मंगलवार, 30 अक्तूबर 2007

आइये नारद.अक्षरग्राम को बचायें!

Posted on 7:11:00 am by kamlesh madaan











सुनकर अटपटा लगा ना ! कभी हम चिट्ठाकार नारद पर अपना चिट्ठा अवतरित होने के लिये लालायित रहते थे कि कब ये चिट्ठा आये और कब हमारा चिट्ठा ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुँचे पर आज मुझे महसूस हो रहा है कि ये प्रमुख हिन्दी एग्रीग्रेटर जिस तकलीफ़ों के दौर में गुजर रहा है वो शायद अन्य एग्रीग्रेटर भी देख रहे व सुन रहे हैं लेकिन उन सबको नारद से क्या लेना-देना ये बात गले नही उतरती है क्योंकि चिट्ठाजगत,ब्लॉगवानी और नारद के बीच में जो स्वस्थ प्रतियोगिता शुरू हुयी थी व जिससे किसी का भला हो ना हो हिन्दी का भला हो रहा था.पर लगता है कि ये सिलसिला थम सा गया है.

नारद.अक्षरग्राम को हम नजर-अंदाज नहीं कर सकते क्योंकि अगर चिट्ठाजगत और ब्लॉगवानी हिन्दी चिट्ठाकारी का शरीर हैं तो नारद.अक्षरग्राम उसकी आत्मा है लेकिन शरीर आत्मा के बिना कैसे जी पा रहा है ये दुखी करने वाली बात है. अगर नारद् को अपडेटिंग की समस्या से रूबरू होना पड़ रहा है तो हमारे तकनीकी चिट्ठाकारों से निवेदन है कि वो इस काम में आगे आयें और अपना सहयोग प्रदान करें और अगर रखरखाव और समय की कमी महसूस हो रही है तो हम सभी चिट्ठाकारों का कर्तव्य बनता है कि वो बारी-बारी समयानुसार अपना योगदान देकर हिन्दी सेवा में रत इस साइट को नवजीवन दें.

और अगर पैसा आड़े आ रहा है तो शायद हम एक-एक बूंद करके कुछ अपना योगदान तो दे सकते हैं, ये बात तीनों एग्रीग्रेटरों पर समान रूप से लागू हो ताकि हम हिन्दी और चिट्ठाकारी का सिर गर्व से ऊपर उठा सकें और कोई ये ना कहे कि आज किसी भारतीय ने अपनी चलती हुयी वेबसाइट धन और समय की कमी के कारण बंद कर दी.

पैसे के लिये हम कोई बैंक एकाउंट जैसे आई.सी.आई.सी.आई बैंक के एकाउंट की मदद ले सकते है लेकिन जिसके पास उसका डेबिट और क्रेडिट कार्ड दोनों हों जो विदेश में रूपये का डॉलर मे परिवर्तन करने की क्षमता रखता हो.कहने का तात्पर्य है कि हममें से किसी एक को निस्वार्थ आगे आकर इसका हिसाब-किताब रखना होगा और निष्पक्ष तीनों वेबसाइटों के लिये रखरखाव का कर्य करना होगा.

ये एक मजाक नहीं है लेकिन हम इसे एक मिसाल बना सकते हैं जो एक बहुत बड़ा प्रयास होगा हिन्दी हित में. तो क्या आप साथ देंगें ?

8 Response to "आइये नारद.अक्षरग्राम को बचायें!"

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Neeraj Rohilla Says....

कमलेशजी,
मैं आपकी बात का पूरा समर्थन करता हूँ । इतने एग्रीग्रेटरों के बाद भी नारद का अपना महत्व है और हम सब को इसे समझना चाहिये ।

ऐसे किसी भी कार्य में जैसा भी समर्थन हो सकेगा मैं देने को तैयार हूँ ।

मैं तो अभी भी नारद की साईट खोलकर देखता हूँ लेकिन अब उसमें ठीक प्रकार से चिट्ठे अपडेट नहीं होते हैं ।

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संजय बेंगाणी Says....

आपकी बात का जवाब तो नारद के कर्ता-धर्ता देंगे, मगर नारद को याद करने के लिए साधूवाद. नारद से भावनाएं जूड़ी हुई है.
आशा है जल्दी ही नारदजी नई ताकत के साथ अवतरीत होंगे.

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अनुनाद सिंह Says....

लगता है कि आपको नारद से मोह हो गया है। ये स्वाभाविक है।

मुझे भी नारद की इस स्थिति से दुख हो रआ है। किन्तु मेरा मानना है कि यह मोह निराधार है। दूसरे संकलक बखूबी हिन्दी की सेवा कर रहे हैं। यदि किसी अपरिहार्य कारणों से (या समाधान-रहित कारणों से) नारद पिछड़ रहा है तो होने दीजिये।

जातस्य हि ध्रुवो मृत्यु:
(जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु सुनिश्चित है।)

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ललित Says....

नारद में गूगल एडसेन्स आदि विज्ञापन हेतु स्थान तथा अन्य जनोपयोगी सुविधाएँ जोड़ी जा सकती हैं।

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Sanjeet Tripathi Says....

नारद से मोह तो स्वभाविक ही है!!

नारद जल्द ही पुन: अवतरित होगा ऐसा अनुमान है!!

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Udan Tashtari Says....

उत्तम सोच-उत्तम पोस्ट. साधुवाद.

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संजय बेंगाणी Says....

जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु सुनिश्चित है।

और पूनर्जन्म भी :)

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हर्षवर्धन Says....

नारद से मोह अनायास भी नहीं है। और, हिंदी का सबसे पुराना एग्रीगेटर जिंदा रहे तो, हित में ही है।