रविवार, 15 मार्च 2009

पहली बार लगा कि मैं भारतीय हूँ

जी हाँ इस वर्तमान में मुझे इसका सुखद एहसास हो ही गया कि मैं एक भारतीय हूँ,लेकिन एक बहुत ही अजीब तरीके से...


कैसे? आइये जानें!

हुआ ये कि मैं अपने मित्र के साथ एक मल्टीप्लेक्स सिनेमाघर में एक हॉलीवुड यानी अंग्रेजी भाषा की फ़िल्म देखने गया.

बस हम फ़िल्म के पंद्रह मिनट पहले पहुँच गये जो कि मेरे लिये शायद पहली बार गर्व का विषय था, हुआ यूँ कि फ़िल्म के पर्दे पर आने से पहले " जन-गन-मन" का राष्ट्रीय गीत का प्रसारण शुरू हो गया और पल भर में ही सभी उपस्थित जन सावधान मुद्रा में तुरंत खड़े हो गये जो अपने आप में आश्चर्यजनक था.

फ़िल्म का वीडियो सियाचीन वाला था जो कभी पंगेबाज जी ने भी अपने ब्लॉग पर पोस्ट भी किया था, लेकिन पहली बार लगा कि हाँ ये देशभक्ति कि अविरल धारा भले ही मंद-मंद गति से चल रही है पर ये हम सब भारतीयों के मन को कहीं न कहीं भिगो देती है.

मेरा मानना है कि ऐसे प्रयोग जिसके लिये मैं विदेशी मल्टीप्लैक्स वालों को धन्यवाद देना चाहूंगा कि उन्होने कुछ पल ही सही लेकिन हमारी भारतीयता का एहसास हमें लौटा दिया.

ऐसे प्रयोग बार-बार होवें ऐसी मेरी कामना है क्योंकि भारतीय होने का एहसास हमारे जीने से ज्यादा है.

मैने नीचे उस वीडियो का यू-ट्यूब विडियो दिया है अगर आप इस वीडियो को प्ले करें तो क्रपया सावधान की मुद्रा में खड़े होकर देखें,क्योंकि राष्ट्रगान का सम्मान हमारे देश का सम्मान है.

जय हिंद!


शनिवार, 14 मार्च 2009

लोकतंत्र पर हावी एक अदना सा आई.पी.एल.

पिछले कुछ हफ़्तों से बस दो ही विषय सुनायी दे रहे हैं पहला तो चुनाव और दूसरा आई.पी.एल

अव्वल तो चुनाव के लिये ही मारामारी और काफ़ी हो-हल्ला मचा, नवीन चावला की बर्खास्तगी और नियुक्ति चर्चा का विषय बनीं लेकिन इन सबको एक कामयाब व्यापारी यां ये भी कह सकते हैं कि बाजीगर " ललित मोदी" ने अपनी आई.पी.एल. को जिस तरह हाशिये पर ला खड़ा किया है जिससे देश के राज्यों को चुनाव के परिणामों में कमीं सी लग रही है.

राज्यों को लग रहा है वोट के दिन क्रिकेट का खेल उनका आंकड़ा बिगाढ सकता है, और शायद यह भी सच हो.

अब बात मुद्दे की....क्या इस देश के लोग वोट देने से बेहतर क्रिकेट देखना ज्यादा जरूरी समझते हैं ?

क्या इस देश के लोगों व राज्यों की सरकारों को ललित मोदी जैसे कारोबारियों ने भ्रमजाल में फ़ांस लिया है कि वो इस खेल के आगे कुछ सोच ही नहीं रहे हैं ?

सुरक्षा मुद्दा जैसे कोई देश की सुरक्षा यां प्रतिष्ठा का सवाल है तो ये खेल रद्द क्यों नहीं हो जाता?

संसद यां सांसदों को नक्सलवाद,आतंकवाद,मुम्बई हमले,गरीबी नहीं नजर आ रही है?

