनों हों जो विदेश में रूपये का डॉलर मे परिवर्तन करने की क्षमता रखता हो.कहने का तात्पर्य है कि हममें से किसी एक को निस्वार्थ आगे आकर इसका हिसाब-किताब रखना होगा और निष्पक्ष तीनों वेबसाइटों के लिये रखरखाव का कर्य करना होगा.

ये एक मजाक नहीं है लेकिन हम इसे एक मिसाल बना सकते हैं जो एक बहुत बड़ा प्रयास होगा हिन्दी हित में. तो क्या आप साथ देंगें ?

शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2007

काकेश जी! और मेरे सभी चिट्ठाकार भाईयों क्या आप मेरे इस दुख में शामिल होंगें?

कल यानी 4 अक्टूबर को काकेश जी के ब्लॉग पर एक हास्य लेख आया था पढकर अच्छा भी लगा और काफ़ी मजेदार भी! ब्लॉग का नाम है (एक व्यंग्य पुस्तक का विमोचन) लेकिन कुछ ऐसा घटित हो गया था जिससे शायद हम लोग अनसुनी और अनदेखी कर दें लेकिन काकेश जी के मन में भी ये टीस सी उठी होगी कि जिस अनाम व्यक्ति जो अपने आपको अमेरिकन गॉय बोल रहा है उसने भी एक टिप्पणी की थी- वो कह रहा था कि मैं अंग्रेजी बोलता हूँ
फ़िर उसने दुबारा से उसी उत्सुकता में लिखा कि वो हमारी भाषा को पढ नहीं सकता है.
नीचे के चित्र में उन महानुभाव की टिप्पणी है



अब सवाल ये उठ रहा था कि अगर हम हिन्दी को लिखना और पढना आसान बना रहे हैं तो क्या हम इस ओर भी हैं कि पूरा विश्व हमारी भाषा समझ सके? शायद नहीं!
मेरी समझ में कोई प्रभावशाली औजार (टूल) नहीं है जो हिन्दी को विश्व के समकक्ष खडा कर सके. अगर उस अकेले व्यक्ति ने काकेश जी के चिट्ठे को पढ लिया होता तो जाहिर था कि वो हिन्दी दुनियां में खो जाता और जैसा कि होता आया है कि दूसरों की देखा-देखी में दुनिया बहुत आगे निकल चुकी है. आज हम चिट्ठाकार इसी प्रवत्ति के कारण ब्लॉगजगत मे जमें हुये हैं वरना कहाँ अंग्रेजी में सर खपाने वाले रवि रतलामी जी और समीरलाल जी हिन्दी में लिखते? आलोक पुराणिक जी केवल अखबारी दुनियां में सिमट जाते और ज्ञानदत पाण्डेय जी अपनी रेलयात्रा अपनी आने वाली पीढी को सुना-सुनाकर दम लेते.

अब समय आ गया है कि हमें चिट्ठाकारी से आगे बढना चाहिये!अतः मेरा सभी भाइयों से निवेदन है कि वो मेरी और हम सबकी इस चिंता पर गौर करेंगें और हमारी हिन्दी को सर्वसुलभ और विश्वपटल पर लाने के लिये सामूहिक प्रयत्न करेंगे।
कहने को बहुत कुछ है लेकिन शब्द नहीं मिल रहे हैं बस! इतना ही लिख रहा हूँ

शनिवार, 22 सितंबर 2007

ये सवाल वाकई में ध्यान देने योग्य है

आज बहुत दिनों के बाद जब कुछ लिखने के लिये बैठा तो अचानक कहीं से ये लेख मेरे सामने आ गया जो एक सम्रध्द भारत की निन्दा कर रहा था,
ये लेख किसी और के द्वारा नहीं अपने प्रिय डॉ ए. पी. जे. अब्दुल कलाम जी ने उठाया है जो वाकई में ध्यान देने योग्य है

प्रस्तुत है वो चन्द लाईनें जो उन्होने कहीं
"राष्ट्रपति पद छोड़ने के बाद पहली विदेश यात्रा पर निकले डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम एक नए सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश कर रहे हैं। सवाल है कि अटलांटिक महासागर पार करने पर भारतीयों को क्या हो जाता है कि वे बदल जाते हैं?

