गुरुवार, 31 जनवरी 2008

दीप्ति जी क्या केवल किसी महिला से उसके विचार पूछने से ही आप शान्त हो जायेंगी?

दीप्ति जी क्या केवल किसी महिला से उसके विचार पूछने से ही आप शान्त हो जायेंगी? क्या ये चापलूसी नहीं है? क्यों आप खुद को इतना असहज महसूस कर रहीं हैं क्या राजधानी दिल्ली के बाहर कोई और आपका देश नहीं है? मैने देखा है.......

मैने देखा है अभी पिछले महीने आगरा से भोपाल जाते वक्त एक महिला किसी खास स्टेशन से चढती है और आगे जाकर पन्द्रह-बीस मिनट के बाद किसी छोटे से गाँव सरीखे स्टेशन पर चैन स्नैचिंग करती है, उसकी हिम्मत की अभी मैं मन ही मन दाद दे रहा था कि करीब ढाई-तीन सौ महिलाओं-लड़कियों का दल पलक झपकते ही रेलगाड़ी में चढ गया पूछने पर पता चला कि उस स्टेशन पर वो गाड़ी नहीं रूकती है इसलिये उन मोहतरमा ने पिछले स्टेशन से चढकर गाड़ी रूकवाना ठीक समझा. ये सब आंगनबाढी योजना के तहत काम करती हैं इनमे से अधिकांशतः महिलायें टीचर थी कई घरेलू औरते थी तो लगभग सभी अपने-अपने रोजगार चला रहीं हैं


अभी आगे... मुम्बई गया वहाँ जिन्दगी को सबसे करीब से देखा, देखा कि शाम के धुंधलके में लड़कियों की कतारें हैं, मुझे कुछ समझ नहीं आया लेकिन मेरे मित्र ने बताया कि ये लड़कियां वेश्याव्रत्ति करती हैं, मैने कारण भी पूछा तो जवाब आया जो काफ़ी अजीब सा भी लगा और वाजिब भी कि ये लड़कियां अपनी इस हालत के लिये खुद ही जिम्मेदार हैं, कोई हीरोइन बनने के चक्कर में तो कोई किसी के धोखे में मारी गयी है, किसी के घर की ये इकलौती कमाने वाली होती है तो किसी को ये कमाने का सबसे आसान तरीक लगता है. सौ-दौ सौ रूपयों के लिये अपने शरीर को बेचती ये महानगरीय लड़कियां! क्या इन के लिये छोटे शहर और काम की कमी रह गयी है.यां इनका आत्मविश्वास इतना सीमित है कि वो अपने वजूद को नहीं पहचान सकती? क्या उन्हें अब भी किसी से झूठी प्रशंसा के बोल सुनने की जरूरत महसूस होती जो इन शरीर से खेलने के लिये कही गयीं हों?

और हाँ मुद्दा आप को लग रहा है हम पुरूषों को ये समस्या लगती है, क्योंकि हमारे भी परिवार हैं, हमारे यहाँ भी आप जैसी बहन बेटियां हैं क्या हम उनको उनके पहनावे के लिये नहीं कहते? जी कहते हैं, उनकी समस्याऐं सुनते हैं उनसे शेयर करते हैं लेकिन स्त्री गुण होने के कारण वो आज भी बाहरी और घर के पुरूषों से दस गज फ़ासला रखती हैं, क्या हमने मना किया है नहीं ना! लेकिन वो जानती हैं कि उनका नैतिक कर्तव्य क्या है,स्त्री होना इस दुनियां का सबसे पवित्र धर्म है और इस धर्म को बचाये रखने में स्त्री और पुरूष दोनों का परम कर्तव्य है।
कोई स्त्री यां पुरूष खराब नहीं होती बस खराब होती है तो उसकी सोच और उसका नजरिया जिसे चाहकर भी कोई बदल नहीं सकता क्योंकि अगर कोई स्त्री सोचेगी कि हर पुरूष बलात्कारी है तो वो उसकी गलती है और अगर कोई पुरूष सोचता है कि हर स्त्री वेश्या है तो वो उसकी गलती है.

बस!

अब अगर बहस जारी रहती है तो शायद मुझे लगेगा कि अब बात को रबड़ की तरह खींचा जा रहा है.

