शुक्रवार, 21 मार्च 2008

उड़नतश्तरी आगरा आगमन

सोमवार के दिन मैं सुबह-सुबह ड्यूटी से लौट कर नींद ले ही रहा था कि अचानक बिजली गुल हो गयी, ठीक उसके बाद मेरा मोबाइल घनघना उठा और एक अपरिचित नंबर देख कर मन में कुछ शंका उठी लेकिन दूसरी तरफ़ से एक ठंडी हवा के झोंके सरीखी आवाज का सामना हुआ "हैलो कमलेश ! आप कमलेश ही बोल रहे हैं ना मैं समीरलाल बोल रहा हूँ"

ये सुनते ही हमारी बाँछें खिल उठी और हमको लगने लगा शायद हम कोई मिल गया के ॠतिक रोशन हो गये हैं जिसकी तरह मेरा भी एलियन से सामना होने वाला था, खैर उन्होने कहा कि "मैं शाम को गोंडवाना एक्स. से दिल्ली से जबलपुर जा रहा हूँ और आगरा से होकर जाउंगा क्या आप मिल सकते हैं प्रतीक पांडेय को भी फ़ोन किया है लेकिन वो इस समय शहर से बाहर हैं, अतः आप मुझसे मिलने स्टेशन पर आ सकते हैं?"

गाड़ी नियत समय पर आयी और बदनीयति से चल भी दी लेकिन समीरलाल जी से कुछ पल बातचीत भी हुयी, मिसेज समीर भी काफ़ी प्रभावशाली व्यक्तित्व वाली महिला हैं और साथ ही साथ हँसमुख भी हैं, समीर जी ने मुझे जाते-जाते जयशंकर प्रसाद की पुस्तक उपहार स्वरूप भेंट दी जो मुझ जैसे नवोदित ब्लॉगरों के लिये संजीवनी सरीखी है.

उनके बारे में कुछ बातें-घटनाक्रम सहित---


सुबह फ़ोन आने के पहले लाइट का अचानक चले जाना उड़नतश्तरी के आने की सूचक थी


पूरी रात के जागे हुये बंदे की नींद गायब होना भी एक घटना है


भारतीय रेल का स्वर्णिम काल उस दिन सभी ट्रेनें सही समय पर आ रहीं थीं


एक घटना भी स्टेशन पर घटी, मैं जहाँ खड़ा था वहाँ पर भारमापन यंत्र था, समीरलाल जी के आने से पहले ही खराब हो चला और उनके जाने के बाद ही ठीक हुआ ! ये सच्ची घटना थी.



ट्रेन जो कम से कम दस मिनट और ज्यादा से ज्यादा बीस-पच्चीस मिनट रूकती है, उस दिन पाँच मिनट से भी कम समय में चल दी यानी हवा (समीरलाल) का झोंका बन गयीं थीं

अब आगे का घटनाक्रम और चित्र समीर जी अपनी पोस्ट के माध्यम से करेंगें, लेकिन मैं एक बात उनसे पूछना चाहूंगा कि उनके साथ सफ़र कर रहा एक व्यक्ति हमें देख मंद-मंद मुस्कुरा रहा था यानी कि उसे भी समीरलाल जी ने चिट्ठाकारी के बारे में बताया था यां नहीं आगे की किस्त समीरलाल जी की पोस्ट के माध्यम द्वारा.........

मंगलवार, 18 मार्च 2008

होली पर विशेष

कुछ विशेष रंग जिनके बिना इस बार आपकी होली कुछ फ़ीकी सी लग सकती है, क्योंकि चटख रंग के बिना होली कैसी और बिना होली के आनंद कैसे? ये चटख रंग खून,भूख,अत्याचार,युद्ध,अशांति के घोतक हैं अतः इनका इस्तेमाल आप किसी भी देश में कर सकते हैं चाहे वो भारत हो यां पाकिस्तान बल्कि ये चीन,गाजा,अफ़गानिस्तान,अफ़्रीका आदि देशों में भी धड़ल्ले से इन रंगों का इस्तेमाल किया जाता है क्योंकि इसके बिना किसी भी देश की प्रगति संभव ही नहीं है.

