सोमवार, 30 जुलाई 2007

पंगेबाज का भविष्य के गर्भ का फ़ाइनल पार्ट

पिछले दिनों जब मैं बाहर क्या चला गया कि पंगेबाज भाई ने भविष्य के गर्भ से पार्ट टू भी लांच कर दिया लेकिन वो इसका फ़ाइनल पार्ट बनाते इससे पहले हमने ही गुरू पंगेबाज को उन्ही की स्टाईल में पटकनी देने का विचार बना लिया।
तो अब हाजिर है भविष्य के गर्भ से का फ़ाइनल पार्ट् जो हमारे पंगेबाज दादा की आंखे खोल दे यां वो मेरी आखें फ़ोड् देंगे इस ब्लाँग को पढने के बाद।

कुछ ध्यान रखने योग्य बातें > जैसे कि कुछ लोगों को भगवान इन्द्रदेव और नारद जी ने मीटिंग करके अमरता का वरदान दिया है.
1. उड्न-तश्तरी> ये भाई साहब को आजकल नारद जी ने अपना पर्सनल सैक्रेटरी चुन लिया है. इनके बाबा-आदम जमाने के उडन्-खटोले को नारद जी ने किसी यू.एफ़.ओ. से एक्स्चेंज ऑफ़र के तहत बदलवा दिया है जिससे उनका आवगमन सुलभ हो सके क्योंकि हर ब्लॉगर के पास पहुँचने में देर हो जाती थी. इसकी स्पीड भी काफ़ी प्रकाशवर्ष् तेज है और ये हर अत्याधुनिक सुख्-सुविधाओं से लैस है।
2.खुशी > जो तरकश की पॉडकास्टर हैं उनको इन्द्रदेव ने खुश होकर अपने यहाँ पॉडकास्टिंग यानी की ब्लॉगर एफ़. एम. की मुख्य वक्ता घोषित कर रक्खा है. आज इन्द्रलोक में अप्सरायों का न्रत्य नहीं बल्कि ब्लॉगर एफ़.एम. गूंजता है.
3.नारद की पूरी टीम को नारद ने स्पेशल सेल बनाकर दे दी है क्योंकि इनके द्वारा ही नारद जी इस लोक पर अवतरित हुये थे.

चलिये अब शुरू करें.....
आज सन् 3007 का समय है स्थान ब्लॉगर-लोक (प्रथ्वीलोक्) का नया नाम और समय है ब्लॉगर-युग क्योंकि कलयुग को ब्लॉगरों ने अपने ब्लॉग्स से पाट दिया था. आज ब्लॉगर एफ़.एम. पर ब्लॉगर-मुनि यानी कि मैं (कलयुग में मै कमलेश मदान नाम का प्राणी हुआ करता था पर मेरे लेखन कार्य से ग्रसित होकर नारद जी ने मुझे भी अमरता फ़्री में दे दी.)मेरा आज खुशी के साथ साक्षात्कार था.
पेश है उसकी कुछ झलकियाँ--------
खुशी- मुनिवर हमने सुना है आप प्रथ्वीलोक के वासी थे लेकिन किसी पंगेबाज नामक व्यक्ति से आप भी घबराते थे क्यों?
मैं-- क्या बतायें हम उनसे घबराते नहीं थे बल्कि उस समय जो पंगेबाज ने अपनी असुरी शक्तियों का प्रयोग हम निरीह प्राणियों पर अपने उलूल-जुलूल पंगेबाजी द्वारा किया था वो असहनीय था. फ़िर एक दिन हमने उन्हें उनके कार्यों पर चेताया भी था कि संभल जाओ पर वो नहीं माने और आज प्रेत-योनि भुगत रहे हैं.

खुशी- सुना है उनकी कुछ पंगेबाजी उस लोक के कुछ पुलिसवालों यानी नगररक्षकों से भी हुयी थी?
मैं-- हाँ ये भी हमें पता था लेकिन हम लोग उनके डर के कारण चुप थे.

