मंगलवार, 5 फ़रवरी 2008

लो! अब यहाँ भी राजनीति की बू आने लगी

Posted on 9:46:00 pm by kamlesh madaan

मेरे सभी भड़ासी,मोहल्लेवालों,हिन्दी चिट्ठाकारों, रचनाकारों,ब्लॉगर भाईयों को मैं ये संदेश देना चाहता हूँ कि कुछ अराजकता अब हमारे चिट्ठासमुदाय में भी फ़ैल रही है, क्या आप उस विरोध के स्वरों को दबानें में मेरी मदद करेंगें?

बेनामी ने कहा…

भईया थोड़ा संतुलन बना कर लिखना चाहिये ना… बाल ठाकरे का प्रश्न आज भी अनुत्तरित है कि "यदि बिहारी इतने ही मेहनती, ईमानदार, कर्मठ हैं तो ये सारी बातें वे बिहार में क्यों नहीं लगाते" या शायद बिहार को उन्होंने शहाबुद्दीनों के हवाले कर दिया है? पटना को मुम्बई नहीं बना सकते तो कम से कम मुम्बई को पटना तो मत बनाओ भाई.



मेरी कल की पोस्ट आमची मुम्बई! एक दुःस्वप्न पर एक बेनामी भाई ने सीधे बिहार और उत्तर भारतीयों को खुल्लम-खुल्ला कह दिया है कि उन लोगों को अपने ही प्रदेश में काम करना चाहिये, अब भाई कोई इनको कौन समझायेगा कि मुम्बई इन भाई साहब और राज ठाकरे जैसे छुटभैये नेताओं की बपौती नहीं है जो आप किसी को भी महाराष्ट्र से बेदखल कर दोगे, अरे भाई क्या भारत में रहने के लिये मुम्बई ही मिला है हमको? अगर हमने पलायन करना शुरू कर दिया ना तो खाने लाले ना पड़ जायें तो हमको उत्तर भारतीय कहना.

माना कि हमें अपने ही प्रदेशों में काम नहीं लेकिन हम अपनी सरकारों के कारण ऐसे हैं शहाबुद्दीन जैसे कीड़े तो इसी सरकारों की उपज हैं जो हमेशा धरती को खोखला करते रहते हैं, लेकिन उससे भी घटिया सोच आपने पाल रखी है जो हम उत्तर भारतीयों को नसीहत देकर अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं.
अगर इतना ही दम है आपकी बातों में तो सामने आकर बात करनी थी ना कि उन चन्द बीमार मानसिकता वाले लोगों की तरह छिपते-छिपाते फ़िर रहे हो बेचारे टैक्सी-रिक्शा और नौकरीपेशा लोगों को अपना निशाना बना रहे हैं.

सबसे बड़ी बात ये है कि आपने उत्तर भारतीयों की सहनशीलता को ललकारा है जो कदापि शायद किसी को मंजूर होगी क्योंकि हम लोग आप लोगों की तरह गिरी हुई मानसिकता वाले नहीं हैं जो आपने अभी-अभी पूरे देश को दिखायी है.

3 Response to "लो! अब यहाँ भी राजनीति की बू आने लगी"

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सुजाता Says....

आपने उत्तर भारतीयों की सहनशीलता को ललकारा है जो कदापि शायद किसी को मंजूर होगी
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पूरी घटना बेवकूफी भरी राजनीतिक कार्यवाही है । लेकिन इस हास्यास्पद किस्म के काम का दोहराव क्यो होना चाहिये। यह किसी मूढमति पर तरस खाने का वाकया है शायद, लडने भिडने का नही ।

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आशीष महर्षि Says....

मैं तो इतना जानता हूं कि मुंबई ही नहीं देश का कोई भी शहर किसी के बाप की जागीर नहीं है

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धीरज चौरसिया Says....

हममम....... दोष किसे दे, कही ना कही तो हम भी जिम्मेवार है दोस्त, आखिर ईन दोगले नेताओ को चुनते तो हमी लोग है ना| अगर हम बम्बई को मुम्बई बना सकते है तो पटना और लखनऊ को क्यो नही कर सकते|