ये जो आप तस्वीरें देख रहे हैं वो सारे विश्व की मौजूदा हालत को दर्शाने के लिये काफ़ी है जिनसे कम से कम ये तो पता चलता है कि वैश्वीकरण क्या है और किनकी लाशों की नींव द्वारा बनाया गया है























रविवार, 9 मार्च 2008

तस्वीरें जो बोलती हैं--महिला दिवस स्पेशल--भाग-4

कल महिला दिवस था और महिलाओं के लिये मैं कोई स्पेशल ब्लॉग लिखना चाहता था लेकिन लिखने से ज्यादा मुझे मेरी तस्वीरों वाली श्रंखला और भी ज्यादा सार्थक लगती है, इसीलिये ये पोस्ट और तस्वीरें केवल महिला दिवस स्पेशल हैं.

ये तस्वीरें देश के जाने-माने छायाचित्रकारों (photographers) की हैं जिनके शीर्षक उन्ही लोगों द्वारा प्रदान किये गये हैं ,बिना किसी छेड़छाड़ के मैं इसे अपने ब्लॉग में दे रहा हूँ क्योंकि ये शीर्षक वाकई में इन चित्रों को सार्थक कर रहे हैं.

नोटः अगर आपने मेरे पिछले तस्वीरों वाले ब्लॉग्स को नहीं देखा है तो देखने के लिये क्रमशः भाग-1 -- भाग-2 -- भाग-3 पर क्लिक करके आप उसे भी देख सकते हैं

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MARCH 8: मार्च 8





COURAGEOUS WOMEN IN THE MARKETS: साहसी महिलायें बाजार में



WOMEN IN LADAKH: लद्दाख की महिला



WORKERS AT CHILLI FIELD: मिर्च के मैदान में कामगार



WATER: पानी



NAMASTE KARO: नमस्ते करो!



GRANDMA's HOUSE: दादी माँ का घर



TAKING PICTURE: तस्वीरें लेना



INDIAN WOMEN COOKING: भारतीय महिला खाना बनाते हुए



HARD WORKING SMILE: मेहनती मुस्कुराहट



JEWEL OF KUTCHCH: कच्छ का आभूषण



A SAD DANCER: एक दुखी नर्तकी



RAJASTHANI WOMEN IN COLOR DOOR: राजस्थानी महिला रंगीन दरवाजे में



IN A MARKET: बाजार में



RUSTIC LOOK: देहातीपन



ORANGE SELLER: संतरे बेचने वाली



SHARE & CARE: चिंता और सलाह



SO! I'LL COME BACK: मैं वापस आउंगी

बुधवार, 5 मार्च 2008

क्या ओरकुट (orkut) और और सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स भविष्य का सबसे बड़ा खतरा हैं यां कुछ और?


आज अचानक बैठे-बैठे टेलीफ़ोन डायरेक्ट्री उठाकर उसके पन्ने पलट रहा था कि अचानक एक बात दिमाग में कौंधी कि क्या वर्तमान में दुनिया की सबसे बड़ी डायरेक्ट्री ओरकुट है?

सोचते हुये थोड़ा डर सा लगा और मन में सिहरन सी दौड़ गयी कि वाकई में ओरकुट हमारी निजता में कितनी दखलंदाजी कर चुका है इसका भान शायद पूरे विश्व को भविष्य में ही होगा.

शायद गूगल ओर्कुट के बहाने अपने प्रचार-प्रसार और भविष्य की भावी योजनाओं को बेचने की जुगत लगा रहा हो लेकिन ये किसी भी प्रकार से किसी भी व्यक्ति की जिंदगी में बिना इजाजत की दखलंदाजी ही है जो शायद कानून के दायरे से बाहर है

लगभग लाखों-करोड़ों यूजर्स ने सोशल नेटवर्किंग वेबसाइटों पर अपना भरोसा जताते हुये अपनी व्यक्तिगत और पारिवारिक सूचनाओं को ऑनलाइन किया है, लेकिन क्या ये सही है ! ये कोई भी नहीं जानता.

