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रविवार, 3 फ़रवरी 2008

नया शब्द "रचनात्मक स्वतंत्रता" अपने आप में कमाल है

पिछले दिनों हमारे स्वास्थ्य मंत्री जी को अचानक क्या सूझा कि उन्होने हमारे देश के उच्च कलाकारों को कुछ नसीहत दे दी अब भारत में नसीहत और उसको मानने वाले रेगिस्तान में सुई ढूंढने के बराबर है तो उल्टे उन्ही को एक करारा जवाब मिला जो काफ़ी कुछ ऑस्कर में भेजे जाने वाला डॉयलोग था "आप हमारी रचनात्मक आजादी हमसे छीन रहे हैं."

हाँ तो भाई लोगों सावधान हो जाओ! अब ये कलाकार लोग एक अलग दुनिया बना रहे हैं वो जिसे रचनात्मकता का नाम दे चुके हैं, अब ये मत पूछना कि ये किस बला का नाम है? और ये कैसे मिलेगी तो भाई लोगों सुनो.......

इसके लिये कुछ नियम हैं जो आप जल्दी सीख सकते हैं

नियम-
1. इसके लिये कैमरे के आगे रहना जरूरी है.
2. सिगरेट,शराब, स्मैक सार्वजनिक जगहों पर पियें जो ज्यादा रचनात्मक है.
3. क्या कहा हत्या,डकैती भी रचनात्मक हो सकते हैं? हो सकते हैं जी हो सकते हैं सरकार इस पर भी विचार कर रही है.
4. अब अंग-प्रदर्शन को तो रचनात्मकता का सर्टिफ़िकेट मिल ही चुका है,बलात्कार अभी लाइन में है.
5. भाई! देश के लोगों और देश का मजाक उड़ाना रचनात्माकता का उच्च-स्तर है जो विरले ही मिलता है इसे भी ट्राई कर सकते हैं
6. देश में कमाओ और बाहर मौज उड़ाओ ये अभी-अभी नियम शामिल हुआ है.
7. सब के बारे में बुरा सोचने लगोगे तो सफ़लता खुशी से दौड़ी चली आयेगी तुम्हारे पास.
8. शराब-सिगरेट का प्रचार की-रिंग और कैसेट के माध्यम से करो उसमें ज्यादा रचनात्मकता है.
9. कलाकार हो तो क्या किसी क्रिकेट टीम को नहीं खरीदा? लगता है अभी नये-नये हो.
10.दूसरी तीसरी शादी, लिव इन रिलेशनशिप ये रचनात्मकताएं बाहर से इम्पोर्ट की हुयी हैं इनका प्रयोग सावधानी से करें.

ये सब चुपचाप ही करना क्योंकि अगर ब्लॉग्स पर भारत सरकार की नजरें टेड़ी हो गयीं तो शायद हमारी "रचनात्मक आजादी " पर भी ना सवाल उठ खड़ें हो जाये.

रविवार, 28 अक्टूबर 2007

चलो हरामखोर हो जाएं (व्यंग्य)

















हरामखोरी.: ये एक शब्द किसी डिक्शनरी में नहीं मिलता बल्कि ये क्वालिटी विरले ही मिलती है.
जिसे घूस,रिश्वत,आलस और सच्चे अर्थों में देश-सेवा का कीड़ा काटा हो वो हरामखोर बनने का सही हकदार है,यां ये कहिये कि एक हरामखोर ही देश की सच्ची सेवा करने और विकास की प्रगति का सही उम्मीदवार है.

हरामखोरी से कई फ़ायदे हैं....नीचे देखें
.:1:. जैसे कोई बेचारा मर्डर केस में फ़ंस गया हो तो वो बेचारा किसी स्पेशलिस्ट हरामखोर वकील के पास जाये तो ही उसका भला होगा अब बूझो कैसे? तो इसका एक हरामखोरी भरा जवाब है कि पहले तो उसका केस अदालत में जायेगा फ़िर सम्मन आयेगा फ़िर तारीख पर तारीख लेते हुये पाँच-दस साल ना बीत जायें तो केस में भी मजा नही आयेगा,और फ़िर सुप्रीम कोर्ट-हाईकोर्ट में अपीलें लेते हुये जब खुद के सठिया जाने की उमर हो जाये तो माफ़ी की याचिका दायर कर दो, एक दो साल कैद होगी जिसमें बड़े-बड़े हरामखोरों के साथ जेल में मुलाकात का महान सौभाग्य प्राप्त हो सकता है, अगर भाग्य अच्छा होगा तो किसी से सैटिंग करके चुनाव में टिकट का आसानी से जुगाड़ हो सकता है जिससे एक महान हरामखोर देशप्रेमी बनने का गौरव प्राप्त हो सकता है।

.:2:. कभी हमने सुना था कि हराम की खाओ और मस्जिद में सो जाओ, अबे ये क्या बला थी. लेकिन अब इस उमर में आकर पता चला है कि हरामखोर कभी भी भूखा नहीं मरता लेकिन मेहनतकश बेचारा दो वक्त की रोटी की जुगाड़ में ही लगा रहता है.
सच है जिसे दारू पीनी है वो पीकर रहेगा लेकिन जिसे भूख लगती है उसे रोटी नसीब नही.