खुशी- अपने प्रशंसकों और विचारकों को कोई सन्देश देना चाहेंगे आप?
मैं--प्यारे ब्लॉगर्-लोक वासियों कभी भी पंगेबाजी के टेढे रास्ते से चलने से अच्छा है खुद का ब्लॉग सुधारो! हमेशा नये लेखकों को प्रोत्साहित करो और टिपियाना भूलो मत वरना आज प्रेत बनकर इस तरह भट्कोगे कि ढूढते रह जाओगे!

गुरुवार, 26 जुलाई 2007

तुरत-फ़ुरत के सब साथी

आज जब जल्दी-जल्दी में दफ़्तर के लिये निकला तो याद आया मेरा मोबाईल और पर्स छूट गया है, सो वापस जल्दी-जल्दी घर पहुँचे. घर पहुँच कर देखा तो बीवी कराह रही थी. हमने पूछा क्या हुआ तो जवाब मिला " जल्दी-जल्दी सीढियों से उतर रही थी,गिर पडी. चलो अब आये हो तो मुन्नी को स्कूल भी छोड्ते जाना!"

मुझे पहले से ही देर हो रही थी कि उपर से बिन्-बुलायी मुसीबत गले पड गयी. चलो पत्नी पीडित होने की सजा भुगतनी पडी.मुन्नी को छोड्कर जैसे ही दफ़्तर के लिये रवान हुये कि पता चला कि जल्दी-जल्दी में हम जुराब अलग-अलग पहन कर चल दिये हैं ये भी फ़जीहत। चलो किसी तरह औफ़िस पहुँचे तो याद आया कि आज शनिवार है आँफ़िस का कार्यकाल समाप्त होने को है अर्थात सिर मुढाते ही ओले पड गये तिस पर जले पर नमक ये कि बाँस का सामना हो गया. फ़ुँकारे मार रहे बाँस के आगे भीगी बिल्ली बनना पडा सो अलग.अब काटो तो खून नहीं वाला हिसाब हो चला था सारी जल्दी-जल्दी धरी रह गयी थी.
बाँस ने तीन घंटे का ओवर-टाईम करवाया वो भी बिना किसी इंटरवल के. भूख के मारे पेट में आँते कुलबुलाने लगीं लेकिन उस यमराज के दूत को रहम नहीं आया मानों सारा होमवर्क मुझे ही करना था।

किसी तरह शाम को जब छुट्टी हुई तो जल्दी-जल्दी घर की तरफ़ निकल लिये, इससे पहले हम बस-स्टाप पर पहुँचते बस हमसे पहले निकल चुकी थी. वाह रे किस्मत ! अब तो जी में आया कि किसी रेल याँ बस के नीचे जान दे दें. लेकिन मजबूर इंसान कुछ भी नहीं कर सकता सिर्फ़ अपनी दुर्दशा पर रो सकता है. सो हम पैदल ही चल दिये घर की तरफ़ क्योंकि हमारे पास इतना पैसा नहीं कि टैक्सी का भाडा दे सकें.

घर पहुँचते ही हमारी पत्नी ने जो दुखद समाचार सुनाया वो इस प्रकार है कि " आज जल्दी-जल्दी के चक्कर में खाना बनाते वक्त कुकर हाथ से छूट्कर नीचे गिर गया था,सारी सब्जी फ़ैल गयी. घर में जो रखा था वो मैने और मुन्नी ने बनाकर खा लिया अब आपको भूखे ही सोना पडेगा"
सो हम भी पानी पीकर जल्दी-जल्दी सोने का प्रयास करने लगे क्योंकि कल से फ़िर जल्दी-जल्दी सारे काम करने होंगे.

बुधवार, 25 जुलाई 2007

कभी-कभी दर्द बयां नही होता बस! आह निकलती है

जुम्मन मियाँ आज भी अपनी दर्जी की दुकान पर फ़ीता टांगे कपडे को मशीन पर घड्-घड् करते हुये दोनों पैरों को तेजी से चला रहे थे, मेरे आने का अहसास पाकर वो जरा रूके और बोले " मियाँ बडे दिनों के बाद आना हुआ"
मैने कहा" हाँ चचा अब शहर में ही अपना घर ले लिया है,अब तो ये गाँव बेगाना सा हुआ लगता है. काफ़ी अरसा हुआ अपनी मिट्टी देखे. लेकिन चाचा आप बताओ आप् कैसे हैं?