लगता है इस देश को भी पाकिस्तान जैसे देश की तरह टालमटोल और झूठे रवैये की आदत हो चली है जिससे वो बस सिर्फ़ अपने आप को झूठी तसल्ली देता है कि हम खुश है!

सबसे बड़ी बात "मीडिया" को न जाने कौन सा सांप सूंघ गया है कि वो भी बस सच दिखाने के नाम पर सचिन और सहवाग के रिकार्ड को दिखाता रहता है,

अभी भी भुज,बिहार,निठारी,झारखंड,असम जैसे कई मुद्दे और विषय अपनी-अपनी जमीन की तलाश में हैं लेकिन इस मीडिया को खानों की लड़ाइयों,क्रिकेट चीयर-लीडर्स,सांप जैसे विषयों से फ़ुर्सत नहीं मिल रही है.

तो अब लग रहा है कि देश के भविष्य को संवारने का काम भी शायद ये क्रिकेट के व्यापारी ही करने वाले हैं, क्योंकि किसी भी राज्य के मुख्यमंत्री ने ये तक नहीं कहा कि ये खेल देश के सबसे बड़े लोकतांत्रिक चुनाव से बड़े हो गयें है इस खेल का बहिष्कार हो ताकि देशवासियों को अपनी ताकत का एहसास हो.

जय हो! जय हो!

शुक्रवार, 13 मार्च 2009

योग गुरू बाबा रामदेव ने कभी इस ओर भी ध्यान दिया है?

योग के ढोंग करके और कोला कम्पनियों को पानी पी-पीकर कोसने वाले बाबा रामदेव ने उन कम्पनियों की नाक में नकेल डाल रखी है, और अब शायद वो अपना देसी कोला का भी व्यापार चालू करने वाले हैं यानी दुकानदारी चोखी ही होगी! लेकिन....

लेकिन बाबा रामदेव यह भी जानते हैं कि जब तक पब्लिसिटी में रहना है ऐसे ही मुद्दे उछालने पड़ेंगे सो अब बात ऑस्कर की हो यां पेप्सी कोला की रामदेव बाबा को तो पब्लिसिटी ही चाहिये!

लेकिन क्या बाबा रामदेव इस बात के लिये मुहिम छेड़ सकते हैं कि एक लीटर की साफ़ पानी की बोतल जो पहले से ही मनमाने रूप से 10 रू. में बिक रही थी अब काफ़ी महीनों से 12 रू. के अनाव्श्यक रूप में बिक रही है, रेल-मंत्री लालू प्रसाद के आव्हान के बाद 1 रू में पानी तो बिकने लगा लेकिन क्या रेलवे स्टेशनों पर ही लोग प्यासे घूमते हैं और क्या ये भी गारंटी है कि वो पानी हर आदमी की पहुँच में होता है?

कहानी का सीधा सार यह है कि बाबा रामदेव को कुछ भी माया-मोह और अपनी दुकानदारी के अलावा कुछ दिखायी देता है तो वो इस समस्या पर ध्यान दें

शुक्रवार, 6 मार्च 2009

क्या होली ऐसी होती है?

इन तस्वीरों में बयां दर्द आपको होली मनाने के लिये मजबूर कर रहा है? नहीं ना क्योंकि ये लोग खून की होली खेल चुके हैं अब क्या होली खेलने के लिये कुछ बचा है ?


































बुधवार, 11 फ़रवरी 2009

लो अब "रवीश भाई" भी तालिबान-तालिबान गाने लगे!

कल तक एन.डी.टी.वी. के प्राइम टाइम के सुपरहीरो बनकर आये रवीश भाई जिस इंडिया टी.वी. के तालिबान के ऊबाउ कार्यक्रमों की खिल्लियां उड़ाकर यह कहते फ़िर रहे थे कि ये कार्यक्रम आपकी रातों की नींद खराब कर सकते हैं जो केवल यू-ट्यूब पर पोस्ट किये नकली आतंवादी ड्रामों से भरी पड़ी है.