लेकिन इसका भविष्य अगर नकारात्मक रूप में लिया जाये तो ये इन वेबसाइटों का सबसे खतरनाक पहलू भी हो सकता है, इसका असर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से हमें दिखायी भी दे रहा है...कहीं बच्चे सामूहिक मौत का खेल खेलने में लगे हैं तो कही कोई किसी के प्रोफ़ाइल से उसके बारे में गोपनीय सूचनायें इकट्ठी कर के उसके अपहरण और हत्या की साजिश रचता है

कभी कहीं सामुदायिक कम्यूनिटी बनायी जा रही है जो हर तरह के अप्राक्रतिक क्रत्यों का मुख्य स्थान हैं तो कहीं ये किसी आतंकवादी गतिविधि का भी केंद्र बनते जा रहे हैं.
बात खत्म कर रहा हूँ लेकिन समस्या खत्म होने का नाम नहीं ले रही बल्कि ये शायद विकराल रूप भी ले सकती है अगर इन वेबसाइटों पर अंकुश न लगाया गया तो....

शनिवार, 1 मार्च 2008

सभी ब्लॉगर्स मित्र ध्यान दें

आज शास्त्री जी के ककनमठ के बारे में लेख पढकर मन में फ़िर से अपने मातृभूमि ब्लॉग को जीवित रखने की इच्छा जाग्रत हुई है ये ब्लॉग केवल हिन्दी विकिपीडिया और देश के लिये समर्पित है, अतः इस ब्लॉग के लिये कोई भी सदस्य बन सकता है क्योंकि ये भले ही सामुदायिक(कम्यूनिटी ब्लॉग) है लेकिन इसमें किसी के भी हित के साथ अन्याय नहीं किया जायेगा! बल्कि सभी लोग इस ब्लॉग में वो जान्कारियां जुटायेंगे जो न पहले कभी सुनी न कभी पहले देखी.

तो फ़िर देर किस बात की मैं बस आपसे एक ई-मेल की दूरी पर हूँ जितने चाहे सदस्य बनें, मैं आपको आमंत्रित करता हूँ.

अगर आपके पास अपने शहर के बारे में जानकारी है तो आप इसमें लिख सकते हैं.

इसमें लिखने के लिये निम्न बातें आप जुटा सकते हैं जैसेः-- इतिहास,भाषा,रहन-सहन,पर्यटन,वर्तमान और औधोगिक जानकारियां भी हो सकती हैं.

तीन बातें जो इस ब्लॉग के लिये समर्पित हैं

1. हिट और आंकड़ों से इसे दूर रखा जायेगा
2. बेकार के वाद-विवाद को तो न कभी प्रकाशित किया जायेगा और न ही उसे कोई रूप दिया जायेगा, और कभी ऐसा हो भी जाता है तो उसे सभी साथियों द्वारा निपटाया जायेगा
3. इसके सारे लेख हिन्दी विकिपीडिया में साथ-साथ प्रकाशित करने की भी कोशिश की जायेगी जिससे विश्व को हिन्दी और भारत देश के बारे में जानने का मौका मिलेगा

नोटः चिट्ठाजगत,नारद,ब्लौगवाणी,हिन्दीब्लौग्स आदि के मुख्य कर्ता-धर्ताओं को इस ब्लॉग को अपने एग्रीग्रेटरों मे शामिल करने के लिये मैं फ़िर से आग्रह करता हूं?

अतः निवेदन स्वीकार किया जाये

आपका
कमलेश मदान

गुरुवार, 28 फ़रवरी 2008

फ़रवरी माह के नये सितारे (एक अवलोकन)

एक बार फ़िर से चिट्ठा अवलोकन का समय आ चुका है क्योंकि फ़रवरी माह का अंतिम दिन कल है लेकिन समय की कमी के कारण इसे एक दिन पहले ही प्रकाशित करने की मजबूरी है, पिछली चिट्ठा अवलोकन जो मेरे ब्लॉगर मित्रों की पोस्ट और शायद उसका अनुचित कारण ये भी हो सकता है..... के नाम से प्रकाशित हुई थी उनमें कुछ नाम और चिट्ठों की चर्चा की कमीं रह गयी थी आशा करता हूं कि इस बार ये कमी भी पूरी हो जाये लेकिन बढते चिट्ठाकारों और पोस्टों की संख्या के कारण मुख्य चिट्ठे ही शामिल हो पायेंगे! आप सभी लोगों से क्षमा चाहता हूँ