बस मेरे इतने कहते ही उनका चेहरा सुर्ख हो गया और आँखों में नमी आ गयी. थोडा रूककर फ़िर खाँसकर गला साफ़ करते हुये बोले " बेटा आज तीन साल हो गये मेरे सलीम को गये, आज तक कोई पता नहीं चला कहाँ है वो. सभी जगह ढूंढ मारा लेकिन वो नहीं मिला, किस मनहूस घडी मे वो रूपये कमाने शहर गया था? ना कोई चिट्ठी-ना कोई पता जमीं खा गई यां आसमान निगल गया कमबख्त को !

सलीम उनका इकलौता बेटा था. गाँव का सबसे होशियार लडका जिसके आगे सब मुरीद थे. लेकिन आज से करीब तीन साल पहले वो रात को गायब हो गया और आज तक लौट कर नहीं आया.जुम्मन चाचा ने उसकी शादी के लिये कितने अरमान जोड रखे थे उसके लिये लेकिन वो सब तोड गया.

जुम्मन चचा पथरायी आंखों से टूटे हुये चश्में को संभालकर बोले " बेटा तुम तो पुलिस इंस्पेक्टर हो, क्या तुम मेरे बेटे को ढूंढ्कर नहीं ला सकते?

बस उनके इतना कहते ही मेरे खून में करंट दौड्ने लगा, मेरे तो काटो तो खून नहीं वाला हिसाब हो चला था क्योंकि एकमात्र मैं ही जानता था कि सलीम कहाँ था.

आज से करीब तीन साल पहले शहर की सीमा में फ़र्जी एनकाउंटर में जो तीन लोग मैने मारे थे उनमें सलीम भी था. मेरी तरक्की हो गयी और तमगे मेरी वर्दी की शोभा बढाने लगे लेकिन सब बेमानी था,मेरी वर्दी मेरे अपनों के खून से रंगी हुयी थी. बस एक सवाल मेरे दिल में था कि इन बूढी आँखों के सामने मेरी हिम्म्त कैसे हुयी आने की |

क्योंकि सलीम को मैनें मारा था |

सोमवार, 23 जुलाई 2007

हैरी पॉटर भईये तुम तो छा गये!

आज जब दिल्ली में जे.के. रोलिंग की किताब के लिये लाइन लगी देखी तो मुझे आश्चर्य हुआ कि भारतीयों को हो क्या गया है?
मेरे मित्र ने जब किताब खरीदने की बाबत मुझसे पूछा तो मेरा जवाब सुनकर वो हँसने लगा क्योंकि मैं उस किताबी जादूगर को नहीं जानता था याँ शायद मैं उसकी नजर में मूर्ख घोषित हो चुका था।
किस तरह से नर-नारी-बच्चे उस 975 रू0. वाली किताब के लिये लालायित हो रहे थे मैं आश्चर्य से पागल हुआ जा रहा था। लेकिन मैं सोचने लगा कि उस किताब को मुश्किल से कोई भी आधा घंटा लगायेगा पडने में लेकिन ये कोई नहीं सोचता कि उस 975 रू.0 में क्या किसी गरीब बच्चे का भला होगा?


कुछ दिनों पहले इंटरनेट पर मुझे ये झकझोर करने वाले चित्र मिले जिसमें एक तरफ़ तो एक भूख से कुपोषित हुआ बच्चा है तो दूसरी सदी का महान आश्चर्य यह है कि शीशे के दरवाजे में भीख माँगते बच्चे की तस्वीर हमें मुह चिडा रही है.
वाह इंडिया !
क्या ये सही है कि हम हिन्दुस्तानी इतने गिर गये हैं कि महज दिखावे और अंधी दौड में पागल हुये जा रहे हैं. कहाँ हैं वो संवेदनायें? जब दान करना हो तो नेशनल न्यूज बन जाते हैं और जब वासना के पुजारी बन जाते हैं तो निठारी और गोआ में बच्चे ढूढते फ़िरते हैं।



ये सब तो उन पागल अंग्रेजों की चालें हैं जो हमारे बच्चों को सुपरमैन, पोकोमैन्, हैरी-पोटर बनाने में लगे हुये हैं,यां शायद काफ़ी हद तक सफ़ल भी हो चुके हैं।