कलाम ने यहां भारतीय पेशेवरों, प्रौद्योगिकीविदों और उद्यमियों को संबोधित करते हुए पूछा, अटलांटिक पार करते ही लोगों को क्या हो जाता है कि वे बदल जाते हैं। वे अपना प्रोफाइल बदल लेते हैं, सपने बदल लेते हैं, अपने कामकाज के तौरतरीके बदल लेते हैं। अंत में सफल होने में बदल जाते हैं और सफलता के चैम्पियन हो जाते हैं।

कलाम ने कहा कि मैंने यह सवाल अपने अच्छे दोस्त जॉन चैंबर्स के सामने रखा, जो सिस्को सिस्टम्स के सीईओ हैं, तो जवाब मिला कि अमेरिका बेहतर प्रदर्शन करने वालों की पूजा करता है और लोग असफलता से घबराते नहीं।"


मुझे कोई भी जवाब देते नहीं बन रहा है लेकिन अमेरिका की बात सच्ची और प्रशंसनीय है कि वो योग्यता को सलाम करता है और उसे वो हर जरूरत और सुविधा मुहैया करवाता है जिसकी उसे जरूरत है और बदले में अगर राष्ट्र के निर्माण में अगर थोडी सी भागीदारी मांगता है तो क्या बुरा करता है.

इसके ठीक उलट अपने भारत में जब पढा-लिखा नौजवान रिक्शा चलाता है,यां नेतागिरी में अपना समय व्यर्थ करता है जिससे हमारे देश के राजनीतिकों को एक गुमराह हमसफ़र मिल जाता है जो उनके लिये कुछ भी कर सकता है लेकिन अपने देश के लिये कुछ नहीं.
आज हर नौजवान एक कुंठा से पीडित है कि अगर वो इस देश में रहेगा तो सिवा पांच दस हजार रूपये मासिक के अलावा क्या कमायेगा? सुख साधन भौतिक सम्पदा हमारे देश् में मानो नेताओं के लिये ही बने हैं यां बनाये गये हैं.रोजगार योजनायें जो बेरोजगार अधिक लगती हैं, क्या भला करेंगी इस पीढी का जो जानती है कि जब चीन-जापान जैसे देश में घर-घर इन्जीनियर है लेकिन भारत में यही सब सीखने के लिये लाखों रूपये फ़ीस है.
सीखनें वालों से ज्यादा सिखाने वाले मुनाफ़ाखोर हो चुके हैं, देने वाला आज देसी घी मैं तैर रहा है और लेने वाले को नहाने के लिये पानी भी नसीब नही है.जब भौतिक सुविधाओं की बात आती है तो हमारे देश और रिजर्व बैंक काफ़ी हो हल्ला करता है लेकिन जब वास्तविकता में जिसको जरूरत होती है वो बेचारा दो वक्त की रोटी भी नहीं खा पाता है क्यों?

इस क्यों को पाटने के लिये हमारी सरकार का भी फ़र्ज बनता है कि वो खुद राष्ट्र के निर्माण में आगे आये और हमारे देश की नौजवान पीढी को एक सुलझा हुआ रास्ता दे ताकि फ़िर से ये सवाल कभी पैदा ही ना हो.

बुधवार, 15 अगस्त 2007

वाह दिमाग हो तो ऐसा

कल पूरे विश्व में एक ही चर्चा थी कि नोकिया जो मोबाईल फ़ोन निर्माता कम्पनी है उसके फ़ोन्स में बैटरी की दिक्कत आ रही है तो यह शायद बहुत से लोगों को उसका आपातकालीन फ़ैसला अच्छा लगा और कुछ लोगों को उसकी मर्केटिंग रणनीति. अभी ये सब चल ही रहा है कि अमेरिका की खिलौना कम्पनी मटैल ने (यहाँ पढें) अपने सारे खिलौने पूरे विश्व से वापस करने की गुहार की है. अविश्वस्नीय! लेकिन मुझे इसमें एक सोची-समझी राजनीति नजर आ रही है जिसमे अमेरिका का शातिर दिमाग है. कैसे आईये विस्तार में चलते है.