कमलेश मदान

सोमवार, 28 जनवरी 2008

मेरे ब्लॉगर मित्रों की पोस्ट और शायद उसका अनुचित कारण ये भी हो सकता है.....

जनवरी के पहले ही दिन से काफ़ी सार्थक बहस,चिंतन,चर्चाएं और विवादास्पद लेखों ने जन्म लिया जो केवल नारी-लड़कियों और समाज में बढते खुलेपन और शर्मनाक परिस्थियों के ऊपर केंद्रित हैं......

पहले-पहल भड़ास ने नववर्ष की पूर्व संध्या पर हुयी घटना पर चिंतन और आक्रोश व्यक्त किया जो जायज है, भड़ास का ये रूप भी काफ़ी प्रशंसनीय है,उसके लेख जो क्रमवार प्रकाशित हुये वो ये हैं.......
लड़कियों यदि तुम घर से बाहर निकली तो तुम्‍हारे साथ भी यही होगा
भारत मे नारी का अपमान
हम भारतीय शायद ही कभी जिम्मेवार माता-पिता रहे हो ?

अब उसके बाद जीतू भाई ने भी प्रतिक्रिया स्वरूप एक पोस्ट लिखी जो इसी घटना के ऊपर सचित्र है,जागो मुम्बईकर, ढूंढ निकालो इन दरिंदो को

अभी ये थमा ही नहीं था कि शिवकुमार जी ने एक नया सार्थक मंच बनाकर इस बहस को आगे बढाया जो सराहनीय कदम बना,रीढ़हीन समाज निकम्मी सरकार और उससे भी निकम्मी पुलिस डिजर्व करता है नाम से प्रकाशित ब्लॉग चर्चा में काफ़ी रहा.इस बात की चर्चा टिप्पणीकार ने भी एक पोस्ट में की जो इस चर्चा को आगे बढाने के लिये काफ़ी था.ऐसे-वैसे वस्त्र पहनने या न पहनने वाली स्त्रियों लड़कियों का बलात्कार करना मैन्डेटरी है ये शब्द इस पोस्ट को घातक बनाने के लिये काफ़ी थे.

अब बारी थी एक नारी यानी ममता जी की, उन्होने बदलती मानसिकता के ऊपर जो प्रश्न किया वो काफ़ी हद तक जायज था.काफ़ी कुछ मीडिया और बदलती मानसिकता के ऊपर लिखने का साहस उन्होने इस कपडे या मानसिकता क्या खराब है ... नाम के ब्लॉग मे किया जो सराहनीय कदम था.

तेज रफ़्तार चलते हुये आम से सनसनी बनने वालों में पद्मनाभ मिश्र ने काफ़ी हो-ह्ल्ला मचाकर अपनी सार्थक उपस्थिति को दर्ज करवाया है.

मोहल्ला ये शब्द भी अपने आप में सनसनी है जो तेज प्रतिक्रिया के लिये काफ़ी मशहूर हो चुका है, उन्होने तो लगभग एक सीरीज बनाकर इस समाज की बखिया उधेड़नें में कोई कसर नहीं छोड़ी है..मादा होने से बड़ी सज़ा कुछ नहीं नाम का ब्लॉग अपने आप में काफ़ी कुछ है जो चर्चा बन गया.

मेरे हिन्दी-लेखन प्रेरणा गुरू और सम्मानीय शास्त्री.जे.सी.फ़िलिप. जी ने भी इस पर लेख लिखे जो समाज को आईना दिखाते प्रतीत हो रहे हैं,बलात्कारी एवं मनोविज्ञान नामक लेख एक अपने आप में सार्थक मंच है जो शास्त्री जी की देन है.

एक और महिला चिट्ठाकार जो अपने आप में एक स्तम्भ हैं घुघूती बासूती जी जिनके कटाक्ष के आगे कोई चिट्ठा नहीं टिक पाया है उन्होने सीधे-सीधे खुल्लमखुल्ला मोलेस्ट करेंगे हम इनको की चेतावनी दे डाली है.