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पहली पोस्ट एक जन्मदिन के रूप में मिली को वाह मनी ब्लॉग की थी कमल जी को शुभकामनाओं के साथ बने रहने के लिये धन्यवाद क्योंकि मैं समझता हूँ कि उनके पाठक दिन दूनी रात चौगुनी रफ़्तार से बढ रहे हैं, आगे रवि रतलामी जी जिनकी चर्चा मैं कभी भी नहीं कर सका लेकिन वो हम सब के आदर्श और पथ-प्रदर्शक भी हैं उन्होने भी चिट्ठाकारों के लिये 13 यक्ष प्रश्न.... पूछ कर सबको हैरत और एक अच्छा रास्ता दिया आगे बढने का.

यूं तो फ़रवरी माह काफ़ी उतार चढाव वाला था लेकिन यह महीना बेटियों और चोखेरबालियों के लिये भी जाना जायेगा जिन्होने अपने बेटी और महिला यां औरत होने के अहसास को जगाये रखा, हालांकि भड़ास में भी काफ़ी उथल-पुथल भी मची इस बात को लेकर कि यशवंत जी ने चोखेर बाली में प्रवेश किया लेकिन उनका आना जाने के बराबर रहा और इस अप्रत्याशित कदम के कारण ब्लॉगजगत में काफ़ी हो-हल्ला भी मचा.

नीलिमा जी जहाँ अपनी फ़ेमेनिज्म से बाहर नहीं निकल पा रहीं थी और उनकी गोल रोटियां चुगली कर रहीं थीं वहीं दूसरी ओर निशा जी हमें नये-नये पकवान बनाना सिखा रहीं थीं.


अभी दो ही दिन गुजरे थे कि समीर जी अचानक से अपनी उड़नतश्तरी में प्रकट हुये और अपने लोटे के गायब होने की सूचना दर्ज करायी तो दूसरी ओर पंगेबाज भाई जो एकदम से सीरियस होकर पंगेबाजी कर रहे थे उनको शायद अपने बचपन का कोई कीड़ा मिल गया था जो वो अपने सभी ब्लॉगर बंधुओं को दिखा-दिखाकर खुश हो रहे थे(यानी कि अपने बचपन में खो गये थे),भाई कीर्तीश जो अपने कार्टून्स के द्वारा काफ़ी पैनापन लिये रहे चाहे वो नैनो हो यां किडनी कांड सबके लिये वो चहेते बने रहे,तो वहीं दूसरी ओर आलोक पुराणिक जी अपने छात्रों के निबन्ध टीप-टीप कर टॉप पर बने रहे! कमाल का बैलेंस है भिड़ू
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हालांकि 23 जनवरी को ही बेटियों के ब्लॉग की नीवं पड़ गयी थी लेकिन फ़रवरी आने तक इसका स्वरूप और काफ़ी विस्तार हो चुका था अविनाश जी ने एक साहसिक और बेटियों को समर्पित ब्लॉग बनाया जो चर्चा का विषय भी बना और एक बाप-बेटी की हसरतों और उनके संवादों का आइना भी बना, वहीं 4 फ़रवरी को जनवरी की महिलाओं के ऊपर कटाक्ष और वाद-विवाद ने चोखेर बाली नामक ब्लॉग को जन्म दिया जो नारी शक्ति और एक मिसाल का सूचक बनता जा रहा है धन्यवाद बेटियों! धन्यवाद चोखेरबालियों

फ़िर मोहल्ले में चलना होगा क्योंकि दीप्ति दुबे जी बोल रही हैं इस बार जो दलित और सवर्णो की चिंगारी इस पोस्ट में उठी थी उसे दिलीप मंडल जी ने अपने आंकड़ों और वाद-विवाद ने शोला बनाकर रख दिया, हालाकि ये विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा तो वहीं दूसरी ओर भड़ास में भी आपसी मतभेद की छिटपुट घटनायें हुयीं कुछ लोगों ने अपने ही साथियों को भड़ास के स्तर गिराने और चोला बदलने के विवाद को उठाया लेकिन भड़ास! भड़ास है फ़िर से एक नया हिट फ़ार्मूला लेकर आया वो भी आधासच के जरिये (आधासच एक स्पेशल ब्लॉग है जिसे हाइनेस मनीषा और उनकी अन्य साथी संचालित करती हैं )