.:3:. आज बड़े-बड़े हरामखोर देश में खुलेआम घूम-घूमकर देश सेवा का ढोंग कर रहे हैं जिन्होने कभी एक रूपया नहीं कमाया वो करोड़ों रूपये आगामी परियोजनाओं में लगाने की योजनाये बना रहे हैं (अब योजनाये किसके लिये बनती है आप सब अच्छी तरह जानते हैं)

वो कहते है देश का निर्माण करना है लेकिन उसी दिन शाम के अखबार में एक नवनिर्मित पुल के ढहने की खबर आ जाती है, क्या फ़ास्ट प्रोसैसिंग है बाप!इतनी जल्दी योजना और उसके कार्यकाल का पूरा होना हरामखोरी की एक भव्य क्वालिटी है जिसे उच्च अनुभवों के बाद ही प्राप्त किया जा सकता है।

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अगर दुनियां में कोई एक बहुत बड़ा वर्ग है तो वो है हरामखोरी, इस एक शब्द नें आज ग्लोबली यूनिटी की जो मिसाल कायम की है वो वाकई में एक मिसाल है।

मेरा तो मानना है कि अगर हरामखोरी पर शोध किया जाये तो वाकई में इसका प्रोग्रेस रिपोर्ट चौकांने वाले मिलेंगें, आज यह सामाजिक आंदोलन बन चुका है और जिस तेजी से यह फ़ैल रहा है,लगने लगा है कि आने वाले समय में पूरा विश्व हरामखोरमय ना हो जाये!
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तो चलो हरामखोर हो जायें!

रविवार, 21 अक्टूबर 2007

हम हिन्दुस्तानी (द्वित्तीय भाग)

कभी-कभी इंसान गल्तियां कर बैठता है और कल गलती से मिस्टेक करते हुये जो हमने अपने देशप्रेमी होने की जो मिसाल कायम की थी वो वाकई में गंभीर विषय बन चुका है, काफ़ी लोगों ने हमें इसे आगे जारी रखने का सम्मन भी भेज दिया है तो भाई लोगों प्रस्तुत है हम हिन्दुस्तानी का भाग दो..

नकलः ये हुनर तो हम हिन्दुस्तानियों की वो अमूल्य धरोहर है जिसे संजोये रखनें से ही विकास का पहिया तेजी से घूम रहा है यां ये कहिये इस विशेष गुण के कारण पूरी दुनिया हमसे परेशान है अब चाहे किसी भी उत्पाद को एक बार देख लें माँ कसम अगली खेप तक वो उत्पाद उस देश में ही आधे रेट में मिलने लगेगा, यहाँ तक कि अगर फ़िल्म,राजनीति,युध्द,पढाई-लिखाई आदि में इस देश में बनाये गये कीर्तीमानों की लिस्ट बनायी जाये तो शायद चॉद पर जाने के लिये किसी अंतरिक्ष यान की जरूरत नहीं होगी.
तो अब मत कहना "नकलची बंदर"

लम्बी-लम्बी छोड़नाः अगर इस गुण के बारे में नहीं लिखा तो शायद मेरा ये लेख बेकार हो जायेगा क्योंकिं जिस विशेष गुण के लिये भारतीय जाने जाते हैं उनमें ये गुण कूट-कूटकर भरा हुआ है-
पता है अम्बानी मेरे साथ पढ चुका है,
शहर का कलक्टर मेरा यार है बेटा जो काम हो बता देना,
कॉलेज से अगर खेल रहा होता तो आज नैशनल टीम में होता,

ये कुछ चंद बातें है अभी तो छोड़ने के रिकार्ड चेक तो कर लीजिये.

गालियां: हिन्दी,पंजाबी,अंग्रेजी और राष्ट्रीय भाषाओं के अलावा एक और भाषा भी है जिसे लोग पानी(मदिरा) पी-पीकर और ज्यादातर बिना पिये ही इस्तेमाल करते हैं,हम राष्ट्रीय भाषा का दर्जा हिन्दी यां अंग्रेजी को दें यां ना दें लेकिन यह भाषा समान रूपों में अपना अधिपत्य बनाये हुये है,
विविधता इसकी मुख्य पहचान है और यह हिन्दुस्तान के चारों ओर समान रूप से पायी जाती है.
आप की भाषा क्या है?

आलसः टाइम नहीं है! इस बात के लिये अगर हम पूरी दुनियां में सबसे आगे हैं जहाँ पूरी दुनिया समय के साथ चलती है वहीं दूसरी ओर हमारे प्यारे भारत में ये कहा जात है कि समय को मत पकड़ो.
आज का काम कल और भविष्य पर टालने की प्रथा तो नेताओं,नागरिको,अदालतों,ऑफ़िसों में भी होता है लेकिन यह रेलवे और सड़क परिवहन के बाद अब उड्डयन सेवा में भी शुमार होने लगा है.
क्या कहा आप के पास टाइम नहीं है?

शनिवार, 20 अक्टूबर 2007

हम हिन्दुस्तानी

पढनें में अजीब लग रहा होगा लेकिन आम हिन्दुस्तानियों की जो आदतें है वो किसी भी दूसरे देश के लोगों के लिये ईर्ष्या का विषय है, कम से कम मैं तो यही समझता हूँ,आप क्या समझते है अपनी राय टिप्पणी के रूप में दें|

ये कुछ खास विशेषताऐं हैं जो हमें अपने अपने हिन्दुस्तानी होने के एहसास को जोड़े रखती हैं, तो चलो आइये देखें कि आखिर क्या हैं ये.....

अखबारः इसका पढनें का मजा सिर्फ़ मांगकर पढने में ही है, जब तक एक-एक करके अलग-अलग पन्ने करके नहीं पढा तो क्या पढा? भले ही उसका अलग पन्ना किसी तीसरे आदमीं के पास हो!

माचिसः
भले ही आप के पास दो हजार रूपये वाला लाइटर हो लेकिन मांगे की एक तीली में जो मजा है वो उस अदने लाइटर में कहाँ? चलो माचिस दो!

समयः आप रोलैक्स घड़ी पहनते है लेकिन दूसरों से टाईम पूछते हैं क्या बात है!
भाई साहब टाईम क्या हुआ है?