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जहाँ तक मुझे दिखायी दे रहा है उसके लिये हमें थोड़ा पीछे पलटकर देखना पड़ेगा क्योंकि शायद इस पलटनें में ही सारे पन्ने खुद-ब-खुद खुल सकते हैं...........
आज से तकरीबन पन्द्रह-बीस साल पहले लोग कितने खुश मिजाज हुआ करते थे, रामायण-महाभारत जैसे सीरियल हर दिल की जान हुआ करती थी लेकिन जब 1996 में तत्कालीन प्रधानमंत्री ने विदेश नीति की घोषणा की तो देश का बुरा वक्त उसी समय से चालू हो गया था.

सबसे पहले हमला बोला केबल-टी.वी.की आँधी ने जो अपने साथ बेवॉच,बोल्ड एंड द ब्यूटिफ़ुल,फ़ैशन टी.वी.,देर रात्रि वयस्क प्रोग्राम लेकर हर घर और हर ड्राइंग रूम तक पहुँच गयी, उसके बाद विदेशी उत्पाद और फ़िर लोक लुभावन नौकरियां और विदेशी बैंको द्वारा प्रदत्त कर्ज ने रही सही भारत के मध्यम वर्ग की कमर तोड़कर रख दी है.

शायद मैने मोहल्ला में ही पढा था कि लार्ड मैकाले ने कहा था कि" भारत के लोगों को जीतना हो तो उसे विदेशी संस्क्रति से रूबरू करवाओ बाकी वो खुद ब खुद हमारे अधीन हो जायेंगें"

ये शब्द स्वर्ण अक्षरों की तरह हमारे देश की किस्मत पर लिखे जा चुके हैं.अब आगे कितनी भी बहस हो यां ना हो इस देश और इसको चलाने वालों को कोई सारोकार नहीं कि कितनी बलात्कार हो रहे हैं यां कितने लोग खुद को नशे यां गर्त में डुबा रहे हैं उन्हें तो बस इकॉनॉमी ग्रोथ दिखनी चाहिये.

शनिवार, 5 जनवरी 2008

राजधानी में बिहारी

द्रश्य एक: सुबह के 8 बजे के लगभग का समय!
पटना से चलकर आने वाली सम्पर्क क्रान्ति एक्सप्रैस में बिहार से आये गरीब तबके के लोग गाड़ी में अपने खड़े होने के स्थान पर गहरी सांसे लेकर दिल्ली के आने का बेसबरी से इंतजार कर रहे हैं......
कुछ लोग बिहार से अपने लोगों से मिलने आये हैं और कुछ काम के सिलसिले में, क्योंकि इनके अपने बिहार में इनके लिये काम नहीं है ये लोग वहाँ रहकर कमा-खा भी नहीं सकते क्योंकि कुछ दबंगई और कुछ वहाँ की सरकारें उनको जीने नहीं देती.

द्रश्य दो: ट्रेन प्लेटफ़ार्म पर धीरे-धीरे रूकने को है, ट्रेन के रूकते ही अचानक रेलवे पुलिस के डंडे चमकने लगे जो इन निरीह प्राणियों पर बरसने लगे. ये बेचारे क्या कहते क्योंकि अगर रोजी-रोटी कमानी है तो ये सब इसकी अच्छी शुरूआत है.रेलवे पुलिस होने का अगर जौहर इन बिहार से आये शांत और भोले-भाले लोगों पर न दिखाया तो वो रेलवे पुलिस का नहीं हो सकता।
चाहे आँखों के आगे से अपराधी निकल जाये और चाहे रेलवे स्टेशन पर बिना इनकी इजाजत के पान-सिगरेट भी बिक जायें लेकिन बिहार से आये इन लोगों को तंग न करें ऐसा नहीं हो सकता।

अब दिल्ली का विहंगम द्रश्य:रिक्शा खींचते, रेहड़ी लगाते,मजदूरी करते, काम के लिये किसी बस में बैठते और कहीं भी इन बिहारियों के लिये बड़ी ही अपमानजनक टिप्पणी सुनने को मिलती है जो लगभग पूरे भारत में एक समान ही है
"साले इन बिहारियों ने तो पूरे देश की ऐसी की तैसी कर रखी है, इनका बस चले तो ये साले पूरे देश को बिहार बना दें"

माफ़ कीजियेगा उपर लिखी गयी गाली का प्रयोग मैं नहीं करना चाहता था लेकिन सच्चाई बयां करने की विवशता के आगे ऐसा करना पड़ा.