दर-असल में इंडिया टी.वी. के बढते ग्राफ़ और टी.आर.पी. रेटिंग ने सभी चैनलों की नींद हराम कर रखी है जिसके बचाव में कई झुलस गये हैं यां कई हाथ सेंक रहे हैं. उसी आग की तपिश से झुंझलाये बेचारे " रवीश भाई" प्राइम टाइम पर सबको यही सलाह देते फ़िर रहे थे कि आप्को तालिबान के नाम पर बेवकूफ़ बनाया जा रहा है और आप ऐसे कार्यक्रम न हीं देखें जिससे आपका मन विचलित हो सकता है.


लेकिन भला हो देश की जनता का जिन्हें रात को अपने खाने के साथ ऐसे मसालों का तड़का खाने की आदत है, अतः रवीश भाई समझ गये कि अब उनकी दुकान नहीं चलने वाले तो उन्होने पिछले दो तीन दिनों से वही यू-ट्यूब के वीडियो दिखाना शुरू कर दिया जिनके लिये उन्होने कहा था के ये नकली और भ्रमित वीडियो हैं.


शायद रवीश भाई को समझ आ गया है जैसा देश वैसा भेष वाली रणनीति और समय के अनुसार ट्रेंड सैटर नहीं बने तो हो सकता है कि फ़िर से उन्हे प्रिंट मीडिया में वापसी करनी पड़े क्योंकि यहा वही सब करना पडता है जो जनता चाहती है न कि एडीटर यां न्यूज-रीडर

सोमवार, 9 फ़रवरी 2009

आज की शाम कॉलेज के कॉफ़ी-हाउस के नाम

आज सैकड़ा हो गया पोस्ट लिखते-लिखते तो सोचा कि कहाँ लिखूं तो मन में आया कि कहीं दूर न जाकर बस वहीं से शुरू करते हैं जहाँ लोग अपनी जिंदगी के सबसे यादगार दिन बिताते हैं.....
तो बस चल दिये अपनी गाड़ी को उस कॉफ़ी शॉप से दूर पार्किंग करके क्योंकि उन दिनों मेरे पास साइकिल जैसा साधन भी नहीं था और बस रिक्शा यां दोस्तों का रहमो-करम(लिफ़्ट) काम आता था.

सो चल दिये अपनी मंजिल की तरफ़! वहाँ पहुँचते ही लगा कि हम जी रहे हैं दुबारा उन दिनों को, लगा ये शाम का सन्नाटा मुझे उन दिनों का शोर सुनायी दे रहा है.
कॉलेज नहीं बदला,न ही वो कैंटीन यानी कॉफ़ी हाउस लेकिन समय बदल गया था और मेरा वर्तमान.

अपने लिए वही क्रीम-रोल और दो समोसे के साथ हाई-स्वीट विद हॉट एस्प्रेसो का ऑर्डर जब दे रहा था तो लगा कि आज उधार मांगना पड़ेगा क्योंकि अचानक मेरा हाथ मेरी जेब की तरफ़ जाने लगा था जो उन दिनों की आदतों में शुमार था(क्योंकि अक्सर उधार खाना पड़ता था लेकिन हमेशा इस कॉफ़ी वाले ने मना नहीं किया)

आज वो वहाँ नहीं थे बस एक तस्वीर में माला के पीछे थे(यानी मर चुके थे)नारायण अंकल यानी कि बिहारी दादा. काउंटर पर बैठे लड़के का परिचय मिला तो पता चला कि वो उनका बेटा है. बेटा कैसे? (बिहारी अंकल ) का कोई बेटा तो नहीं था फ़िर ये?....पता चला कि बिहारी अंकल ने जिस-जिस को बचपन से पाला था यानी कि वो कुल तीन लोग थे उन सबमे आपस में उन्होने कैंटीन का जिम्मा अपने जीते -जी दे गये थे.