लेकिन मोहल्ला और भड़ास में एक ही कमी दिखी वो है किसी एक पोस्ट के ज्यादा देर तक टिके रहने की इस बात को लेकर यशवंत जी और संजय जी ने भी पोस्ट लिखी और मैने भी एक समाधान भी दिया था! अब देखें आगे क्या इस पर अमल होता है यां नहीं ये तो वक्त बतायेगा.
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अब कुछ नये और कुछ सक्रिय चेहरों की जिन्हे हम जानते है और नहीं भी

शुरूआत अजदक वाले प्रमोद जी से करते है इस बार की उनकी सक्रियता और चुहलबाजियां लोगों ने चटखारे ले-लेकर पढीं तो वहीं दूसरी ओर हमारे बीच एक वरिष्ठ और उम्दा कहानीकार सूरजप्रकाश जी भी आये जिनकी कहानियों ने ब्लॉगजगत में एक कमी को पूरा सा कर दिया है आशा करते है वो इसी तरह अपने लेखन को आगे बढायेंगे,
रविश कुमार जी के कस्बे का चित्रण इस बार अच्छा लगा तो वहीं दूसरी ओर अविनाश जी की दिल्ली दरभंगा की छोटी लाइन भी देखने को मिली,कहीं किसानों के लिये हमारे पंकज अवधिया जी जुटे रहे हैं तो कहीं दूसरी ओर सेलगुरू नये-नये मोबाइल फ़ोन दिखा-दिखा कर हम सबका दिमाग खराब कर रहे हैं.

चलो इस बार मैथिली जी के जिन्दगी-लाइफ़ की टक्कर में हमने भी अपना स्टाइल ब्लॉग मैदान में उतार दिया है(वैसे मैथिली जी के मैं कहीं आगे-पीछे भी नहीं टिकता हूँ)
इस बार खराशें में अपनी मनमोहक मुस्कान लिये सुरजीत दिखायी दिये तो दूसरी ओर जीतू जी भी हर तरफ़ से कमाई के चक्कर में लगे रहे क्यों न लगें आखिर एडसैंस वालों ने नया मकान गिफ़्ट जो दिया है(माफ़ कीजियेगा मजाक कर रहा हूँ वरना जीतू जी मुझे मारने(मिलने) दौड़े चले आयेंगे और फ़िर बतायेंगे कि उनके चिट्ठे पर एडसैंस का क्या हो रहा है?)

खैर ममता जी ने भी डबल जश्न मनाया एक तो ब्लॉग की सालगिरह का और दूसरा दो सौ वें चिट्ठे की पोस्टिंग का! बधाई....
यमराज जी भी अचानक प्रकट हुये तो कॉपीराइट को लेकर हमारे तीसरे खंबे वाले दिनेशराय द्विवेदी जी भी डराते रहे

हमारे ज्ञान दद्दा जी ने चुपके-चुपके इस बार के रेल बजट में अपना ट्रांसफ़र यानी कि विभाग की अदला-बदली करके ब्लॉगजगत को ज्ञान बिड़ी की सप्लाई में कटौती करने का एलान किया है ,देखते हैं कब तक चलेंगें

जाते-जाते.......
एक बात और कहना चाहूँगा कि यह माह भी महिला चिट्ठाकारों और बेटियों,महिलाओं और चोखेरबालियों के नाम रहा लगभग हर बीस में से आठ-नौ औसतन महिला चिट्ठे यां उनसे जुड़ी खबरों,वाद-विवाद का अनुपात रहा जो ब्लॉगजगत में महिलाओं की बढती हिस्सेदारी को प्रबल करता है.