दिल्लीवासी कहते हैं कि दिल्ली से अगर बाहरी खासकर बिहार के लोगों को हटा दिया जाये तो दिल्ली न्यूयॉर्क बन जाये!
इनके लिये बिहार शब्द घ्रणा का शब्द बन चुका है और आम बिहारी घ्रणा के पात्र.लेकिन खुद ये लोग भूल जाते हैं कि लगभग 70 प्रतिशत दिल्ली इन बाहरवालों के ही रहमों-करम पर आश्रित है, अगर ये लोग न हों तो कौन इनको जल्दी-जल्दी रिक्शे से घर,ऑफ़िस पहुँचायेगा, कौन इनका बोझा उठाकर इनके लिये काम करेगा वो भी सस्ते में!,दस लोगों के बराबर काम करके आधी मजदूरी में आपकी बिल्डिंग को कौन बनवायेगा?,अरे किसको गाली देंगें किसके ऊपर भड़ास निकालेंगें?
कौन सी फ़ैक्ट्री मैं ये लोग काम नहीं करते? क्या मिलता है बस! तिरस्कार और कुछ रहने ले लिये! माफ़ कीजियेगा छुपने के लिये दड़बा. ये शब्द ठीक है ना? आप अगर कॉलेज में हैं तो कॉलेज आपको तवज्जो नहीं देगा, किसी ऑफ़िस में हैं तो तरक्की का अवसर शायद मिल पाये और अगर तरक्की हो भी जाये तो उतना सम्मान नहीं मिल सकता.

किसी चिट्ठे पर पढा था कि बिहार का नाम सुनते ही बैंक एकाउंट,क्रेडिट-कार्ड,लोन वाले दूर भाग जाते है ये बात बिल्कुल सत्रह आने सच है, क्योंकि ये लोग चोरों,उठाईगीरों बदमाशों और धोखाधड़ी करने वालों का साथ देते हैं लेकिन इनके लियेये अपने दरवाजे बन्द रखते हैं।

अब मतलब की बात:मैं कोई बिहार से नहीं हूँ लेकिन मैं इनका दर्द समझ तो सकता हूँ, किसी ट्रेन में जब ये लोग खड़े-खड़े ही सफ़र करते हैं चाहे वि ट्रेन पूरी की पूरी खाली क्यों न हो! बड़ा विचलित करता है.
किसी भी बिहार से आये व्यक्ति के लिये सम्मान तो दूर उनको टिकट दिलवाने के नाम पर डंडे मिलते हैं,रिक्शावाले से पुलिस वाले गुंडे पैसे लूटते हैं और तो और यहाँ के निक्कमे आवारा टाइप के लोग इनको नशे की लत में डाल देते है ताकि ये लोग कमाते रहें और ये खाते.
इनको चुनाव आयोग दिल्ली का नहीं मानता लेकिन सरकार इन आश्रितों के लिये कुछ भी नहीं करती है क्योंकि बड़े-बड़े दावे और वादे करना ही इन सरकारों का मुख्य शगल रहा है|

तो क्या इन सरकारों का कोई दायित्व नहीं है जो इन लोगों और इस समाज के अभिन्न अंग को मुख्यधारा में लाये,
कब ये सरकारें एयरकंडीशन युग से बाहर निकलेंगी और कब इन ठंड से ठिठुरती इस रीढविहीन दशा से मुक्ती देंगीं?

शनिवार, 29 दिसंबर 2007

आधी रात के चेहरे

घर जब लौटता हूँ तो मुझे वो वक्त मिलता है जिस समय लोग उठने की तैयारी कर रहे होते हैं यां मीठे सपनों में खोये रहते हुये इन सर्द रातों में खुद् को गर्म लिहाफ़ में जकड़े रहते हैं, अक्सर ही मुझे रात के गहरे सन्नाटे में ना जाने क्या कुछ अलग महसूस होता है जो किसी दिन के उजाले में नहीं मिलता मसलन् जैसे किसी चाय वाले के पास इकट्ठा भीड़ एक छोटी सी टी.वी. के सहारे अपनी बाकी रात गुजार रही होती है,वहीं पास के चौराहे पर ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मी कुछ शिकार के लिये और कुछ मजबूरी में अपनी जंग लगी रायफ़लों के सहारे ऊंघ रहे हैं।

फ़ुटपाथ के किनारे सोये हुये बेघर परिवार का बच्चा भूख से रो रहा है तो उसकी माँ उसे उठाकर बड़े दुलार से अपने आँचल में समेटकर उसे सुलाने की पूरी कोशिश कर रही है क्योंकि जब पेट में रोटी नहीं है तो आँचल में दूध कैसे होगा?

