सोमवार, 18 फ़रवरी 2008

इलाहाबाद! मेरी नजर से और ज्ञानदत्त दद्दा से मुलाकात

Posted on 8:28:00 pm by kamlesh madaan

तो लो भाई आखिर हम इलाहाबाद हो ही आये! माघ के इस पवित्र माह में इलाहाबाद जाना तो एक सुखद अनुभूती तो थी ही लेकिन साथ ही साथ पांडे जी से मुलाकात के लिये मन मचल रहा था, अब आगे क्या हुआ......

पहले इलाहाबाद के बारे में : वाकई में इलाहाबाद एक सुंदर शहर है जिसमें न तो कोई महानगरीय शोर-गुल है न तो कोई झाम-झंझट, अपनी धरोहर और संस्क्रति को सहेजकर रखना कोई इलाहाबाद से सीखे,ऐसा लगा कि हम इटली सरीखे देश की यात्रा कर रहे हों.

ज्यादा कुछ नहीं घूम पाये क्योंकि किसी शादी के सिलसिले में गये थे और काफ़ी व्यस्त कार्यक्रम था जिसमे एक ही दिन में वाराणसी की यात्रा भी शामिल थी पर जब सुबह पाँच बजे आगरा से इलाहाबाद पहुँचे तो सुबह-सुबह स्टेशन पर भीड़ देखकर लगा कि मैं शायद गलत स्टेशन पर उतर गया हूँ लेकिन यह इलाहाबाद था और माघ मेला अपने चरम पर था, इसके बाद सात-आठ बजे जब स्नानादि से निव्रत्त होकर बाजार में आये तो लगा गलियां सिर्फ़ रतलाम में ही नहीं हैं बल्कि इलाहाबाद भी एक गलियों का शहर है, सुबह-सुबह पूरी-सब्जी(शायद उसे वहाँ फ़ुल्की कहते हैं) और मक्खन-मलाई का कुल्हड़ का स्वाद चखा तो मन प्रसन्न हो उठा इसके बाद कुछ हमारे शुभचिंतकों ने हमें छोटी-छोटी और काफ़ी छोटी जलेबियां खिलायीं जो इतनी स्वादिष्ट थी कि मन तो कर रहा था कि वहीं अपना घर लेकर सुबह शाम इन्ही व्यंजनों में अपना समय व्यतीत करें,

ग्यारह बजे के आसपास हम लोग बस के द्वारा वाराणसी की ओर चले कुछ देर में ही शास्त्री पुल के ऊपर जब बस पहुँची तो लगा कि जैसे हमारे आने का मकसद पूरा हो उठा क्योंकि संगम का विहंगम द्रश्य देखने को मिला.

सबसे पहले हमने पांडे जी का फ़ोन यां मोबाइल नं जानने की कोशिश की और असफ़ल रहे फ़िर हमने उनके ब्लॉग पर टिप्पणी के रूप में अपना मोबाइल नं और परिचय दिया शायद मुझे लगा कि अगर वो ब्लॉग को देखेंगे तो मुझे जरूर फ़ोन करेंगें हो सकता है कि अगले दिन भी करें लेकिन पांडे जी बहुत ही सक्रिय ब्लॉगर है और तुरन्त लगभग एक घंटे में उनका जवाब एस.एम.एस. के रूप में आ गया जो मेरे लिये इस यात्रा में किसी रोमांच से कम नहीं था.

अब आगे....
खैर अगले दिन भी लौटने में देरी हो गयी कारण था कि एक स्कूली छात्रा को एक ट्रक नें रौंद दिया जिससे हाइवे पर जाम लग गया था ( इसका जिक्र उन्होने अपने कल के ब्लॉग पर भी किया है) जिसके कारण मेरे आगरा लौटने का समय कुछ ही शेष रह गया था अतः मैने पांडे जी को फ़ोन मिलाय तो वो अभी ऑफ़िस नहीं पहुँचे थे फ़ौर उन्होने मुझे अपने दफ़्तर की लोकेशन भी समझा दी, फ़िर भी मैं उनसे मिलने को नहीं जा सका और इस बारे में मैने उनसे खेद भी प्रकट किया क्योंकि इलाहाबद जाकर उनसे नहीं मिल सके थे.

खैर मिलना तो अब लगा रहेगा लेकिन कुछ बातें पांडे जी की अच्छी लगीं और कुछ बुरीं,

उनकी सबसे बड़ी अच्छाई ये है कि वो बहुत सुह्र्दय और म्रदभाषी हैं किसी को भी तुरंत अपने जाल में फ़साना उन्हे बखूबी आता है(माफ़ कीजियेगा यहाँ जाल का मतलब मीठे शब्दों के जाल से है), उनका तुरंत मेरी टिप्पणी का जवाब देना उनके सक्रियता की बड़ी निशानी है.

उनकी बुराई! ये बुराई मुझे उनकी अच्छाई सी लगी लेकिन मुझे उसमें अपनापन नहीं मिला लगा जैसे वो इतिश्री कर रहे हों.. दर-असल में वो मेरी हर बात का जवाब अंग्रेजी में दिये जा रहे थे और मैं हिन्दी बोले जा रहा था कभी मुझे अपने हिन्दी होने पर गुस्सा आ रहा था और कभी मुझे उनके आज के युवाओं के साथ कदम दर कदम मिलाकर चलने से खीझ हो रही थी. अब कर भी क्या सकता था उनके शहर में महमान था तो सहन करना ही था. ऐसा नहीं है कि अंग्रेजी मुझे नहीं आती लेकिन हिन्दी को बढावा देने के लिये मै कहीं भी इसके प्रयोग से बचता हूँ.

पांडे जी आप सुन रहे हैं ना! छोटे को माफ़ कर देना.

9 Response to "इलाहाबाद! मेरी नजर से और ज्ञानदत्त दद्दा से मुलाकात"

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अविनाश वाचस्पति Says....

मेहमान
में छिपा है
मान
और छिपा है
मेह भी.

मेह जो
नेह का है
स्नेह का है
इसे लो
पहचान
होगे तभी
मेहमान.

मान न मान
आप थे ज्ञान
के मेहमान
अब तो गये
होगे सब जान.

इल हा बाद
में नहीं हुई
आपकी
ज्ञान दद्दा से
आपकी मुकालात
पर अंग्रेज़ी
हिन्दी, हिन्दी
अंग्रेज़ी की
खूब हुई मुकालात.

रह गई अधूरी
क्या
अब भी कोई
बात ?

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अविनाश वाचस्पति Says....

मुलाकात का विवरण
मिला
पर मिलने का तो
कहीं पता ही नहीं
चला.

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mahashakti Says....

मित्र आपने इलाहाबाद सही से नही घूमा,नही तो एक 12 लाख की आबादी वाले कस्‍बे रतलाम की तुलना 55 लाख की आबादी वाले महानगर इलाहाबाद से नही करतें। इलाहाबाद उत्‍तर प्रदेश का सबसे अधिक जनसंख्‍या वाला जिला है, यहॉं एशिया का सबसे बड़ा उच्‍च न्‍यायालय है , यह ऐसा नगर है जहