शनिवार, 20 अक्टूबर 2007

हम हिन्दुस्तानी

पढनें में अजीब लग रहा होगा लेकिन आम हिन्दुस्तानियों की जो आदतें है वो किसी भी दूसरे देश के लोगों के लिये ईर्ष्या का विषय है, कम से कम मैं तो यही समझता हूँ,आप क्या समझते है अपनी राय टिप्पणी के रूप में दें|

ये कुछ खास विशेषताऐं हैं जो हमें अपने अपने हिन्दुस्तानी होने के एहसास को जोड़े रखती हैं, तो चलो आइये देखें कि आखिर क्या हैं ये.....

अखबारः इसका पढनें का मजा सिर्फ़ मांगकर पढने में ही है, जब तक एक-एक करके अलग-अलग पन्ने करके नहीं पढा तो क्या पढा? भले ही उसका अलग पन्ना किसी तीसरे आदमीं के पास हो!

माचिसः
भले ही आप के पास दो हजार रूपये वाला लाइटर हो लेकिन मांगे की एक तीली में जो मजा है वो उस अदने लाइटर में कहाँ? चलो माचिस दो!

समयः आप रोलैक्स घड़ी पहनते है लेकिन दूसरों से टाईम पूछते हैं क्या बात है!
भाई साहब टाईम क्या हुआ है?

थूकदान-मूत्रदानः माफ़ करना दोस्तों ये भी लिखना जरूरी है क्योंकि इसके बिना भारतीय होना भी कोई नहीं चाहता है, ये एक ऐसा राष्ट्रीय कर्तव्य है जिसे निभाना हर कोई अच्छी तरह से जानता है.सार्वजनिक शौचालय जितने साफ़ मिलते है उतनी ही गंदी हमारी दीवारें.
किसी मॉडर्न आर्ट की बारीकियां सीखनी हों तो किसी दीवार पर शोध कर लीजिये.

परचिंतनः अपना दुख बिना सम्हाले दूसरों के दुख में टांग अड़ाने के लिये तो हम भारतीयों ने मिसाल कायम कर दी है, राजनीति-देश-क्रिकेट-महंगाई ये सब इस बीमारी के शुरूआती लक्षण हैं.कौन क्या बन गया? कल क्या था आज क्या हो गया? अम्बानी-टाटा देखों क्या बन गया है? सलमान खान को बेल होगी यां जेल? अरे इन्डिया के कुल इतने ही रन हुये हैं?
इन सब बातों मे समय व्यतीत करना हमारा मुख्य शगल है.

लाइनः लाइन लगाना चाहे वो राशन,सिनेमा टिकट,रेलवे टिकट,बस,बैंक यां जहाँ लाइन लगती हो वहाँ हम लाइन लगाना अपराध समझते हैं और ऐसा करना हम अपनी तौहीन समझते हैं.लेकिन खिड़की पर बैठे क्लर्क को गालियां देना भी नहीं चूकते.

बिना लाइन के जो मजा है वो लाइन में घंटों खड़े होकर कहाँ तो आइये लाइन तोड़ें!

जुगाड़ः ये ठेठ देसी शब्द आज किसी का मोहताज नहीं है, किसी भी रूप में कोई भी काम हो बिना जुगाड़ के नहीं पूरा होता है चाहे वो किसी के अस्पताल में पैदा होने के लिये पैसे बचाने की जुगाड़ हो यां श्मशान में किसी की चिता के लिये लकड़ी की जुगाड़ ये सब यहाँ इसके बिना इस देश में संभव नहीं है.मैं तो समझता हूँ कि अगर मैनेजमेंट की किताबों में जुगाड़ की महिमा का वर्णन किया जाये तो देश के लिये नये-नये रास्ते खुलेंगे.

आज देश की राजनीति और पूरा देश जुगाड़ और इसके कर्णधारों की नियति पर ही तो टिका है

तो भाई लोगों हिन्दुस्तानी होने के लिये माफ़ कीजिये एक अच्छा हिन्दुस्तानी होने के लिये ये चंद योग्यताऐं आप में होनी चाहिऐं, क्या आप भी हिन्दुस्तानी है?