किसी गली से गुजरो तो किसी जर्जर काया से निकलती खाँसने की आवाज मानो उन्हें मुक्ति दिलाने के लिये बेचैन हो रही हो यां किसी जगह नाली किनारे जलते अलाव और फ़ेकें हुये शराब के गिलास सर्द रातों से लड़ने की जिजीविषा दर्शा रहे हों.

इस रात में कुछ ऐसे भी हैं जो सर्द् होते मौसम की परवाह न करके धुंध को चीरकर अपने लिये दो रोटी की तलाश में निकल पड़े हैं (हॉकर,दूधवाले,सब्जीवाले,वाहन चालक,रद्दीवाले आदि.) लेकिन इन लोगों को मौसम का क्या वो तो एक सूखी लकड़ी की तरह हैं जिसमें किसी मौसम का असर नहीं.

सारा शहर एक अजीब सी जुगनुओं की मीठी धुन में खोया रहता है,कभी-कभी चौकीदारों की सड़क पर बेमन से पटकी हुयी लाठी और आवेश में बजायी सीटी और दूर आपस में एक दूसरे से देश के नेताओं की तरह लड़ते कुत्ते मानों इस रात को और भी रहस्यमयी बना देते हैं............

सड़क कह रही हो मुझे अब तो सोने दो मैं थक चुकी हूँ लेकिन मेरे लिये वो फ़िर से बाहें फ़ैलाये कह रही हैं कि कल फ़िर मुलाकात होगी.

बुधवार, 26 दिसंबर 2007

कहिये हम किस गली जा रहे हैं ?

अपने वजूद को तलाशती युवा पीढी आज न जाने किस रास्ते को अख्तियार कर ले इस बात का कोई भरोसा नहीं है क्योंकि पैसे की चाह और जल्दी ऊँचा उठने का ख्वाब उन्हे इस मोड़ पर भी ले जाता जहाँ उन्हें सिर्फ़ अराजकता और कुंठा के अलावा कुछ भी हासिल नहीं होता.

इसका ताजा उदाहरण पाकिस्तान भी है तो अमेरिका भी!
भारत भी कम अछूता नहीं है और बाकी सारी दुनियां में भी रोष बढता ही जा रहा है।
बेनजीर की हत्या फ़िदायन और आत्मघाती हमलावर युवा ही थे और ग्लास्गो एयरपोर्ट, लंदन मैट्रो,अमेरिका की यूनिवर्सिटी, भारत की संसद-अक्षरग्राम आदि सब इनके उदाहरण हो सकते हैं

अब असल मुद्दा- ये लोग कैसे बनते हैं हिंसक,कुंठित और द्वेष भावना के शिकार ?

इसका सटीक और एक ही जवाब है वहाँ की सरकारें और उनकी नीतियाँ.

सरकारें और पार्टियों का मकसद युवा पीढी को किसी प्रकार का रोजगार यां सहायता होता है क्योंकि युवा ही देश के कर्णधार होते हैं लेकिन इनका मकसद अब केवल उनको पार्टी हित के लिये मर-मिटने और आत्मघाती बनाया जा रहा है, किसी भी सरकार की युवाओं के लिये कोई रोजगार गारंटी नहीं है अगर है तो वो है आतकवादी और कट्टरपंथी बनने की शर्त पर.

माओवाद जो भारत में दीमक के समान फ़ैल रहा है उसके समानांतर हम बोडो,पाक आतंकियों, दंगईयों और आक्रोशित युवाओं को भी बढते हुये देख रहे हैं, पाकिस्तान और दूसरे अमेरिका विरोधी देशों में अनपढ-बेरोजगार युवकों को केवल आत्माघाती हमलावर और आतंकवाद का प्रशिक्षण दिया जा रहा है जिससे उन देशों की सरकारों का दबदबा कायम रहे और उन्हे बाकी दुनियां से अलग रख सके.