यौन-शिक्षा,एडल्ट चैनल,एडस ये सब उस गन्दी विरासत की देन हैं जिसको अपनाने के लिये इस पावन-पवित्र देश को महज चन्द रूपयों के लिये झुकना पड रहा है क्योंकि ये भारत देश् भी मेट्रो कल्चर यानी दूसरे शब्दों में खुलापन अपनाना चाहता है।

आज लगभग हर जगह सेक्स,कालगर्ल स्कैंडल,चाइल्ड पोर्नोग्राफ़ी,फ़्री-सेक्स टूरिस्म,अबोर्शन,कम उमर में शादीयां जैसे विषय ही सुनने को मिल रहे हैं क्यों?
क्योंकि हम यही चाहते हैं और हमारी यही नियति है.
फ़िर कभी हम शायद जन्-गन्-मन् जैसे राष्ट्रगान अपने बच्चों के मुँह से सुन पायेंगे क्योकि तब तक बहुत देर हो चुकी होगी क्योंकि वो तब तक वो हैरी-पोटर नुमा संसार में खो चुके होंगे।

बुधवार, 18 जुलाई 2007

माँ-(मेरा एक महत्वाकांक्षी लेख)-भाग-प्रथम

काफ़ी समय से मैं इस लेख के लिये व्यथित हो रहा था कि कब मैं अपना अनुभव और एक खूबसूरत सच्चाई को किस तरह लिखूं । मैने इस लेख के लिये दिन-रात मेहनत की है,और यह सच्चाई लिखने के समय मेरे हाथ काँप रहे थे क्योंकि जिस विषय पर मैं लिख् रहा था वो एक शब्द ही नहीं वरन् अपने आँचल में पूरा संसार समेटे हुये है।

मैं अपने मन की बात छोटी-छोटी कहानियों के द्वारा प्रस्तुत कर रहा हूँ आशा है आप सभी इस छोटे को प्यार देंगे। अगर कोई बात किसी को बुरी यां अपने से जुडी लगे तो मुझे जरूर लिखे जिससे मेरा लिखा सार्थक हो जायेगा|

तपती दुपहरी में कजरी अपने पसीने की परवाह किये बिना सीमेंट-गारे के तसले को सिर पर उठाये हुये तेजी से सामने वाली बिल्डिंग की ओर बढने लगी कि अचानक उसकी दुधमुँही बच्ची (जो लगभग तीन दिन से भूखी थी) भूख से व्याकुल होकर रोने लगी,उधर ठेकेदार चिल्ला रहा था, कजरी ने आव न देखा ताव एक तमाचा बच्ची को दिया जिससे बच्ची सहमकर चुप हो गयी.....

अभी पिछले साल की ही तो बात है उसका पति कल्लू शराब पी-पीकर चल बसा बस छोड गया तो कजरी और उसके पेट में पल रही उसकी संतान.बेचारी कजरी पर मानो दुख का पहाड टूट पडा, घरवालों ने उसे निकाल दिया तब से वो सडकों पर किसी तरह से भटककर अपना और बेटी का पेट भर रही थी.

.....ठेकेदार ने कजरी को गन्दी-गन्दी गालियाँ देते हुये उसे नीचे से ऊपर तक लालची निगाहों से देखा. इस बात को कजरी ने भाँप लिया लेकिन दिहाडी की खातिर वो चुप थी जैसे-तैसे अपने फ़टे हुये आँचल से अपने आपको ढका और काम पर लग गई. शाम को जब काम खत्म हुआ तो ठेकेदार ने कजरी को दिहाडी देने से मना कर दिया और कहने लगा कि तू ठीक से काम नहीं करती है अगर काम सीखना है तो मेरे साथ चल मैं तुझे सिखाउंगा कि काम कैसे होता है? बेचारी कजरी समझ चुकी थी लेकिन भूख और औलाद के आगे विवश इंसान अंधा हो जाता है। कजरी पीछे-पीछे चल दी और लगभग दो घंटे बाद जब ठेकेदार की कोठरी के बाहर निकली तो हाथों में तो कागज के कुछ टुकडे थे लेकिन चेहरे पर एक उदासीनता थी. वो तेजी से अपनी बच्ची की तरफ़ जाने लगी क्योंकि काफ़ी दिन से बच्ची भूखी थी.