बाकी की आगे के लेखों में क्लास होगी.....

शुक्रवार, 19 अक्टूबर 2007

मेरे इस ब्लॉग के लिये आप प्रोत्साहन दें तो अच्छा लगेगा

आज से विधिवत मैने हिन्दी विकिपीडिया और अपने ब्लॉग मातृभूमि के लिये अपना योगदान देना शुरू कर दिया है.लेकिन उचित मार्गदर्शन और प्रोत्साहन के बिना अधूरा है ये ब्लॉग अतः आप सभी लोगों के सहयोग के लिये मैं प्रतीक्षारत हूं इसलिए आप सबके विचार और सुझावों का स्वागत है|

तकनीकी रूप में चिट्ठाजगत और ब्लॉगवानी ने इसे अभी पंजीकृत नही किया है जबकि चिट्ठाजगत के लेबल मैने दो बार और ब्लॉगवानी के लिये मैने ई-मेल भी किया है.
नारद.अक्षरग्राम के लिये जीतू जी को मैने मेल किया तो उन्होने तुरंत प्रतिक्रिया दिखाते हुये पंजीकृत कर दिया लेकिन शायद नारद.अक्षरग्राम भी अपडेटिंग की समस्या से जूझ रहा है यां जीतू जी शेयर बाजार में!

गुरुवार, 18 अक्टूबर 2007

क्या कूल हैं हम














ब्लॉगिंग से सावधान!कहीं घरवाले ये हाल ना कर दें




















पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा


















आज ना छोड़ूंगा तुझे














चलो आज गाड़ी ही ठीक कर दें














देखा मेरी गाड़ी कितनी तेज है















ये तेरी ऑखें झुकी-झुकी














आज कुछ ज्यादा ही चढ गयी है


















क्या लाइटर है













मेरी बंदरिया को तूने छेड़ा..














आजा मेरी गाड़ी में बैठ जा


















तूने मेरी चॉकलेट क्यों खायी?












मम्मी अब शैतानी नहीं करूंगा












ओह! मेरा टाइटेनिक डूब रहा है

गुरुवार, 11 अक्टूबर 2007

आलोक पुराणिक जी! कम से कम अपनी जन्मस्थली की बुराई तो न करिये

आज सुबह ज्ञानदत्त पाण्डेय जी के ब्लॉग पर आगरा के बारे में पढकर अच्छा लगा किन्तु साथ ही साथ आलोक पुराणिक जी के कमेंट देखकर दुख भी हुआ, उनके कमेंट में एक ओर जहाँ आगरा के प्रति उनकी निराशावादिता झलक रही है तो दूसरी ओर उनका आधुनिक होना भी निराश करता है क्योंकि आधुनिकता की जिस बयार में वह बह रहे हैं उसमें उन्होने अपनी तुलना मीर गालिब जैसे महान लेखक से कर दी है


उनकी टिप्पणी इस प्रकार हैः ALOK PURANIK said...
आगरा में महान लेखक भी पैदा हुए हैं। मीर गालिब और अपने बारे में अपने मुंह से क्या कहूं।
आगरा फोर्ट पे जाकर तो विकट नास्टेलजिया घेर लेता है, मैं वहां जाता ही नहीं। गर्म हवा फिल्म की शूटिंग भी वहीं हुई थी। आगरा फोर्ट आगरा शहर की गंदगी, घिचपिच, लदर पदर को रिप्रजेंट करता है, आगरा कैंट एक हद तक फौजियों के साफ-सुथरेपन का प्रतिनिधि है।
पर जी सच्ची का आगरा तो राजामंडी, सेठगली और रावतपाड़े, किनारी बाजार फौवारे में बसता है। आगरा की गलियां और गालियां नहीं झेलीं, तो फिर क्या आगरा दौरा पूरा न माना जायेगा।



शायद आगरा की ये चंद तस्वीरें उनके मन में पैदा हुयी कुछ दुविधा को दूर करेंगीं जिससे ये आगे वे अपनी जन्मस्थली के बारे में कुछ कहने से बच सकेंगें, नीचे की तस्वीरों में कहीं भी ताजमहल यां सैनिक क्षेत्र नहीं है जिसकी आप तारीफ़ कर सकें
ये चित्र् आम और सार्वजनिक स्थलों के हैं जहाँ आप परिवार सहित भ्रमण कर सकेंगें, अब दिल्ली मोह छूटे तब ना!


























शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2007

काकेश जी! और मेरे सभी चिट्ठाकार भाईयों क्या आप मेरे इस दुख में शामिल होंगें?

कल यानी 4 अक्टूबर को काकेश जी के ब्लॉग पर एक हास्य लेख आया था पढकर अच्छा भी लगा और काफ़ी मजेदार भी! ब्लॉग का नाम है (एक व्यंग्य पुस्तक का विमोचन) लेकिन कुछ ऐसा घटित हो गया था जिससे शायद हम लोग अनसुनी और अनदेखी कर दें लेकिन काकेश जी के मन में भी ये टीस सी उठी होगी कि जिस अनाम व्यक्ति जो अपने आपको अमेरिकन गॉय बोल रहा है उसने भी एक टिप्पणी की थी- वो कह रहा था कि मैं अंग्रेजी बोलता हूँ
फ़िर उसने दुबारा से उसी उत्सुकता में लिखा कि वो हमारी भाषा को पढ नहीं सकता है.
नीचे के चित्र में उन महानुभाव की टिप्पणी है



अब सवाल ये उठ रहा था कि अगर हम हिन्दी को लिखना और पढना आसान बना रहे हैं तो क्या हम इस ओर भी हैं कि पूरा विश्व हमारी भाषा समझ सके? शायद नहीं!
मेरी समझ में कोई प्रभावशाली औजार (टूल) नहीं है जो हिन्दी को विश्व के समकक्ष खडा कर सके. अगर उस अकेले व्यक्ति ने काकेश जी के चिट्ठे को पढ लिया होता तो जाहिर था कि वो हिन्दी दुनियां में खो जाता और जैसा कि होता आया है कि दूसरों की देखा-देखी में दुनिया बहुत आगे निकल चुकी है. आज हम चिट्ठाकार इसी प्रवत्ति के कारण ब्लॉगजगत मे जमें हुये हैं वरना कहाँ अंग्रेजी में सर खपाने वाले रवि रतलामी जी और समीरलाल जी हिन्दी में लिखते? आलोक पुराणिक जी केवल अखबारी दुनियां में सिमट जाते और ज्ञानदत पाण्डेय जी अपनी रेलयात्रा अपनी आने वाली पीढी को सुना-सुनाकर दम लेते.

अब समय आ गया है कि हमें चिट्ठाकारी से आगे बढना चाहिये!अतः मेरा सभी भाइयों से निवेदन है कि वो मेरी और हम सबकी इस चिंता पर गौर करेंगें और हमारी हिन्दी को सर्वसुलभ और विश्वपटल पर लाने के लिये सामूहिक प्रयत्न करेंगे।
कहने को बहुत कुछ है लेकिन शब्द नहीं मिल रहे हैं बस! इतना ही लिख रहा हूँ

बुधवार, 3 अक्टूबर 2007

राम-राम सा! (व्यंग्य)

इन दिनों रामलीला का मंचन हमारे महल्ले में हो रहा है तो हम भी देखने पहुँच गये पाँच रूपये की मूंगफ़ली के साथ,सो हम आगे आकर पालथी मारकर बैठ गये और मुँह फ़ाडकर मंचन देखने लगे,पता चला कि रावण के दरबार में हनुमान जी जमकर खडे हुये है,तो हमें हँसी आ गयी. ऐसे में सभी लोग हमें मुडकर देखने लगे उनके देखना ही था कि स्वंय हनुमान जी भी हमें देखने लगे कि शायद हमने कोई मूर्खता कर दी है, बस ऐसी विकट परिस्थिति में हमनें भी अपने आपको संभाला और जोर से चिल्लाये "जय श्री राम".