ये सब कहाँ से हो रहा है? कहाँ से पैसा आ रहा है? क्यों ये युवा किसी से नहीं डरते? क्यों सरकारें मूक दर्शक बनी बैठी हैं?

इन सब सवालों के जवाब के लिये सरकारों को अपने गिरेबां मे ही झांकना होगा क्योंकि उन्ही के फ़ैलाये गये अविश्वास के बीज आज आतंकवाद और कुंठा के बबूल के रूप में आगे बढ रहे हैं.

बुधवार, 19 दिसंबर 2007

गरीबी सिर्फ़ अमीरों के लिये है!

अखबारों,समाचार चैनलों,ब्लॉग्स आदि में गरीबी का दुखड़ा रोकर मगरमच्छी आंसूं बहाने वाले ये लोग क्या किसी मायने में गरीब कहलाने के लायक हैं?,किस गरीब ने कोई ब्लॉग देखा है? और अगर देखा भी है तो उसे क्या मिला, किस जरूरतमंद को ये न्यूज चैनल वाले रोटियां बाँट रहे हैं और तो और ये लोग इस पर लिखकर वाह-वाही भी लूट रहें हैं.

क्यों कोई बिहार के लिये आगे नहीं आता, क्यों किसी को उड़ीसा नजर नहीं आ रहा, क्यों असम में गरीबों के ऊपर लाठियां चलाते वक्त हमारे देश के सभी चैनल उसे कवरेज नहीं देते अगर देते हैं तो उस नग्न लड़की के शरीर को!

देश चलाने वाले हमेशा से गरीबी हटाने के तमाम वायदे कर अपनी चुनावी जनसभायें और सत्ता की ओर मार्ग प्रशस्त करके आगे निकल जाते हैं और पीछे रह जाता है तो बस अवाक् खड़ा गरीब और लाचार इंसान जिसे अपने ठगे जाने का एहसास नहीं होता,

किस गरीब के पास सरकार की योजनाओं का लाभ पहुँचता है? यां ये कहिये कि किसी गरीब को सरकार ने ठेंगा दिखाने के अलावा क्या दिया.आज ठंड से ठिठुर रहे किसी गरीब को बीस एक राजनेताओं ने मिलकर एक शॉल क्या ओढा देते है तो वो पब्लिक की नजर और समाचार,पत्र-पत्रिकाओं के हीरो बन जाते है,किस गरीब के पास राशन-कार्ड होता है जबकि किसी अमीर के पास बैंक में खाता खुलवाने के लिये राशन कार्ड भी मिल जायेगा क्यों ?

राजनीते की दुकान चलाने वाले गरीबी का सौदा ही तो करते हैं जिससे बदलें वो विश्वस्तर के लूटखोर बन सकें ताजा उदाहरण दिलीप मंडल जी ने इस ब्लॉग पर दिया है.

क्या आप ये सोचते है कि आप ब्लॉग,समाचार और टी.वी. पर तो बहुत लिख लेते हैं पर जब कोई सचमुच का गरीब आपके द्वार खड़ा होता है तो फ़िर आप क्या करते है?

मैं भी आप लोगों में हूं लेकिन हम लोगों को भ्रष्ट होती सरकार और गरीबी का मजाक उड़ाते लेख लिखने के मोहपाश को छोड़कर किसी सच्चे लेखन की ओर जाना चहिये.

क्योंकि गरीबी के ऊपर लेख लिखने से टिप्पणियों की बौछार तो हो सकती है लेकिन गरीब के आंसू के रूप मे.

शुक्रवार, 14 दिसंबर 2007

तस्वीरें जो बोलती हैं-भाग 2

मेरी एक पोस्ट तस्वीरें जो बोलती हैं के लिये मुझे काफ़ी प्रोत्साहन मिला जिसके फ़लस्वरूप मैने आज इसका दूसरा भाग पोस्ट करने के लिये फ़िर से देश के जाने-माने छायाचित्रकारों (फ़ोटोग्राफ़रों) के चित्रों की मदद ली है, जैसा कि मैने पहले भी कहा था कि प्रत्येक चित्र के लिये एक ब्लॉग लिख सकता था लेकिन फ़िर आज यही कहूंगा कि इससे इन चित्रों की आत्मां ही मर जायेगी.