काफ़ी दिनों से इस विषय पर लिखना चाहता था पर लगता है वक्त आ गया है कि फ़िर से इस बात को उठाया जये कि किस तरह अमेरिका चिंतित और घबरा गया है एशिया के बढते कदमों से ( इस बात को साबित मैं नहीं ये लेख कर रहें है यहाँ और यहाँ देंखें जिसमें चीन की तेज होती अर्थव्यवस्था और विश्व में धाक जिससे अमेरिका का चिंतित होना स्वभाविक है क्योंकि वो नही चाहता है कि उसके एकाधिकार में खलल पडे ) अमेरिका की नीदं हराम हो गयी है क्योंकि पिछले कुछ दिनों से वो खुद शेयर बाजार में आर्थिक मंदी का सामना कर रहा है जिससे उसे पूरे विश्व में जलालत उठानी पड् रही है।

इस कदम से अमेरिका विश्व भर में अपने आपको ग्राहक के प्रति जागरूक दिखाना चाहता है जिससे एशिया के विकास और अर्थव्यवस्था को गहरी चोट लग सके और फ़िर से उसका एकछत्र साम्राज्य स्थापित हो जाये.
कभी माइक्रोसॉफ़्ट को लीनिक्स और ओरेकल से डर लगता है, कभी वो खुद एशिया की वस्तुओं(चावल,योगा,औषधियों आदि) को अपने नाम से पेटेंट करवाने लगता है. ये सब क्या है?

क्या हम लोगों को कुछ भी दिखायी नहीं देता? यां हम लोग अपने-अपने देश की तरक्की के लिये अंकल सैम यानी अमेरिका के आगे भिखारियों की तरह झोली फ़ैलाये खडे रहेंगे?आज अगर हम लोग नहीं चेते तो शायद ऐसा वक्त आ जाये कि पूरा विश्व अमेरका के कदमों मे होगा जो शायद उसका सपना है.

खुद को अपनी ही गुलामी वाली छवि से बाहर निकालकर और स्वावलम्बी होकर हम अपने देशों को मजबूत कर सकते हैं.


रविवार, 12 अगस्त 2007

60 साल भारत: युवा पीढी को क्या मिला?

"आज देश के युवा हाथों में लैपटॉप और हाथों मे सिगरेट लिये घूम रहे हैं शायद उनको ये आभास नहीं कि वो क्या हैं और कहाँ जा रहे हैं?"

'32 प्रतिशत भारतीय माइक्रोसॉफ़्ट का कार्यभार संभाले हुये हैं'
ये ताजा सच पूरी दुनियां के साथ जुडा है जहाँ तकनीकी द्क्ष युवाओं की कमी है वहीं भारत से लगभग लाखों युवाओं की खेप भारत से बाहर जाने को विवश है कारण?

आसान से सवाल का जवाब उतना ही मुश्किल है जितना एक मरे हुये को जिन्दा करना. दर-असल में देश में बढती बेरोजगारी और फ़ैलते आक्रोश की जिम्मेदार देश का मौजूद व्यक्तिगत ढाँचा और अव्यवस्था है जिससे लाखों युवा यां तो बाहर जाने को विवश हैं यां वो बेरोजगार हैं. जिनके पास नौकरी है वो इन बाहरी प्रपंचो के छलावे को समझ नहीं पा रहे हैं और खुद देश सेवा के बजाय इन कम्पनियों के पिट्ठू बने हुये हैं।

आज हर युवा बीस-बाईस साल पढाई करके क्या इस लायक ही रह गया है कि वो पाँच-सात हजार रूपये कमाने के लिये क्रेडिट कार्ड बेचे?

क्या वो किसी आई.टी कम्पनी में चार हजार की नौकरी के लायक रह गया है?

अभी नौकरी लगी नहीं और मोबाईल और मोटरसाईकिल की मांग करने लगे?

ये तो अभी कुछ ही सवाल हैं पर फ़ेरहिस्त लम्बी हो सकती है. लेकिन इन सबके बीच जवाब सिर्फ़ बस एक जवाब निकलकर आ सकता है कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों नें अपने मकडजाल में देश और देश के युवाओं को इस कदर फ़ांस रखा है कि युवाओं को अपनी क्षमता का पता ही नही लग पाता और ये युवा ज्यादा कमाने के चक्कर में ओवरटाईम करके,चोरी-डकैती,अपहरण जैसे उधोग चला रहे हैं।

आज किसी भी पेशेवर आई.टी की एवरेज तन्ख्वाह पाँच् हजार से बीस हजार है तो वहीं इनकी विदेशों में एक हजार डॉलर से पाँच्-छः हजार डॉलर हो सकती है. मतलब दस गुना ज्यादा तो वो भला क्यों इस देश के बारे में सोचेंगे? बेरोजगारी भत्ता पाँच सौ रूपये यां उससे अधिक मिलने से इन युवाओं का क्या भला होगा? इतने तो हमारे देश के नेताओं के कुत्तों के एक दिन का खर्च है, क्या हमारे देश के कर्णधारों की कोई जिम्मेदारी नहीं है कि वो अपने देश के विकास को इन नौजवान पीढी के कन्धों पर डाल दें?

माओवाद्-नक्सलवाद, आतंकवादी गतिविधियां ये सब उस आक्रोश का ही भयानक परिणाम है जिसके फ़लस्वरूप देश अराजकता की आग में धधक रहा है.क्या इस ओर इन नेताओं का ध्यान नहीं जाता यां मीडिया को कुछ दिखायी नहीं दे रहा जो बडे-बडे स्टारों की शादियों,अपराधों को हाइलाईट करने में लगी है.

अविश्वस्नीय निवेश और बडी-बडी भारतीय कम्पनियां भी इन युवाओं का दोहन कर रहीं हैं. जिससे युवा उत्कंठा का शिकार होकर भागने को मजबूर है.

जापान-चीन जैसे देश सच्ची अर्थव्यवस्था के वो उदाहरण हैं जिससे इस देश के लोगों को सीख लेनी चाहिये. आज इनका अनुसरण करके ही आगे बढा जा सकता है ना कि देश का बेढागर्क करने वाले इन नेताओं या राज्नीति का साथ देकर क्योंकि वो लोग कभी भी देशहित के बारे में नहीं सोचते।

सोमवार, 16 जुलाई 2007

नारद जी! आप कहाँ थे जब ये पोस्ट आयी?

कभी-कभी लगता है खुद नारद के कर्णधारों को विवादों से जुडे रहना अच्छा लगता है। मुझे लगने लगा है कि अश्लीलता और विवादास्पद लेखों को नारद पर आने देना ही सभी लोगों की नियति बन गयी है क्योंकि जिस प्रकार का लेख आज (नारद की पाली खतरनाक चुड़ैल सावधान ) नारद पर प्रकट हुआ है शायद वो विवादों को जन्म देने के लिये काफ़ी है. कुछ दिन तक हो-हल्ला मचेगा फ़िर नारद जी उस पर बिना किसी कार्यवाही किये बिना अपना वही पुराना राग अलापते रहेगें कि नारद पर भाषा यां शैली में कोई अश्लीलता यां विवादास्पद टिप्पणी प्रकाशित नहीं होने दी जायेगी

मान्यवर सुभाष जी को शायद ये अहसास नहीं हिन्दी भद्रजनों की भाषा है आप जैसे लेखकों से कतई उम्मीद् नहीं की जा सकती कि आप जिस भाषा क उपयोग कर रहे हैं वो आप की मनोःस्थिति को दर्शाती है कि आप किस स्तर के लेखक हैं

प्रस्तुत है इस लेख की एक छोटी सी कडी जिससे शायद नारद के कर्ण्धारों की नींद खुल सके....तू बालकों को डरा रांड. और अपने नारद के खसमों के साथ सो .हमारा नाम मत ले कुलबोरनी तो तू है छटी छिनाल. नारद के सभी मुसटंडों में तू ने एडस फैला रक्खा है वे भी तेरे पापों से मरेंगे और तू भी बहुत जल्द धीरज रख .सब जगह मुँह काला करती है और दूसरों पर लांछन लगाती है. बदजात.

सोमवार, 2 जुलाई 2007

नारद् जी सुनिये! जमाना बदल गया है...