मेरे इस कर्तनांद से पूरा महल्ला गुंजायमान हो गया था कि कुछ ही देर में पुलिस की गाडियां और मिलिट्री की फ़ोर्स वहाँ आ गयी.
पता चला कि जब पूरा महल्ला गुंजायमान हो रहा था ति पास के महल्ले के नेता जो वर्तमान सरकार के चाटुकार हैं उन्होने शहर में दंगा भडकने की स्थिति में पुलिस को सूचित कर दिया था(शायद उनको लग रहा था कि हम बीजेपी के सेतुसमुद्रम के अनुयायी हैं) कि हम लोग शहर में अशान्ति ना फ़ैला दें

अब तो पूरी रामलीला ही किसी महाभारत के युध्द सरीखी लग रही थी. पूरी की पूरी रामलीला का विनाश हो चुका था.

कुछ देर के व्यवधान के बाद रामलीला का दोबारा मंचन करना तय हुआ सो इस बार कुछ मंचन और कथा में भी फ़ेरबदल करना पडा (जब सरकार सेतुसमुद्रम को नकार सकती है तो हम क्या कहानी में तनिक फ़ेरबदल नहीं कर सकते हैं)
तो भई लोगों पुलिस और मिलिट्री की भारी सुरक्षा के बावजूद हम लोग अपने आपको असुरक्षित महसूस कर रहे थे. ना जाने कब इन ससुरों का दिमाग घूम जाये और ये अपनी असुरी शक्तियां हम निरीह प्राणियों पर आजमा लें.

अब नाट्य मंचन मे संवाद इस प्रकार थे....
द्र्श्यः(रामचंद्र जी समुद्र किनारे लंका के लिये रास्ता बनाने के लिये विचार एकत्रित कर रहे थे, नल-नील,जामवंत,सुग्रीव,हनुमान आदि उनके साथ चिंता में हो लिये थे क्योंकि अब सेतु बनवाने के लिये श्रीलंका की सरकार से समुद्र अधिग्रहण का नोटिस आ चुका था और किसी भी प्रकार से समुद्र पर अतिक्रमण मनाही थी.)

रामचंद्र जीः मेरे प्यारे प्राणप्रिय साथियों काफ़ी कष्टों के बाद हम जब अपनी सीते के लिये समुद्र के इस ओर हैं और हमारी सीता हमसे बस कुछ ही दूरी पर है तो अब हमें कुछ रास्ता ढूंढना चाहिये जिससे हम सीते को उस पापी रावण से मुक्ति दिला सकें!
सुग्रीवः भगवन! काफ़ी बडी समस्या आ चुकी है, अभी-अभी प्राप्त खबरों से पता चला है कि श्रीलंका सरकार औफ़ रावण ऑर्गनाईजेशन ने सारे समुद्री रास्तों पर अतिक्रमण बैन कर रखा है.
रामचंद्र जीः तो प्यारे हनुमान अब तुम ही बताओ कि क्या किया जाये मेरी सीते तक पहुँचने के लिये?
हनुमानः भगवन म्रेरे अनुसार एक ही कारगर उपाय है कि हमें किसी प्राईवेट कम्पनी को हायर यां ये कहिये कि किसी कम्पनी यां ब्रांड का ब्रांड एम्बैस्सडर बनना चाहिये किससे उसके नाम यां डिजायन किये लोगो को हम पत्थरों पर चिपकाते चले जायेंगे और हमारे पत्थर आसानी से समुद्र में तैर जायेंगें!
रामचंद्र जीः काफ़ी अच्छा विचार लाये हो हनुमान. अब आगे भविष्य में कानूनी कार्यवाही हम पर होने से रही! क्योंकि इन पत्थरों पर हमारा कोई ब्रांडनेम नहीं है और कोई भी सबूत आने वाले युगों तक नहीं होगा क्योंकि हमारे खिलाफ़ कोई पुख्ता सबूत भी तो नहीं मिलेंगें, लेकिन!....
हनुमानः लेकिन क्या प्रभु? फ़िर से कोई दुविधा है इस कार्य में?
रामचंद्र जीः समस्या ये है मेरे प्यारे हनुमान कि हम श्रीलंका सरकार के नियम कैसे तोडें और ना तुमने और ना ही मैने कोई एन्जीनियरिंग की है सेतु बनाने के लिये?
हम इस कार्य में दक्ष नहीं हैं तो अब आगे क्या होगा?
हनुमानःआप तनिक चिंता ना करें भगवन उसका भी प्रबंध कर लिया गया है प्रायोजकों की लिस्ट में एक एन्जीनियरिंग कॉलेज भी है और वहाँ के विध्यार्थी कोई प्रक्टिकल करना चाहते थे तो मैने उनसे बात कर ली है वो उसके बदले में हमें और रकम देने की बात कर रहें हैं,
रही बात श्रीलंका सरकार की तो वो लोग भी 50 परसेंट की स्पांसरशिप की रकम डकारने के लिये राजी हो चुके हैं जो रावण् को बिना बताये ली जा रही है