थूकदान-मूत्रदानः माफ़ करना दोस्तों ये भी लिखना जरूरी है क्योंकि इसके बिना भारतीय होना भी कोई नहीं चाहता है, ये एक ऐसा राष्ट्रीय कर्तव्य है जिसे निभाना हर कोई अच्छी तरह से जानता है.सार्वजनिक शौचालय जितने साफ़ मिलते है उतनी ही गंदी हमारी दीवारें.
किसी मॉडर्न आर्ट की बारीकियां सीखनी हों तो किसी दीवार पर शोध कर लीजिये.

परचिंतनः अपना दुख बिना सम्हाले दूसरों के दुख में टांग अड़ाने के लिये तो हम भारतीयों ने मिसाल कायम कर दी है, राजनीति-देश-क्रिकेट-महंगाई ये सब इस बीमारी के शुरूआती लक्षण हैं.कौन क्या बन गया? कल क्या था आज क्या हो गया? अम्बानी-टाटा देखों क्या बन गया है? सलमान खान को बेल होगी यां जेल? अरे इन्डिया के कुल इतने ही रन हुये हैं?
इन सब बातों मे समय व्यतीत करना हमारा मुख्य शगल है.

लाइनः लाइन लगाना चाहे वो राशन,सिनेमा टिकट,रेलवे टिकट,बस,बैंक यां जहाँ लाइन लगती हो वहाँ हम लाइन लगाना अपराध समझते हैं और ऐसा करना हम अपनी तौहीन समझते हैं.लेकिन खिड़की पर बैठे क्लर्क को गालियां देना भी नहीं चूकते.

बिना लाइन के जो मजा है वो लाइन में घंटों खड़े होकर कहाँ तो आइये लाइन तोड़ें!

जुगाड़ः ये ठेठ देसी शब्द आज किसी का मोहताज नहीं है, किसी भी रूप में कोई भी काम हो बिना जुगाड़ के नहीं पूरा होता है चाहे वो किसी के अस्पताल में पैदा होने के लिये पैसे बचाने की जुगाड़ हो यां श्मशान में किसी की चिता के लिये लकड़ी की जुगाड़ ये सब यहाँ इसके बिना इस देश में संभव नहीं है.मैं तो समझता हूँ कि अगर मैनेजमेंट की किताबों में जुगाड़ की महिमा का वर्णन किया जाये तो देश के लिये नये-नये रास्ते खुलेंगे.

आज देश की राजनीति और पूरा देश जुगाड़ और इसके कर्णधारों की नियति पर ही तो टिका है

तो भाई लोगों हिन्दुस्तानी होने के लिये माफ़ कीजिये एक अच्छा हिन्दुस्तानी होने के लिये ये चंद योग्यताऐं आप में होनी चाहिऐं, क्या आप भी हिन्दुस्तानी है?

बाकी की आगे के लेखों में क्लास होगी.....

गुरुवार, 18 अक्टूबर 2007

क्या कूल हैं हम














ब्लॉगिंग से सावधान!कहीं घरवाले ये हाल ना कर दें




















पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा


















आज ना छोड़ूंगा तुझे














चलो आज गाड़ी ही ठीक कर दें














देखा मेरी गाड़ी कितनी तेज है















ये तेरी ऑखें झुकी-झुकी














आज कुछ ज्यादा ही चढ गयी है


















क्या लाइटर है













मेरी बंदरिया को तूने छेड़ा..














आजा मेरी गाड़ी में बैठ जा


















तूने मेरी चॉकलेट क्यों खायी?












मम्मी अब शैतानी नहीं करूंगा












ओह! मेरा टाइटेनिक डूब रहा है

बुधवार, 3 अक्टूबर 2007

राम-राम सा! (व्यंग्य)

इन दिनों रामलीला का मंचन हमारे महल्ले में हो रहा है तो हम भी देखने पहुँच गये पाँच रूपये की मूंगफ़ली के साथ,सो हम आगे आकर पालथी मारकर बैठ गये और मुँह फ़ाडकर मंचन देखने लगे,पता चला कि रावण के दरबार में हनुमान जी जमकर खडे हुये है,तो हमें हँसी आ गयी. ऐसे में सभी लोग हमें मुडकर देखने लगे उनके देखना ही था कि स्वंय हनुमान जी भी हमें देखने लगे कि शायद हमने कोई मूर्खता कर दी है, बस ऐसी विकट परिस्थिति में हमनें भी अपने आपको संभाला और जोर से चिल्लाये "जय श्री राम".

मेरे इस कर्तनांद से पूरा महल्ला गुंजायमान हो गया था कि कुछ ही देर में पुलिस की गाडियां और मिलिट्री की फ़ोर्स वहाँ आ गयी.
पता चला कि जब पूरा महल्ला गुंजायमान हो रहा था ति पास के महल्ले के नेता जो वर्तमान सरकार के चाटुकार हैं उन्होने शहर में दंगा भडकने की स्थिति में पुलिस को सूचित कर दिया था(शायद उनको लग रहा था कि हम बीजेपी के सेतुसमुद्रम के अनुयायी हैं) कि हम लोग शहर में अशान्ति ना फ़ैला दें

अब तो पूरी रामलीला ही किसी महाभारत के युध्द सरीखी लग रही थी. पूरी की पूरी रामलीला का विनाश हो चुका था.