कजरी को उसके रोने की आवाज नही आ रही थी लेकिन शायद उसे लग रहा था कि वो भूख से रो-रोकर सो चुकी होगी.इसीलिये वो तेजी से उस ओर कदम बढाने लगी जहाँ बच्ची सो रही थी। पास पहुँचकर जब कजरी ने देखा कि कुछ कुत्ते उसकी बेटी के आस-पास मंडरा रहे हैं तो वो ठिठक गयी. एक पत्थर उठाकर जब कुत्तों को भगाकर देखा तो उसके हाथ से उसकी मेहनत से कमाये हुये रूपये छिटक गये क्योंकि बच्ची ने भूख से दम तोड् दिया था |

सोमवार, 16 जुलाई 2007

नारद जी! आप कहाँ थे जब ये पोस्ट आयी?

कभी-कभी लगता है खुद नारद के कर्णधारों को विवादों से जुडे रहना अच्छा लगता है। मुझे लगने लगा है कि अश्लीलता और विवादास्पद लेखों को नारद पर आने देना ही सभी लोगों की नियति बन गयी है क्योंकि जिस प्रकार का लेख आज (नारद की पाली खतरनाक चुड़ैल सावधान ) नारद पर प्रकट हुआ है शायद वो विवादों को जन्म देने के लिये काफ़ी है. कुछ दिन तक हो-हल्ला मचेगा फ़िर नारद जी उस पर बिना किसी कार्यवाही किये बिना अपना वही पुराना राग अलापते रहेगें कि नारद पर भाषा यां शैली में कोई अश्लीलता यां विवादास्पद टिप्पणी प्रकाशित नहीं होने दी जायेगी

मान्यवर सुभाष जी को शायद ये अहसास नहीं हिन्दी भद्रजनों की भाषा है आप जैसे लेखकों से कतई उम्मीद् नहीं की जा सकती कि आप जिस भाषा क उपयोग कर रहे हैं वो आप की मनोःस्थिति को दर्शाती है कि आप किस स्तर के लेखक हैं

प्रस्तुत है इस लेख की एक छोटी सी कडी जिससे शायद नारद के कर्ण्धारों की नींद खुल सके....तू बालकों को डरा रांड. और अपने नारद के खसमों के साथ सो .हमारा नाम मत ले कुलबोरनी तो तू है छटी छिनाल. नारद के सभी मुसटंडों में तू ने एडस फैला रक्खा है वे भी तेरे पापों से मरेंगे और तू भी बहुत जल्द धीरज रख .सब जगह मुँह काला करती है और दूसरों पर लांछन लगाती है. बदजात.

शुक्रवार, 13 जुलाई 2007

कुछ इधर-उधर की....


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी


बकरी चराने वाली बनी 'स्टार गर्ल'
दिल में कुछ करने का जज्बा हो तो राह अपने-आप बन जाती है। कुछ ऐसा ही कर दिखाया है बोचहां के पटियासा जालान गांव की अनीता ने। मधुमक्खी पालन में सफलता की नई कहानी लिखने वाली एक मजदूर की बेटी अनीता कुमारी को यूनिसेफ ने स्टार गर्ल चुना है। दिल्ली में महात्मा गांधी सेवा सदन में आयोजित कार्यक्रम में बिहार से अनीता कुमारी, झारखंड से सूर्यमणि एवं मध्य प्रदेश से कृष्णा ने भाग लिया था, जिसमें अनीता का चुनाव किया गया।
दिल्ली से लौटने के बाद अनीता ने बताया कि राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम से भी बातचीत करने का उसे मौका मिला। राष्ट्रपति ने उसे हरसंभव मदद का आश्वासन देते हुए उसके कार्य की सराहना की है। अनीता बताती है कि उसके पिता जनार्दन सिंह मजदूरी कर किसी तरह परिवार का भरण-पोषण करते थे। अपने घर की बदहाली देख अनीता ने मधुमक्खी पालन का निर्णय लिया। ट्यूशन के पैसे बचाकर वर्ष 2003 में उसने दो रानी मक्खियां खरीदीं। देखते ही देखते अनीता का व्यवसाय चल निकला। आज उसके पास 100 बक्से हैं। मां रेखा देवी स्वयं सहायता में जुड़ी तो उसे और बल मिला। अब अनीता को मध्य प्रदेश के बिंद जिले के ग्रामीण इलाकों में महिलाओं और बच्चों को प्रशिक्षण देने का काम सौंपा गया है।
गौरतलब है कि बचपन में अनीता के माता-पिता उसे स्कूल नहीं भेजना चाहते थे, पर वह अपने इरादे की पक्की थी। जब उसे बकरी चराने के लिए भेजा जाता था तो वह भागकर स्कूल चली जाती थी। ग्रामीणों के कहने पर उसके पिता ने उसे स्लेट खरीद दी। गरीबी के कारण उसने गांव के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर अपनी पढ़ाई पूरी की। अनीता की मेहनत रंग लाई, मैट्रिक की परीक्षा में उसने फ‌र्स्ट डिवीजन से पास की। एमडीडीएम कॉलेज, मुजफ्फरपुर से बीए पार्ट वन की परीक्षा देने वाली अनीता पूरे विश्व में बिहार का नाम उजागर करना चाहती है। आज उसकी चर्चा सबकी जुबान पर है और सभी अपनी-अपनी लड़की को अनीता से सीख लेने की बात कहते फिर रहे हैं।