खैर फ़्लैश-बैक में चलते हैं, ..............मुझे याद है वो दिन जिस दिन मैने इस कॉलेज में पहला कदम रखा था नयी उमंगों के साथ थोड़ा रैगिंग का भी डर था, मेरे पहुँचते ही कॉलेज के कुछ सीनियर्स ने मुझे घेर लिया लेकिन उनमें से दो लड़के मेरे परिचित थे इसलिये मेरी रैगिंग तो टल गयी लेकिन बदले में मुझे उनको उसी कॉफ़ी-हाउस में दावत देनी पड़ी जो उस दिन का सौ रूपये के बराबर बिल बना.

लेकिन अब मैं अपने कॉलेज का एक आजाद पंछी यानी(जूनियर को पंछी) बन गया था.
लड़कियों में मैं उपस्थिति (अटैंशन) ले चुका था और बिहारी दादा के उधार-खाते में मेरा एकाउंट बन गया था...


आगे विस्तार से बताउंगा
क्रमशः.......

शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2009

परवेज मुशर्रफ़ के बोये बीज ने अब बबूल के रूप में पाकिस्तान की मौत का सामान तैयार कर लिया है

आज जिस पाकिस्तान पर अमेरिका समेत समस्त विश्व अपनी भौहें तिरछी कर रहा है, उसी पाकिस्तान के जनरल रहे परवेज मुशर्रफ़ ने किस तरह अपने मुल्क में आतंक और पश्चिमी देशों से मित्रता (अमेरिका) का ढोंग किया ! उसके इसी कदम से उसी के मददगार रहे अफ़गानिस्तान और मुस्लिम देश खासे खफ़ा हो चले थे.

एक तरफ़ मुशर्रफ़ देश में अमन-चैन और खुशहाली का नकली आवरण पहने विश्व को बेवकूफ़ बनाने का नाटक खेल रहे थे तो दूसरी तरफ़ गरीब,बेबस और लाचार जनता मुशर्रफ़ के तानाशाह रवैये से तंग आ चुकी थी, इसका परिणाम यह हुआ कि अफ़गानिस्तान के तालिबान अफ़सरो और पाकिस्तान के शरणागत आतंक के आकाओं ने पाकिस्तान को ही ठिकाने लगाने का मन बना लिया है
पहले बेनजीर की हत्या ,फ़िर मुशर्रफ़ की ताजपोशी छिन जाना इसी गुस्से का सबूत है जो मुशर्रफ़ ने अपने तानाशाही रवैये के कारण देश की अवाम में पैदा किया

मुखमरी,कर्ज और आतंकी शरणस्थलों को बढावा देने का काम जिस गति से परवेज मुशर्रफ़ ने किया उसी गति से आज पाकिस्तान दिन ब दिन अपने आपको गर्त में डूबा पा रहा है. आज लगभग पूरे पाकिस्तान में आत्मघाती हमलावर,आतंकी शिविर ,अशिक्षा, औरतों व लड़कियों पर जुल्म आम बात है जो एक बहुत बड़ी चिंता का विषय है जिसे रोक पाना इस समय मौजूदा प्रधानमंत्री के बस का रोग नहीं रहा.

मुम्बई पर हमला करके अगर् पाकिस्ता ने ये सोचा है कि उसे उसके पुराने मददगारों (अफ़गानिस्तान एवं मुस्लिम देशों) का समर्थन मिलेगा तो यह उसकी सबसे बड़ी भूल है क्योंकि विश्व भर में मुस्लिम समुदाय पहले ही अपने खोये हुये वजूद को फ़िर से पाने के लिये संघर्षरत है तो दूसरी तरह ये देश ये भी जानते है कि भारत अब एक बहुत बड़ी ताकत बन चुका है और संपूर्ण विश्व भी इस ताकत के साथ कंधे से कंधा मिलाककर खड़ा है.

अतः अब अलग-थलग पड़े पाकिस्तान को अपने ही गिरेबां में झांककर देखना होगा कि जिस तानाशाही और दमनकारी नीतियों से उसने अपना सिर ऊँचा किया है वही नीतियां तलवार बनकर उसी सिर पर मंडरा रहीं हैं.