अब समुद्र के रास्ते सेतु बनाने के लिये सारे रास्ते खुल चुके थे और बाकायदा रामचंद्र जी और उनकी टीम को बहुत सारे स्पांसर भी मिल रहे थे, जल्दी ही लग रहा था कि अब लंका दूर नहीं!

शनिवार, 22 सितंबर 2007

ये सवाल वाकई में ध्यान देने योग्य है

आज बहुत दिनों के बाद जब कुछ लिखने के लिये बैठा तो अचानक कहीं से ये लेख मेरे सामने आ गया जो एक सम्रध्द भारत की निन्दा कर रहा था,
ये लेख किसी और के द्वारा नहीं अपने प्रिय डॉ ए. पी. जे. अब्दुल कलाम जी ने उठाया है जो वाकई में ध्यान देने योग्य है

प्रस्तुत है वो चन्द लाईनें जो उन्होने कहीं
"राष्ट्रपति पद छोड़ने के बाद पहली विदेश यात्रा पर निकले डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम एक नए सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश कर रहे हैं। सवाल है कि अटलांटिक महासागर पार करने पर भारतीयों को क्या हो जाता है कि वे बदल जाते हैं?

कलाम ने यहां भारतीय पेशेवरों, प्रौद्योगिकीविदों और उद्यमियों को संबोधित करते हुए पूछा, अटलांटिक पार करते ही लोगों को क्या हो जाता है कि वे बदल जाते हैं। वे अपना प्रोफाइल बदल लेते हैं, सपने बदल लेते हैं, अपने कामकाज के तौरतरीके बदल लेते हैं। अंत में सफल होने में बदल जाते हैं और सफलता के चैम्पियन हो जाते हैं।

कलाम ने कहा कि मैंने यह सवाल अपने अच्छे दोस्त जॉन चैंबर्स के सामने रखा, जो सिस्को सिस्टम्स के सीईओ हैं, तो जवाब मिला कि अमेरिका बेहतर प्रदर्शन करने वालों की पूजा करता है और लोग असफलता से घबराते नहीं।"


मुझे कोई भी जवाब देते नहीं बन रहा है लेकिन अमेरिका की बात सच्ची और प्रशंसनीय है कि वो योग्यता को सलाम करता है और उसे वो हर जरूरत और सुविधा मुहैया करवाता है जिसकी उसे जरूरत है और बदले में अगर राष्ट्र के निर्माण में अगर थोडी सी भागीदारी मांगता है तो क्या बुरा करता है.

इसके ठीक उलट अपने भारत में जब पढा-लिखा नौजवान रिक्शा चलाता है,यां नेतागिरी में अपना समय व्यर्थ करता है जिससे हमारे देश के राजनीतिकों को एक गुमराह हमसफ़र मिल जाता है जो उनके लिये कुछ भी कर सकता है लेकिन अपने देश के लिये कुछ नहीं.
आज हर नौजवान एक कुंठा से पीडित है कि अगर वो इस देश में रहेगा तो सिवा पांच दस हजार रूपये मासिक के अलावा क्या कमायेगा? सुख साधन भौतिक सम्पदा हमारे देश् में मानो नेताओं के लिये ही बने हैं यां बनाये गये हैं.रोजगार योजनायें जो बेरोजगार अधिक लगती हैं, क्या भला करेंगी इस पीढी का जो जानती है कि जब चीन-जापान जैसे देश में घर-घर इन्जीनियर है लेकिन भारत में यही सब सीखने के लिये लाखों रूपये फ़ीस है.
सीखनें वालों से ज्यादा सिखाने वाले मुनाफ़ाखोर हो चुके हैं, देने वाला आज देसी घी मैं तैर रहा है और लेने वाले को नहाने के लिये पानी भी नसीब नही है.जब भौतिक सुविधाओं की बात आती है तो हमारे देश और रिजर्व बैंक काफ़ी हो हल्ला करता है लेकिन जब वास्तविकता में जिसको जरूरत होती है वो बेचारा दो वक्त की रोटी भी नहीं खा पाता है क्यों?