कुछ देर के व्यवधान के बाद रामलीला का दोबारा मंचन करना तय हुआ सो इस बार कुछ मंचन और कथा में भी फ़ेरबदल करना पडा (जब सरकार सेतुसमुद्रम को नकार सकती है तो हम क्या कहानी में तनिक फ़ेरबदल नहीं कर सकते हैं)
तो भई लोगों पुलिस और मिलिट्री की भारी सुरक्षा के बावजूद हम लोग अपने आपको असुरक्षित महसूस कर रहे थे. ना जाने कब इन ससुरों का दिमाग घूम जाये और ये अपनी असुरी शक्तियां हम निरीह प्राणियों पर आजमा लें.

अब नाट्य मंचन मे संवाद इस प्रकार थे....
द्र्श्यः(रामचंद्र जी समुद्र किनारे लंका के लिये रास्ता बनाने के लिये विचार एकत्रित कर रहे थे, नल-नील,जामवंत,सुग्रीव,हनुमान आदि उनके साथ चिंता में हो लिये थे क्योंकि अब सेतु बनवाने के लिये श्रीलंका की सरकार से समुद्र अधिग्रहण का नोटिस आ चुका था और किसी भी प्रकार से समुद्र पर अतिक्रमण मनाही थी.)

रामचंद्र जीः मेरे प्यारे प्राणप्रिय साथियों काफ़ी कष्टों के बाद हम जब अपनी सीते के लिये समुद्र के इस ओर हैं और हमारी सीता हमसे बस कुछ ही दूरी पर है तो अब हमें कुछ रास्ता ढूंढना चाहिये जिससे हम सीते को उस पापी रावण से मुक्ति दिला सकें!
सुग्रीवः भगवन! काफ़ी बडी समस्या आ चुकी है, अभी-अभी प्राप्त खबरों से पता चला है कि श्रीलंका सरकार औफ़ रावण ऑर्गनाईजेशन ने सारे समुद्री रास्तों पर अतिक्रमण बैन कर रखा है.
रामचंद्र जीः तो प्यारे हनुमान अब तुम ही बताओ कि क्या किया जाये मेरी सीते तक पहुँचने के लिये?
हनुमानः भगवन म्रेरे अनुसार एक ही कारगर उपाय है कि हमें किसी प्राईवेट कम्पनी को हायर यां ये कहिये कि किसी कम्पनी यां ब्रांड का ब्रांड एम्बैस्सडर बनना चाहिये किससे उसके नाम यां डिजायन किये लोगो को हम पत्थरों पर चिपकाते चले जायेंगे और हमारे पत्थर आसानी से समुद्र में तैर जायेंगें!
रामचंद्र जीः काफ़ी अच्छा विचार लाये हो हनुमान. अब आगे भविष्य में कानूनी कार्यवाही हम पर होने से रही! क्योंकि इन पत्थरों पर हमारा कोई ब्रांडनेम नहीं है और कोई भी सबूत आने वाले युगों तक नहीं होगा क्योंकि हमारे खिलाफ़ कोई पुख्ता सबूत भी तो नहीं मिलेंगें, लेकिन!....
हनुमानः लेकिन क्या प्रभु? फ़िर से कोई दुविधा है इस कार्य में?
रामचंद्र जीः समस्या ये है मेरे प्यारे हनुमान कि हम श्रीलंका सरकार के नियम कैसे तोडें और ना तुमने और ना ही मैने कोई एन्जीनियरिंग की है सेतु बनाने के लिये?
हम इस कार्य में दक्ष नहीं हैं तो अब आगे क्या होगा?
हनुमानःआप तनिक चिंता ना करें भगवन उसका भी प्रबंध कर लिया गया है प्रायोजकों की लिस्ट में एक एन्जीनियरिंग कॉलेज भी है और वहाँ के विध्यार्थी कोई प्रक्टिकल करना चाहते थे तो मैने उनसे बात कर ली है वो उसके बदले में हमें और रकम देने की बात कर रहें हैं,
रही बात श्रीलंका सरकार की तो वो लोग भी 50 परसेंट की स्पांसरशिप की रकम डकारने के लिये राजी हो चुके हैं जो रावण् को बिना बताये ली जा रही है

अब समुद्र के रास्ते सेतु बनाने के लिये सारे रास्ते खुल चुके थे और बाकायदा रामचंद्र जी और उनकी टीम को बहुत सारे स्पांसर भी मिल रहे थे, जल्दी ही लग रहा था कि अब लंका दूर नहीं!

गुरुवार, 6 सितंबर 2007

हिन्दी ब्लॉगिंग का एतिहास का पार्टः2

क्षमा करें शिवकुमार मिश्र और ज्ञानदत्त पाण्डेय जी! क्योंकि मैने आपके ब्लॉग को पढ्ने के बाद ही इसे आगे बढानें का निर्णय लिया,क्योंकि आपके हास्य में जो सच छुपा हुआ था वो शायद हिन्दी ब्लॉगरों के लिये स्वर्णकाल साबित हो सकता है.भविष्य लेखन में जो आपने हमें सपना दिखाया है वो जरूर सच होगा क्योंकि हिन्दी विश्व भाषा बन जायें, ये हो सकता है

हिन्दी ब्लॉगिंग का एतिहास का पार्टः2



क्या आप
हिन्दी कोविश्वभाषा
बना सकते हैं?

मैं ये नहीं सोचता हूँ कि हिन्दी के उपर कोई ग्रन्थ लिखा जाये यां कोई पोथी लिखी जाये लेकिन आपके लेख से ये तस्वीर मन में उभर कर सामनें आयी कि अगर हम सब लोग समुचित और सामूहिक प्रयत्न करें तो हिन्दी क्या हर हिन्दुस्तानी दुनियां को अपने कदमों मे डाल लेगा.आज जब गूगल और अन्य देश हिन्दी प्रचार-प्रसार के लिये प्रयास कर रहे हैं और हमारे भारतीय बन्धु जो दूर रहकर भी हिन्दी को आत्मसात कर रहे हैं तो हमारा सिर गौरव से ऊँचा हो जाता है.



अब आगे की कडी.....समीरलाल जी से ही शुरू करते हैं- हमारे समीर जी उर्फ़ पवनदूत हनुमान जी आजकल अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी चिट्ठाकारी संघ के अध्यक्ष बने बैठे हैं. हिन्दी संघ में हमारे भारतीय राजदूत श्री "शास्त्री जी" भारत से कच्चे चिट्ठों की सप्लाई दनादन एक्स्पोर्ट कर रहे हैं जिससे भारत के लोगों को एक नया रोजगार मिल गया है हिन्दी सिखाने के लिये और सीखने के लिये बाकायदा वर्ल्ड बैंक ने एक कोष इनको दे रक्खा है,भई रवि जी ने हिन्दी में ऑपरेटिंग सिस्टम करने के बाद माइक्रोसॉफ़्ट और लीनिक्स को टेकओवर कर लिया है.यहाँ तक कि हिन्दी के अलावा दो हजार से ऊपर भारतीय भाषायें शामिल कर ली गयीं है. अन्ग्रेजी को अब लोग 'कौतहूल' की द्रष्टि से देखते हैं, और इसके बंधुआ भारतीयों की आजादी की कहानियाँ पढते हैं.
नये नये हिन्दी कॉलसेन्टर विदेशों में खुल चुके हैं क्योंकि हिन्दी की अनिवार्यता हर देश में एकसमान रूप से लागू है.

अब आगे शिवकुमार मिश्र और ज्ञानदत्त पाण्डेय जी इसे लिखेंगें........

सोमवार, 6 अगस्त 2007

कुत्तालेखः भाग एक- राई का पहाड

चौंक गये! है न ये अजीबो-गरीब शीर्षक. जी हाँ ये शीर्षक मुझे कल रात बैठे-बैठे मिल गया जब घर के बाहर बैठा एक आवारा टाइप कुत्ता किसी दूसरे कुत्ते को देखकर भौंकने लगा.मुझे लगा यार क्यों न एक सीरिज बनाई जाये तो फ़िर् क्या था थोडी अक्ल में हिमताज तेल लगाकर एक बार फ़िर हाजिर हूँ इंसानों के वफ़ादार दोस्त कुत्तों पर समर्पित ये सीरिज कुत्तालेख.

....अभी-अभी किसी ने पुलिस को सूचित किया कि गली के बाहर एक कुत्ते की लाश पडी हुई है तो पुलिस आनन-फ़ानन में पहुँचकर घटना का जायजा ले ही रही थी कहीं से ये बात मीडिया को भी पता चल गयी फ़िर क्या था. कुछ ही देर में सारे देश का मीडिया घटनास्थल पर पहुँच चुका था.घटना की ब्रॉडकास्टिंग लाइव होने लगी. सारे देश में कुत्ते का मर्डर एक्लूसिव खबर बन चुका था. अभी ये सब चल ही रहा था कि पशु बचाओ आंदोलन वाले पहुँच गये फ़िर क्या था होने लगी नारेबाजी.राज्य के मुख्यमंत्री तक घटना की की खबर पहुँच चुकी थी उन्होने भी आनन-फ़ानन में जाँच कमेटी गठित करने का फ़ैसला ले लिया और खुद ही घटनास्थल की ओर निकल लिये.

अभी पहुँच नहीं पाये थे कि विरोधी पार्टियों के दलों के नेता अपने समर्थकों के साथ पहुँचकर हंगामा करने लगे जिससे पुलिस-प्रशासन को काफ़ी दिक्कत हो रही थी.अचानक कहीं से किसी ने गोली चला दी जिससे अफ़रा-तफ़री का माहौल पैदा हो गया. अब अराजक तत्वों का राज था जिससे राज्य में कर्फ़्यू घोषित करना पडा.

देशभर में इन सब घटनाओं की कवरेज लाइव दिखायी जा रही थी जिससे जन्-आक्रोश पैदा हो रहा था. बाहर मुल्कों ने भी इस घटना पर असंतोष जाहिर किया.
अब बारी केन्द्र सरकार की थी सो वो भी लपेटे में आ गये और खुद प्रधानमंत्री को अपना इस्तीफ़ा देना पडा. देश में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया.
लेकिन इन सबके बीच सारे मीडिया चैनलों की टी.आर.पी. अप्रत्याशित रूप से आसमान की ऊँचाई को छू रही थी लेकिन उस कुत्ते की लाश पर कोई भी रोने वाला नहीं मिला सिवा मीडिया के.

वैधानिक चेतावनीः कुता होना व कुत्ते की मौत मरना देश के लिये हानिकारक है!

शनिवार, 4 अगस्त 2007

भाई! बच के रहना

यार कल हमने अपना 1991 मॉडल का 007 नंबर का स्कूटर छुपा दिया है. क्योंकि आज कल मुझे लोग संदेह की द्रष्टि से देखने लगे हैं, मैने अपना मोबाईल नं0 भी बदल दिया है,क्या पता सी.बी.आई वालों यां आज तक के शम्स ताहीर खान भाई का फ़ोन न आ जाये.(यार ये अशोक मल्होत्रा कहाँ से मुआ आ गया है)

मैने अपनी श्रीमति जी से कह दिया कि अगर कोई मेरा जन्मदिन 07.07.07(मेरा जन्मदिन 7 जुलाई को होता है ) के बारे में पूछे तो कह देना ये न्यू सेवन वंडर वालों ने रजिस्टर्ड करवाया हुआ है हमारा जन्मदिन तो हमें याद ही नहीं.कोई पूछे तो क्या करते हैं तो कह देना लेखक हैं! बेचारे डर के मारे भाग खडे होंगे.लेकिन इतना ध्यान रखना अपन मकान नं0 100 नहीं 4/100/ए.बी. यां 100/4/28/बी.सी बताना कहीं लेने के देने ना पड् जायें.
अपनी मार्कशीट से 1st रैंक हटा दो उन लोगों को संदेह ना हो जाये कि कही तुमने रिश्वत तो नहीं दी है पास होने में.
मेरी बनियांन-अंडरवियर, पैंट-शर्ट,बेल्ट पर्स आदि का साईज 1/2 करके बताना जैसे 32 1/2 - 42 1/3 बताना.