बुधवार, 28 जनवरी 2009

मेरा देश : गली,मोहल्ले, कॉलोनी और सोसाइटी और अब टाउनशिप की वैराइटी वाला गणतंत्र दिवस कैसे मनाया जाता है? आइये जानें

पहला सीन - एक तंग गली में कुछ बच्चे जो मैले कुचैले फ़टेहाल कपड़ों में कचरा बीन रहे हैं,कुछ सुअर साथ दे रहे हैं और कुछ कुत्ते उनकी पहचान को सार्थक बना रहे हैं.
इस गली के आखिरी छोर पर एक लड़की भीख मांगने का नाटक करते हुये अपने जिस्म के खरीददार को खोज रही है तो सामने से ही उसका नशेड़ी बाप उसे गालियाँ देते-देते नाली की कीचड़ में सरोबार होकर उसी में लोटपोट है

दूसरा सीन- मोहल्ले में आज दो औरतें रोज की तरह एक दूसरे को गालियां दे रही हैं, तो वहीं कुछ बच्चे कंचे और गिल्ली डंडे में व्यस्त हैं, अल्हड़ लड़कियाँ जानबूझकर छत पर बाल सुखाने को चली आयी हैं और उन्ही को देखने मोहल्ले के "नामी" नौजवान अपनी बाइक और किसी न किसी बहाने से इन घरों में तांक-झांक कर रहे

तीसरा सीन- शहर की पॉश कॉलोनी में आज सुबह से ही हलचल है....
कुछ पढे-लोखे बुजुर्गों ने सांस्क्रतिक कार्यक्रम आयोजित किये हैं जिसमें क्षेत्र के ही किसी छुटभैये नेता(गुंडे) को बतौर चीफ़ गैस्ट बुलाया गया है...
बच्चे जो अपनी-अपनी मम्मियों के साथ आये हैं और मन मारकर ह्रितिक-रोशन और राखी सावंत के आइटम नम्बरों पर पैर पटक-पटक कर स्टेज को तोड़े जा रहे हें

इन सबके बीच लड़कियां अपने-अपने मोबाइल फ़ोन्स पर अपने-अपने ब्वाय-फ़्रेंडस के साथ बातों में मशगूल हैं, किसी का मॉल तो किसी का पिक्चर देखने का प्रोग्राम फ़िट हो चला है

अब बारी सोसाइटी की ये सीन बिल्कुल ही डिफ़रेंट हैं इस लिये इसे कोई क्रम नहीं दे सकता-- तो सीन इस प्रकार है कि आज सोसाइटी की महिलाओं की किटी पार्टी है जिसमें आज फ़लां श्रीमती ने आयोजित किया है, कारण चाहे जो कोई भी हो आज गणतंत्र दिवस और अपने सारे पड़ोसियों को अपनी नयी ज्वैलरी और नया फ़र्नीचर जो दिखान है....
हाँ शाम को एक अनाथालय में जाकर कुछ फ़टे कपड़े दान देते हुये अपनी महिला संगठन का अखबार में महिमा-मंडन सहित चित्र छपवाना है

क्या कहा बच्चे और लड़कियां?
बच्चे तो अपने-अपने स्कूल में गये हैं मजबूरीवश लेकिन लड़कियों के लिये सोसाइटी के बाहर काले रंग के शीशे ऊपर किये हुये चमचमाती कारें इंतजार कर रही हैं,


इन सबके बीच शहर के बाहर बनी टाउनशिप में एकांत का वातावरण है इन सबमें गली-मोहल्ले-कॉलोनी-सोसाइटी से पटायी,बहलायी,फ़ुसलायी,मजबूरी मे बुलायी गयी लड़कियां अपने-अपने जोड़ीदारों के साथ गणतंत्र-दिवस को इंज्वाय कर रहे हैं,और इनके जोड़ीदार वो पति-लड़्के हैं जो अपने-अपने गली-मोहल्ले-कॉलोनी और सोसाइटियों से अपने घरवालों-पत्नियों से दूर हैं