कमलेश मदान

बुधवार, 27 फ़रवरी 2008

मार्लबोरो लाइट (Marlboro Light)

मार्लबोरो लाइट- ये कहानी है एक ऐसी पीढी की जिसने .आधुनिकता की अंधी दौड़ में खुद को पीछे कितना धकेल दिया है, ये कहानी है एक ऐसी लड़की की जिसने अपना चेहरा कितनी बार बदला और हर बार उसका चेहरा पहले से ज्यादा बदसूरत होता चला गया.

आज अपने ऑफ़िस के बाहर एक छोटी सी अच्छी खासी दुकान पर चाय -नाश्ता करने गया तो कुछ ही देर में एक जींस टी-शर्ट पहने एक लड़की प्रकट हुयी,आँखों पर बड़ा सा साठ के दशक का चश्मा चढाये हुये, बड़े ही इत्मीनान से बोलती है "फ़ोर मार्लबोरो लाइट प्लीज".


बस यहीं से कहानी बनाने का आइडिया मिला.......


नोट: ये कहानी लड़कियों और युवा वर्ग में बढते नशे और डिप्रेशन के फ़लस्वरूप लिखी गयी है, इसके पात्र और घटनायें काल्पनिक है अतः कोई भी वाद-विवाद और इस कहानी को अन्यथा ना ले!


अब कहानी की ओर चलें

अनन्या! हाँ उसका नाम अनन्या ही था, पैदा हुयी थी तो माँ-बाप को तो जैसे सारी खुशियाँ एक साथ मिल गयीं थीं, सबकी आँखों का तारा थी वो
उसकी हर फ़रमाइश,हर इच्छा पलक झपकते ही पूरी हो जाती थी.
कुछ बड़ी हुयी तो बोर्डिंग स्कूल भेज दिया गया, बस यहीं से उसकी जिंदगी में दोहराव आने लगा, खालीपन उसकी जिंदगी को एक अनजानी दिशा की ओर धकेल रहा था.
जिंदगी में बदलाव,लोगों के प्रति नजरिया,शारीरिक बनावट और बढती उम्र उसे और भी उलझन में डाले हुये थे, समझ नहीं आता था कि अब क्या करे-क्या न करे?
जैसे तैसे बोर्डिंग से पीछा छुड़ाकर कॉलेज में दाखिला लिया था, पर यहां भी अकेलापन उसका पीछा कर रहा था लेकिन अब उसको उन बातों से लड़ने की शक्ति और समझ आ चुकी थी, दोस्तों की संगत में सिगरेट और शराब उसको अच्छे लगने लगे थे.
सोचती थी जिंदगी के मजे नहीं लूटे तो क्या किया?बस! यही सोच उसे और कमजोर करने लगी,

बात-बात पर चिड़चिड़ापन,मानसिक थकान,लड़ाई झगड़े उसकी पहचान बन चुके थे,भ्रम में थी कि दुनियां से टक्कर लेना कितना आसान है,
कॉलेज के बिगड़े रईसों के ग्रुप की शान थी वो, इसी दौरान जिंदगी के सारे अनछुये पहलुओं को जान गयी थी, अब अनन्या बड़ी हो गयी थी यां ये कह सकते हैं कि "यूथ" लेबल वाली हो गयी थी.

अपने अतीत को तो उसने शायद अपने कपड़ों जैसे चिंदी-चिंदी कर रखा था बस बचा था एक नाम जो उसके माँ-बाप ने बड़ी हसरतों से उसे दिया था.

अभी कल ही की तो बात है एक डिस्को में रेव-पार्टी के दौरान पुलिस के छापे में उसका भी नाम शहर के अखबार में आया था काफ़ी (बद)नाम हुयी थी माँ-बाप ने तो घर से निकाल दिया, लेकिन उसको तो मानों कानों में जूँ तक नहीं रेंगी.

कुछ समय बाद अखबार के एक कोने में एक फ़ोटो दिखायी देता है और साथ में उसके बारें में भी लिखा है कि एक लड़की ने बिल्डिंग के सातवें फ़्लोर से कूदकर आत्म-हत्या कर ली है, मरने का कारण नशीली गोलियों का सेवन बताया गया था लेकिन सुसाइड नोट में उसने लिखा था कि "मैं आजाद होना चाहती हूँ"


वो अनन्या ही थी!.............. अब वो आजाद थी!