घर में जो अपने कम्प्यूटर पे जो वेबकैम लगा है उसे निकाल फ़ैंकना क्या पता वो समझेंगे कि हम इसका इस्तेमाल हम घर की निगरानी में कर रहे हों?
मुन्नु को कह देना अभी जिद ना करे मोटरसाईकिल के लिये क्या पता आर.टी.ओ. वाले कोई वी.वी.आई.पी. नम्बर ना एलॉट कर दें? कोई भरोसा नहीं है कब कहाँ से कोई भी,कैसी भी मुसीबत टपक पडे.

और हाँ अपने रिश्तेदारों से कह दो अभी हमसे कोई भी कांटेक्ट ना करे क्योंकि अगर हम गये तो वो भी लपेटे में आ जायेंगे.

बस ये चंद बातें अपनी धर्मपत्नि को समझाकर हम चल दिये पास के थानें मे अपनी सैटिंग करने.......

शुक्रवार, 3 अगस्त 2007

अनुगूँज 22: हिन्दुस्तान अमरीका बन जाए तो कैसा होगा - पाँच बातें


तो भाई लोगों पहली बार आपने मुझे छेडा है तो लो सुनो हमारे श्रीमुख से!

पहले-पहल अगर भारतवर्ष् अमरीका भी बन जाये तो कुछ नहीं बद्लेगा सिवा इनके...

1. नारद.अक्षरग्राम की रेटिंग याहू-गूगल से कहीं सैकडो-करोडों यूजर्स से आगे होगी. बडी-बडी कम्पनियां इस् नेट्वर्क को खरीदने के लिये लालायित् होंगे. नारद टीम और नारद जी खुद लॉस-वेगास जैसे किसी बीच पर अपना विलासिता भरा जीवन जी रहे होंगे.
वेबसाईट का काम अब हमारे वरिष्ठ लेखक जैसे आलोक जी, मसीवजी,अरूण भाई,नीलिमा जी,शास्त्री जी,समीर लाल जी जैसे महान लोग संभालेंगे.

2.सिर्फ़ हिन्दी बोलने-लिखने की आजादी होगी,अंग्रेजी बोलने वालों को पकिस्तान और अंडमान-निकोबार द्वीप पर भेज दिया जायेगा और उनको हिन्दी में प्रक्षिशित करके फ़िर से हिन्दी ब्लॉगिंग के काम मे लगा दिया जायेगा.

3. हम भी कभी व्रेस्टलिंग यानी कुश्ती के चैम्पियन बन जायेंगे. हमारी भी बराबरी अंडरटेकर,केन, रॉक जैसे फ़ाईटरों से समतुल्य होगी. किसी फ़िल्म को करने के लिये हम भी 5-10 करोड् डॉलर से कम बात नहीं करेंगे.

4. खाना-पीना सब इंस्टैंट हो जायेगा, मुन्नु अपनी किताबें अपने पैन में रखकर जायेगा,लडकियों में दस साल की उमर से ही ब्यूटी कॉन्टेस्ट शुरू हो जायेंगे,माता-पिता अब औलाद के पैदा होते ही उनको घर दिलवा देंगे,छींकने पर भी टैक्स होगा, रोने के लिये सिर्फ़ कब्रिस्तान मिलेगा क्योंकि लाफ़्टर गैंग्स वहाँ नहीं मिलते.रूपया पैसा सब मिलेगा लेकिन इसके लिये बंदूक खरीदकर अपराधी बनने का प्रमाणपत्र देना होगा.

5. भाई नेता बनने के लिये एक्जाम होंगे- टॉपर को प्रधानमन्त्री और बाकी सब रैंक के आधार पर मन्त्री बनेंगे, रिश्तेदारों से अंतरिक्ष से बात हो सके इसलिये रिलांयंस-टाटा सैटेलाईट वीडियो कान्फ़्रेंसिंग की सुविधा मुफ़्त देंगे, किसी भी बीवी यां पति को दूसरे के बीवी यां पति के साथ रहने-यां घूमने के लिये आजादी होगी.

बुधवार, 1 अगस्त 2007

शास्त्री जी कैमरे का सही यूज कर रहे हैं आप। दो-दो ब्लॉग!

वाह शास्त्री जी कैमरे और जगह का सही उपयोग कर रहें है आज् आपने जो दो पोस्ट् एक ही लोकेशन की थी उसको बाँटकर हिलाकर रख दिया। . लेकिन अगर केवल फ़ोटो ही पोस्ट करते रहेंगे तो हम कहाँ जायेंगे ?