ऐसी दुकान जहाँ कोई दुकानदार नहीं
आमतौर पर दुकान में सामान बेचते दुकानदारों को तो आपने सब जगह देखा होगा, लेकिन ऐसी दुकानें नहीं देखी होगी जहां कोई दुकानदार ही न हों। आप सोच रहें होंगे कि ऐसा कैसे हो सकता है, लेकिन मिजोरम में बिना दुकानदार के दुकान की अवधारणा काफी लोकप्रिय हो रही है।
यहां लोग काफी दूर से पैदल चलकर सामान खरीदने आते हैं और दुकान में किसी भी दुकानदार के मौजूद नहीं होने के बावजूद सामान लेकर ईमानदारी के साथ वहां रखे बक्से में पैसे रखते है और चले जाते हैं। यहां से 70 किलोमीटर दूर सिलींग और कीफंग गांव में हरेभरे जंगलों के बीच स्थित ये दुकानें इस रास्ते से गुजरने वाले थके मांदे पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र हैं। मणिपुर की सीमा से लगे मिजोरम के इस पूर्वोत्तर क्षेत्र में पहुंचने के लिए राजधानी एजल से करीब सात घंटे की थकान भरी ड्राइविंग करनी होती है।
हालांकि, रास्ते में पड़ने वाली ऐसी अनेक दुकानों को जिसे स्थानीय भाषा में 'नगाहलोह दावर' कहते हैं। इससे ताजी हरी सब्जियां, फल और अंडों को खरीदने में किसी के द्वारा बाधा नहीं पहुंचाई जा सकती है। ऐसी एक दुकान के मालिक और किसान वनलालदिका (29) अपनी पत्नी और बच्चों के साथ नजदीक के ही एक गांव में रहते हैं और पिछले तीन वर्षोसे उनके जीवनयापन का मुख्य साधन दुकान ही हैं। हर सुबह वनलालदिका सब्जियां अपने दुकान में लगाता है और वहां एक छोटा बक्सा रख वहां से एक किलोमीटर दूर अपने खेत में चला जाता है। जो लोग वहां से गुजरते हैं ताजी सब्जियां खरीदकर उतने पैसे बक्से में डाल जाते हैं।
वहीं, वनलालदिका ने संवाददाता को बताया कि कोई भी हमारी सब्जियां नहीं चुराता है। मैं एक छोटे कार्डबोर्ड पर उन वस्तुओं की कीमत लिख उसके पास ही रख देता हूं। लोग यहां अक्सर आकर सब्जी और फल खरीदते हैं और दुकान से जाने से पहले पैसे बक्से में डाल जाते हैं। उन्होंने कहा कि अगर उनके पास खुले पैसे नहीं होते हैं तो वे बक्से से निकाल लेते हैं। उन्होंने कहा कि वह चार से पांच सौ रुपये प्रतिदिन कमा लेते हैं।