हर चित्र के लिये टाइटिल (शीर्षक) असली हैं जिसे खुद छायाकारों ने प्रदान किये हैं.

तो आइये देखें इनकी नजर से अपने प्यारे भारत देश के 'असली' रूप को



















INNOSANCE.:(इनोसैंस):.पवित्रता













SCHOOL .:(स्कूल):. विधालय



















ALONE WITH GOD .:(अलोन् विद् गॉड):. ईश्वर के साथ अकेले














THE REFREASHMENT .:(द रिफ़्रेशमैन्ट):. तरोताजा करना












THE TASTE OF INDIA.:(द टेस्ट ऑफ़ इन्डिया):. स्वाद भारत का















BALANSING ACT .:(बैलैंसिंग एक्ट):.संतुलन कला


















FIRST CLASS .:(फ़र्स्ट क्लास):.प्रथम श्रेणी















DREAM IS NEVER B/W .:(ड्रीम इज नैवर ब्लैक/व्हाइट) :.सपने कभी श्वेत-श्याम नहीं होते


















THE RUN .:(द रन):. दौड़













NEXT IN LINE .:(नैक्स्ट इन लाइन):. अगला कतार में है


















MARKET ON WHEELS .:(मार्केट ऑन व्हील्स):. पहियों पर बाजार


















TIREDNESS .:(टाइर्डनैस):. थकान













POTRAIT OF CROW .:(पोट्रेट ऑफ़ क्रो):. कौए का चित्र



















SATISFACTION .:(सैटिसफ़ैक्शन):. संतुष्टि


















PAN CAKES .:(पैन केक्स):. केक



















GHOST BAGGER .:(घोस्ट बैगर):. प्रेत भिखारी














HOW WE AND ? .:(हाउ वी एन्ड?):. हमारा अंत कैसा होगा?

आँखें

इन आँखों ने क्या-क्या नहीं देखा. बस नहीं देखा तो एक पल भर की खुशी,इन आँखों ने क्या-क्या नहीं खोया,बस नहीं खोया तो इसमें बहने वाले आँसू, इन आँखों को दोष देने से पहले ये जमाना सारे गुनाह छुपा लेता है, इन आँखों के लिये वो अपनों को भी पराया कर देता है फ़िर भी उसे इन आँखों से कुछ हासिल नहीं होता।

इन आँखों ने गुजरात जलते देखा,अयोध्या लुटते देखा,हिन्दू-मुसलमान,सिख-ईसाइयों को अपनों के हाथों कटते-जलते देखा.

जिन हाथों ने जिसे बचपन से पाला उन्ही हाथों मे उसका खून देखा, जिस खेत में झूले झुलाये उन्ही खेत-गाँव में उसकी इज्जत तार-तार होते देखा.

इन्ही आँखों ने देश के संसद पर हमला होते देखा तो इन्हीं सांसदों ने रामसेतु पर हमला किया,

आज देश गरीब हो गया तो मुझे दिखता नहीं ये जमाना कहता है, पर जब गरीब किसान मरता है तो लोग मुझ पर कीचड् उछालते हैं.

आज हर औरत वेश्या और हर आदमी गुलाम बनने को मजबूर हो रहा है लेकिन सब फ़िर भी मुझे कहते है कि मुझे दिखता नहीं.

आज का बच्चा पहले पिस्तौल फ़िर बात करता है,आज की बच्ची पहले गर्भ-निरोधक दवा और फ़िर दोस्ती करे और फ़िर भी मुझे कहे कि मुझे दिखता नहीं है.

आस्तीन में साँप पालकर मुल्क को गद्दारों के हाथ सौंपकर कहते हो कि मुझे दिखता नहीं.



......आखिर इन आँखों को कैसे दिख सकता है जिसने अपनी आँखों पर पट्टी बाँध रखी है,

क्योंकि मैं कानून की आँखें हूं।