रविवार, 24 फ़रवरी 2008

सूचना का अधिकार (Right to Information Act)

सूचना का अधिकार (Right to Information Act): सरकारी पैसा,कामकाज और सूचना पाना जो पहले कभी ना-मुमकिन हुआ करता था आज हर आदमी के बस की बात हो चुका है.

इस अधिकार को ना केवल आम आदमी बल्कि गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाल हर शख्स कर स्कता है और अपने हक के बारे में जानकारी और आँकड़े जुटा सकता है.

लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी होता है इस अधिकार को जन-साधारण त पहुँचाने और उनको उनके अधिकारों के बारे में इंगित करने की.तो आइये पहले हम खुद ही इस बारें में पता लगाते हैं कि क्या है ये सूचना का अधिकार और कैसे ये आम आदमी का अधिकार है

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005

सूचना का अधिकार अधिनियम (Right to Information Act) भारत के संसद द्वारा पारित एक कानून है जो 12 अक्तूबर, 2005 को लागू हुआ (15 जून, 2005 को इसके कानून बनने के 120 वें दिन)। भारत में भ्रटाचार को रोकने और समाप्त करने के लिये इसे बहुत ही प्रभावी कदम बताया जाता है। इस नियम के द्वारा भारत के सभी नागरिकों को सरकारी रेकार्डों और प्रपत्रों में दर्ज सूचना को देखने और उसे प्राप्त करने का अधिकार प्रदान किया गया है। जम्मू एवं काश्मीर को छोडकर भारत के सभी भागों में यह अधिनियम लागू है।

सूचनाऍ कहाँ से मिलेगी ?

-केन्द्र सरकार,राज्य सरकार व स्थानीय प्रशासन के हर कार्यालय में लोक सूचना अधिकारियों को नामित किया गया है।
-लोक सूचना अधिकारी की जिम्मेदारी है कि वह जनता को सूचना उपलब्ध कराएं एवं आवेदन लिखने में उसकी मदद करें.

कौन सी सूचनाऍ नही मिलेंगी ?

-जो भारत की प्रभुता, अखण्डता, सुरक्षा, वैज्ञानिक या आर्थिक हितों व विदेशी संबंधों के लिए घातक हो.

-जिससे आपराधिक जाँच पड़ताल,अपराधियों की गिरफ्तारी या उन पर मुकदमा चलाने में रुकावट पैदा हो.
-जिससे किसी व्यक्ति के जीवन या शारीरिक सुरक्षा खतरे में पड
-जिससे किसी व्यक्ति के निजी जिन्दगी में दखल-अंदाजी हो और उसका जनहीत से कोई लेना देना ना हो.

स्वयं प्रकाशित की जाने वाली सूचनाऍ कौन सी है ?

-हर सरकारी कार्यालय की यह जिम्मेदारी है कि वह अपने विभाग के विषय में निम्नलिखित सूचनाऍ जनता को स्वयं दें

-अपने विभाग के कार्यो और कर्तव्यों का विवरण ।
-अधिकारी एवं कर्मचारियों के नाम, शक्तियाँ एवं वेतन ।
-विभाग के दस्तावेजों की सूची ।
-विभाग का बजट एवं खर्च की व्यौरा ।
-लाभार्थियों की सूची, रियायतें और परमिट लेने वालों का व्यौरा।
-लोक सूचना अधिकारी का नाम व पता

सूचना पाने की प्रक्रिया क्या है?

-सूचना पाने के लिए सरकारी कार्यालय में नियुक्त लोक सूचना अधिकारी के पास आवेदन जमा करें । आवेदन पत्र जमा करने की पावती जरुर लें ।
-आवेदन पत्र के साथ निर्धारित फीस देना जरुरी है ।
-प्रतिलिपि/नमूना इत्यादि के रुप मे सूचना पाने के लिए निर्धारित शुल्क देना जरुरी है

सूचना देने की अवधि क्या है ?