इस क्यों को पाटने के लिये हमारी सरकार का भी फ़र्ज बनता है कि वो खुद राष्ट्र के निर्माण में आगे आये और हमारे देश की नौजवान पीढी को एक सुलझा हुआ रास्ता दे ताकि फ़िर से ये सवाल कभी पैदा ही ना हो.

गुरुवार, 6 सितंबर 2007

हिन्दी ब्लॉगिंग का एतिहास का पार्टः2

क्षमा करें शिवकुमार मिश्र और ज्ञानदत्त पाण्डेय जी! क्योंकि मैने आपके ब्लॉग को पढ्ने के बाद ही इसे आगे बढानें का निर्णय लिया,क्योंकि आपके हास्य में जो सच छुपा हुआ था वो शायद हिन्दी ब्लॉगरों के लिये स्वर्णकाल साबित हो सकता है.भविष्य लेखन में जो आपने हमें सपना दिखाया है वो जरूर सच होगा क्योंकि हिन्दी विश्व भाषा बन जायें, ये हो सकता है

हिन्दी ब्लॉगिंग का एतिहास का पार्टः2



क्या आप
हिन्दी कोविश्वभाषा
बना सकते हैं?

मैं ये नहीं सोचता हूँ कि हिन्दी के उपर कोई ग्रन्थ लिखा जाये यां कोई पोथी लिखी जाये लेकिन आपके लेख से ये तस्वीर मन में उभर कर सामनें आयी कि अगर हम सब लोग समुचित और सामूहिक प्रयत्न करें तो हिन्दी क्या हर हिन्दुस्तानी दुनियां को अपने कदमों मे डाल लेगा.आज जब गूगल और अन्य देश हिन्दी प्रचार-प्रसार के लिये प्रयास कर रहे हैं और हमारे भारतीय बन्धु जो दूर रहकर भी हिन्दी को आत्मसात कर रहे हैं तो हमारा सिर गौरव से ऊँचा हो जाता है.



अब आगे की कडी.....समीरलाल जी से ही शुरू करते हैं- हमारे समीर जी उर्फ़ पवनदूत हनुमान जी आजकल अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी चिट्ठाकारी संघ के अध्यक्ष बने बैठे हैं. हिन्दी संघ में हमारे भारतीय राजदूत श्री "शास्त्री जी" भारत से कच्चे चिट्ठों की सप्लाई दनादन एक्स्पोर्ट कर रहे हैं जिससे भारत के लोगों को एक नया रोजगार मिल गया है हिन्दी सिखाने के लिये और सीखने के लिये बाकायदा वर्ल्ड बैंक ने एक कोष इनको दे रक्खा है,भई रवि जी ने हिन्दी में ऑपरेटिंग सिस्टम करने के बाद माइक्रोसॉफ़्ट और लीनिक्स को टेकओवर कर लिया है.यहाँ तक कि हिन्दी के अलावा दो हजार से ऊपर भारतीय भाषायें शामिल कर ली गयीं है. अन्ग्रेजी को अब लोग 'कौतहूल' की द्रष्टि से देखते हैं, और इसके बंधुआ भारतीयों की आजादी की कहानियाँ पढते हैं.
नये नये हिन्दी कॉलसेन्टर विदेशों में खुल चुके हैं क्योंकि हिन्दी की अनिवार्यता हर देश में एकसमान रूप से लागू है.

अब आगे शिवकुमार मिश्र और ज्ञानदत्त पाण्डेय जी इसे लिखेंगें........