सोमवार, 30 जुलाई 2007

पंगेबाज का भविष्य के गर्भ का फ़ाइनल पार्ट

पिछले दिनों जब मैं बाहर क्या चला गया कि पंगेबाज भाई ने भविष्य के गर्भ से पार्ट टू भी लांच कर दिया लेकिन वो इसका फ़ाइनल पार्ट बनाते इससे पहले हमने ही गुरू पंगेबाज को उन्ही की स्टाईल में पटकनी देने का विचार बना लिया।
तो अब हाजिर है भविष्य के गर्भ से का फ़ाइनल पार्ट् जो हमारे पंगेबाज दादा की आंखे खोल दे यां वो मेरी आखें फ़ोड् देंगे इस ब्लाँग को पढने के बाद।

कुछ ध्यान रखने योग्य बातें > जैसे कि कुछ लोगों को भगवान इन्द्रदेव और नारद जी ने मीटिंग करके अमरता का वरदान दिया है.
1. उड्न-तश्तरी> ये भाई साहब को आजकल नारद जी ने अपना पर्सनल सैक्रेटरी चुन लिया है. इनके बाबा-आदम जमाने के उडन्-खटोले को नारद जी ने किसी यू.एफ़.ओ. से एक्स्चेंज ऑफ़र के तहत बदलवा दिया है जिससे उनका आवगमन सुलभ हो सके क्योंकि हर ब्लॉगर के पास पहुँचने में देर हो जाती थी. इसकी स्पीड भी काफ़ी प्रकाशवर्ष् तेज है और ये हर अत्याधुनिक सुख्-सुविधाओं से लैस है।
2.खुशी > जो तरकश की पॉडकास्टर हैं उनको इन्द्रदेव ने खुश होकर अपने यहाँ पॉडकास्टिंग यानी की ब्लॉगर एफ़. एम. की मुख्य वक्ता घोषित कर रक्खा है. आज इन्द्रलोक में अप्सरायों का न्रत्य नहीं बल्कि ब्लॉगर एफ़.एम. गूंजता है.
3.नारद की पूरी टीम को नारद ने स्पेशल सेल बनाकर दे दी है क्योंकि इनके द्वारा ही नारद जी इस लोक पर अवतरित हुये थे.

चलिये अब शुरू करें.....
आज सन् 3007 का समय है स्थान ब्लॉगर-लोक (प्रथ्वीलोक्) का नया नाम और समय है ब्लॉगर-युग क्योंकि कलयुग को ब्लॉगरों ने अपने ब्लॉग्स से पाट दिया था. आज ब्लॉगर एफ़.एम. पर ब्लॉगर-मुनि यानी कि मैं (कलयुग में मै कमलेश मदान नाम का प्राणी हुआ करता था पर मेरे लेखन कार्य से ग्रसित होकर नारद जी ने मुझे भी अमरता फ़्री में दे दी.)मेरा आज खुशी के साथ साक्षात्कार था.
पेश है उसकी कुछ झलकियाँ--------
खुशी- मुनिवर हमने सुना है आप प्रथ्वीलोक के वासी थे लेकिन किसी पंगेबाज नामक व्यक्ति से आप भी घबराते थे क्यों?
मैं-- क्या बतायें हम उनसे घबराते नहीं थे बल्कि उस समय जो पंगेबाज ने अपनी असुरी शक्तियों का प्रयोग हम निरीह प्राणियों पर अपने उलूल-जुलूल पंगेबाजी द्वारा किया था वो असहनीय था. फ़िर एक दिन हमने उन्हें उनके कार्यों पर चेताया भी था कि संभल जाओ पर वो नहीं माने और आज प्रेत-योनि भुगत रहे हैं.

खुशी- सुना है उनकी कुछ पंगेबाजी उस लोक के कुछ पुलिसवालों यानी नगररक्षकों से भी हुयी थी?
मैं-- हाँ ये भी हमें पता था लेकिन हम लोग उनके डर के कारण चुप थे.

खुशी- अपने प्रशंसकों और विचारकों को कोई सन्देश देना चाहेंगे आप?
मैं--प्यारे ब्लॉगर्-लोक वासियों कभी भी पंगेबाजी के टेढे रास्ते से चलने से अच्छा है खुद का ब्लॉग सुधारो! हमेशा नये लेखकों को प्रोत्साहित करो और टिपियाना भूलो मत वरना आज प्रेत बनकर इस तरह भट्कोगे कि ढूढते रह जाओगे!

गुरुवार, 26 जुलाई 2007

तुरत-फ़ुरत के सब साथी

आज जब जल्दी-जल्दी में दफ़्तर के लिये निकला तो याद आया मेरा मोबाईल और पर्स छूट गया है, सो वापस जल्दी-जल्दी घर पहुँचे. घर पहुँच कर देखा तो बीवी कराह रही थी. हमने पूछा क्या हुआ तो जवाब मिला " जल्दी-जल्दी सीढियों से उतर रही थी,गिर पडी. चलो अब आये हो तो मुन्नी को स्कूल भी छोड्ते जाना!"

मुझे पहले से ही देर हो रही थी कि उपर से बिन्-बुलायी मुसीबत गले पड गयी. चलो पत्नी पीडित होने की सजा भुगतनी पडी.मुन्नी को छोड्कर जैसे ही दफ़्तर के लिये रवान हुये कि पता चला कि जल्दी-जल्दी में हम जुराब अलग-अलग पहन कर चल दिये हैं ये भी फ़जीहत। चलो किसी तरह औफ़िस पहुँचे तो याद आया कि आज शनिवार है आँफ़िस का कार्यकाल समाप्त होने को है अर्थात सिर मुढाते ही ओले पड गये तिस पर जले पर नमक ये कि बाँस का सामना हो गया. फ़ुँकारे मार रहे बाँस के आगे भीगी बिल्ली बनना पडा सो अलग.अब काटो तो खून नहीं वाला हिसाब हो चला था सारी जल्दी-जल्दी धरी रह गयी थी.
बाँस ने तीन घंटे का ओवर-टाईम करवाया वो भी बिना किसी इंटरवल के. भूख के मारे पेट में आँते कुलबुलाने लगीं लेकिन उस यमराज के दूत को रहम नहीं आया मानों सारा होमवर्क मुझे ही करना था।

किसी तरह शाम को जब छुट्टी हुई तो जल्दी-जल्दी घर की तरफ़ निकल लिये, इससे पहले हम बस-स्टाप पर पहुँचते बस हमसे पहले निकल चुकी थी. वाह रे किस्मत ! अब तो जी में आया कि किसी रेल याँ बस के नीचे जान दे दें. लेकिन मजबूर इंसान कुछ भी नहीं कर सकता सिर्फ़ अपनी दुर्दशा पर रो सकता है. सो हम पैदल ही चल दिये घर की तरफ़ क्योंकि हमारे पास इतना पैसा नहीं कि टैक्सी का भाडा दे सकें.