सूचनाऍ निर्धारित समय में प्राप्त होंगी
-साधारण समस्या से संबंधित आवेदन 30 दिन
-जीवन/स्वतंत्रता से संबंधित आवेदन 48 घंटे
-तृतीय पक्ष 40 दिन
-मानव अधिकार के हनन संबंधित आवेदन 45 दिन

सूचना पाने के लिए आवेदन कैसे बनाऍ ?

-लोक सूचना अधिकारी, विभाग का नाम एवं पता ।
-आवेदक का नाम एवं पता ।
-चाही गई जानकारी का विषय ।
-चाही गई जानकारी की अवधि ।
-चाही गई जानकारी का सम्पू्र्ण विवरण ।
-जानकारी कैसे प्राप्त करना चाहेंगे-प्रतिलिपि /नमूना/लिखित/निरिक्षण ।
-गरीबी रेखा के नीचे आने वाले आवेदक सबूत लगाएं ।
-आवेदन शुल्क का व्यौरा-नकद, बैंक ड्राफ्ट, बैंकर्स चैक या पोस्टल ऑडर ।
-आवेदक के हस्ताक्षर, दिनांक ।

सूचना न मिलने पर क्या करे ?
-यदि आपको समय सीमा में सूचना नहीं मिलती है, तब आप अपनी पहली अपील विभाग के अपीलीय अधिकारी को, सूचना न मिलने के 30 दिनों के अन्दर , कर सकते हैं ।
-निर्धारित समय सीमा में सूचना न मिलने पर आप राज्य या केन्द्रीय सूचना आयोग को सीधा शिकायत भी कर सकते हैं ।
-अगर आप पहली अपील से असंतुष्ट है तब आप दूसरी अपील के फैसले के 90 दिनों के अन्दर राज्य या केन्द्रीय सूचना आयोग को कर सकते हैं ।

सूचना न देने पर क्या सजा है ?

लोक सूचना अधिकारी आवेदन लेने से इंकार करता है, सूचना देने से मना करता है या जानबुझकर गलत सूचना देता है तो उस पर प्रतिदिन रु. 250 के हिसाब से व कुल रु. 25,000 तक का जुर्माना लगाया जा सकता है

अपील कैसे करे ?


-अपीलीय अधिकारी, विभाग का नाम एव पता।
-लोक सूचना अधिकारी जिसके विरुद्ध अपील कर रहे हैं उसका नाम व पता ।
-आदेश का विवरण जिसके विरुद्ध अपील कर रहे हैं ।
-अपील का विषय एवं विवरण ।
-अपीलीय अधिकारी से किस तरह की मदद चाहते हैं ।
-किस आधार पर मदद चाहते हैं ।
-अपीलार्थी का नाम, हस्ताक्षर एवं पता ।
-आदेश , फीस, आवेदन से संबंधित सारे कागजात की प्रतिलिपि

सूचना पाने के लिए निर्धारित शुल्क

विवरण केन्द्र सरकार


आवेदन
शुल्क रु. 10/-

अन्य शुल्क ए-4 या ए-3 के कागज के लिए रु. 2/ प्रति पेज
बड़े आकार का कागज/नमूना के लिए वास्तविक मूल्य
फ्लापी या सीडी के लिए रु. 50/-

रिकार्ड निरिक्षण का शुल्क पहला घंटा -नि.शुल्क, तत्पश्चात हर घंटे के लिए रु. 5/-

अदायगी नकद / बैंक ड्राफ्ट / बैंकर्स चैक / पोस्टल आडर्र के रुप में


नोट: गरीबी रेखा से नीचे रहने वालों को कोई शुल्क नही देना पड़ता हैं


ज्यादा जानकारी के लिये पता है और वेबसाईट भी है

केन्द्र सूचना आयोग ब्लाँक न. 4, पाँचवी मंजिल, पुराना जे.एन.यू. कैम्पस,

नई दिल्ली-110 067, वेबसाइट: cic.gov.in , फोन/फैक्स -011-26717354


आप भारत का राजपत्र भी देख सकते हैं बस यहाँ क्लिक करें,ये पी.डी.एफ़. में है और चाहे तो सेव यां प्रिन्ट भी कर सकते हैं.