नारद् जी जब मैने पिछले शुक्रवार को एक बहुत ही सटीक लेख महादेवी वर्मा(हिन्दी के विशाल मन्दिर की सरस्वती) का वर्णन अपने ब्लाँग पर दिया तो मुझे लगने लगा कि हिन्दी को बढावा देने वाले और हिन्दी लेखन में अपनी रूचि रखने वाले मेरे इस लेख को शाबाशी देंगे और मुझे आगे बढने के लिये प्रोत्साहित करेंगे लेकिन मुझे तब आश्चर्य हुआ कि मेरे लेख की प्रोत्साहना तो दूर किसी ने उसे नजर उठाकर भी देखना गंवारा नहीं समझा।

अब मुझे समझ में आ गया है कि बेकार मे लिखा गया कूडा लेख् जिसमें कुछ ओछी हरकतें,पंगेबाजियां,दूसरों का ध्यान आकर्षित करनें के लिये उलूल-जुलूल हरकतें ही हिन्दी ब्लाँगरों की पहली पसंद बन चुके हैं। नारद जी मुझे लगने लगा है कि अब अगर इस अक्शरग्राम नेटवर्क पर अगर हिन्दी लेखन की गुणवत्ता को सुधारा न गया तो शायद इसका हाल ओरकुट् (जो पहले मित्रों की खोज् के लिये बनाया गया था अब राष्ट्र्-विरोधी हरकतों,अश्लीलता और् समय व्यतीत करनें का साधन बन चुका है) जैसा ना हो।

मुझे माफ़ करें अगर मेरी बातें किसी को बुरी लगेंगी लेकिन क्या करूं मैं कोई अपने आपको बडा लेखक नहीं समझता हूँ लेकिन् हिन्दी के प्रति मेरे प्रेम के लिये मैं कुछ भी कर सकता हूँ।
जय हिन्दी!हिन्दी अमर रहें

सोमवार, 11 जून 2007

हिन्दी अमर रहे !

आज जब हिन्दी ब्लाँग देखता हूं तो लगता है कि शायद हिन्दी लेखन का स्वर्णिम युग लौट रहा है। हिन्दी को उच्चतम स्तर पर ले जाना ही आज हिन्दी ब्लाँगरों का मुख्य ध्येय है, लेकिन बढते समयाभाव, दिशाहीनता, प्रचार-प्रसार की कमीं ने हिन्दी ब्लाँगिगं को एक दायरे में सीमित कर दिया है।

अक्षरग्राम,हिन्दी ब्लाँग्स,वर्डप्रेस,तरकश,देसीब्लाँग्स,आईबीबो,चक्रारेडियो,कल्पना,भाषा इन्डिया,ब्लाँगस्पाट,सारथी जैसे वेबयंत्रों की मदद से हम अपनी हिन्दी लेखन की भूख कुछ हद तक कम तो कर सकते हैं लेकिन यह एक पर्याप्त आधार नहीं है।

हमें इसके लिये सयुंक्त रूप से एक ही मंच पर आना होगा। हमारा ध्येय अपने ब्लाग की वाह-वाही से ज्यादा हिन्दी लेखन कला को विश्व मंच पर उच्चतम् स्तर पर पहुँचाना है। ये ही एक ऐसा समय है जिसमें हम अपनी पहचान से ज्यादा हिन्दी को विश्व की एक धरोहर बना सकतें हैं।

यानी कहनें का तात्पर्य यह है कि आज सभी वेबपोर्टलों को समान रूप से एक ही मंच पर आना होगा जिससे इस मंच को राष्ट्रीय्-अंराष्ट्रीय पहचान और सराहना मिलेगी और पूरा विश्व इससे प्रभावित हुये बिना नहीं रह सकेगा। पूरा विश्व अगर आश्चर्यचकित् न हो जाये तो कहना ! अगर वो हिन्दी भाषा का मुरीद ना बन जाये तो कहना ! जिस अन्ग्रेजी भाषा के दम पर पूरा विश्व ऊँची-ऊँची उडानें भरता है वो हिन्दी के आकाश को छू भी नहीं सकेगा। क्योंकि हिन्दी के अथाह सागर में लेखन के अविरल तत्व,अदभुत् ग्यान,हमारा हिन्दु लेखन इतिहास का वो अकूत् भंडार है जिसके आगे विश्व की सारी भाषाऐं एक चम्मच भर हैं इसीलिये आज हम सबको अपने हिन्दी प्रेम को क्षितिज पर ले जाना होगा जिससे हमारी संस्क्रति को एक अलग पह्चान मिलेगी और हमारी भाषा अमर रहेगी।

जय हिन्दी ! हिन्दी अमर रहे !