बुधवार, 11 जुलाई 2007

गधों की विचित्र दुनिया

1.
सीधाई और सच्चाई के प्रतीक गधों और खच्चरों के परिश्रम को सम्मान देते हुए नेपाल में अब इन निरीह प्राणियों को साप्ताहिक अवकाश दिए जाने का फैसला हुआ है।
नेपाल के दुर्गम हिमालयी क्षेत्र संखुवसाभा में सड़कों के अभाव में मालवहन के लोकप्रिय साधन गधों और खच्चरों की कड़ी मेहनत को सम्मान देने के लिए स्थानीय व्यापारियों ने उन्हें भी साप्ताहिक अवकाश देने का फैसला किया है।
इतना ही नहीं क्षेत्र के व्यापारियों ने खच्चर व्यापारी संरक्षण संघ 'मेपा' का भी गठन किया है। वहीं 'मेपा' से जुड़े एक व्यापारी नारद राम ने कांतिपुर टाइम्स से कहा कि हमारे इलाके में सड़कें नहीं है। लिहाजा हम परिवहन के लिए पूरी तरह से इन प्राणियों पर निर्भर हैं। हमने सोचा कि उनकी वजह से ही हम कमाते खाते हैं तो उन्हें भी सप्ताह में एक दिन अवकाश दिया जाना चाहिए।
उल्लेखनीय है कि स्थानीय व्यापारी खच्चरों के माध्यम से खूब कमाई करते हैं। एक खच्चर अस्सी किलोग्राम तक का बोझ ढोता है। इनसे प्रति किलोग्राम सात रुपये के भाव से प्रतिदिन चार सौ से 600 रुपये तक की कमाई होती है। भारत की सीमा से लगते सुदूर पश्चिमी नेपाल के इस इलाके में लगभग 1900 गधे और खच्चर दुर्गम पर्वतीय क्षेत्र के गांवों में आवश्यक वस्तुएं पहुंचाते हैं। वहीं यहां गधों और खच्चरों की उपयोगिता को देखते हुए इनकी कीमत एक जर्सी गाय से दो से तीन गुनी या एक मोटरसाइकिल की कीमत से कम नहीं है। स्थानीय व्यापारियों के इस कदम से पशु अधिकार संगठन भी खुश हैं।
2. अदालत में गधे का क्या काम है,लेकिन यहां कांचीपुरम में अदालती कार्यवाही का सामना इस प्राणी को भी करना पड़ा। इसकी वजह थी कि उसका इस्तेमाल एक गैर सरकारी संगठन ने जिला प्रशासन के खिलाफ प्रदर्शन में किया था।
आदिवासी समुदाय को जमीन के प्रमाणपत्र जारी किए जाने में विलंब के विरोध में सोमवार को विरोध प्रदर्शन करने वाले मक्कल मनरम ने गधे के गले में जो तख्ती लटकाई थी उस पर लिखा था जिला प्रशासन।
राजस्व अधिकारियों ने इस पर घोर आपत्ति की और शिकायत दर्ज कराई जिसके बाद पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार कर लिया। पशु क्रूरता निरोधक अधिनियम की विभिन्न धाराओं और सार्वजनिक स्थान पर जाम लगाने के कारण गधे को जब्त कर लिया।
पुलिस ने विरोध स्थल से चटाइयां, लाउडस्पीकर और एंपलीफायर सेट भी जब्त किया। गिरफ्तार किए गए 30 लोगों को जब न्यायिक मजिस्ट्रेट आई जी उत्तमराज के समक्ष उनके आवास पर पेश किया गया तो उन्हें हिरासत में भेज दिया। मजिस्ट्रेट ने पुलिस को गधे को अपनी हिरासत में रखने का निर्देश देते हुए उसे अगले दिन सबूत के तौर पर अन्य जब्त सामान के साथ पेश करने को कहा।
गधे को अदालत में पेश करने के लिए पुलिस को एक वैन किराये पर लेनी पड़ी। औपचारिकताएं पूरी करने के बाद अदालत ने पशु को उसके वास्तविक मालिक को सौंपने का आदेश दिया। प्रदर्शनकारियों को भी रिहा कर दिया गया।