घर पहुँचते ही हमारी पत्नी ने जो दुखद समाचार सुनाया वो इस प्रकार है कि " आज जल्दी-जल्दी के चक्कर में खाना बनाते वक्त कुकर हाथ से छूट्कर नीचे गिर गया था,सारी सब्जी फ़ैल गयी. घर में जो रखा था वो मैने और मुन्नी ने बनाकर खा लिया अब आपको भूखे ही सोना पडेगा"
सो हम भी पानी पीकर जल्दी-जल्दी सोने का प्रयास करने लगे क्योंकि कल से फ़िर जल्दी-जल्दी सारे काम करने होंगे.

गुरुवार, 5 जुलाई 2007

जहाँपनाह ये क्या हो रहा है?

मुगल सम्राट शाहजहाँ(असली नाम "खुर्रम") ने इमरजेंसी मीटिंग बुलायी है। शहर के सभी गणमान्य लोग उपस्थित हैं और मीटिंग का विषय है "ताज पर 'एस एम एस' कैसे करें?
एक दरबारी बोला "जहाँपनाह् आज पूरा विश्व आपके पीछे पडा हुआ है,मालूम होता है जैसे शायद कोई गुनाह किया है आपने!
दूसरा तपाक से बोला "लेकिन जहाँपनाह चिन्ता का विषय यह है कि पहले तो उन्होने ताजमहल पर 'टिकट' लगाया हमने कुछ नहीं किया फ़िर इस पर और गुस्ताखी विश्व की बेमेल इमारतों की तुलना ताज से करने लगे,और फ़िर अब हमें इन इमारतों की बेमतलब की प्रतियोगिता में हमारे ताज को बचाने के लिये एस.एम.एस. नाम का चिठ्ठा एक विधुत चालित यंत्र से करना पडेगा
जहाँपनाह आप ही बतायें इन गुस्ताखों को कौन समझाये कि आज हमारा सारा खजाना ताज को बनानें में लग चुका है, तिस पर यह कि हमे बेगम मुमताज और आपकी नौं बेगमों के लिये खर्चा-पानी का जुगाड भी नहीं लग पा रहा है. अब आप ही बतायें कि बैठे-बिठाये ये इन गुस्ताख लोगों ने हमारे लिये कितनी बडी मुसीबत पैदा कर दी है
अचानक एक अनुभवी किन्तु चिंतित बुजुर्ग ने खाँसकर पहले तो अपना गला साफ़ किया और पान की पीक को पानदान में डालते हुये कहा "हुजूरे-आलम पूरा हिन्दोस्तान इस प्रचार में लगा हुआ है,मेरी जानकारी के अनुसार इस प्रतियोगिता के लिये एस्।एम्.एस्. से लाखों-करोडों का वारा-न्यारा होगा इनके आयोजकों को, और रायल्टी में हमें एक फ़ूटी कौडी नहीं मिलेगी. क्या ये ठीक है? अब लगता है अब समय आ गया है कि देश के "मानवाधिकार" आयोग में याचिका दायर कर दी जाये जिससे आप को पोप्युलैरिटी तो मिलेगी ही अखबार और न्यूज चैनल वालों को ब्रेकिंग न्यूज मिलेगी ही साथ ही साथ उनकी टी.आर.पी भी बढेगी जिससे लगातार इस देश के मीडिया वाले छा जायेंगे,एक साथ कई कम्पनियों का मुनाफ़ा होगा और आप भी हमेशा हाईलाइट हो जायेंगे(बिग बी काफ़ी बोरिंग हो चुके हैं)
सभी दरबारी समवेत स्वर में बोले "हाँ हाँ ये ठीक है"
और अन्त में सम्राट शाहजहाँ खडे होकर रुआँसे स्वर में बोले "मेरे प्यारे दरबारियों मैं समझ सकता हूँ आप की व्यथा लेकिन मैं मजबूर हूँ क्योकि जिस कम्पनी ने यह प्रतियोगिता करवायी है उन्होने मुझे "लिस्बन मे 07.07.07 को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया है। और वहाँ ना पहुँचने पर काँन्ट्रेक्ट के अनुसार मुझको मेरी जायदाद से बेद्खल करके किसी ट्रस्ट को रखरखाव को दे दी जायेगी जिससे हमें फ़िर जमिंदोज होना पडेगा। वहाँ तक पहुँचने की जुगाड तक लग नही पा रही है,कैसे हम और हमारी द्स बेगमें "लिस्बन" पहुँचेंगे इसलिये मेरे प्यारे दरबारियों इस विषय को यहीं खतम करना उचित होगा और नये सिरे से सोचना होगा कि वहाँ तक जाने की जुगाड कैसे हो? नही तो ये जालिम दुनियाँवाले हमें कोर्ट का सम्मन भेजकर हमें चैन से अपनी कब्रों में सोने नहीं देंगे।
और इसी चिन्ता के विषय को लेकर सभा अगले दिन के लिये स्थगित् कर दी गयी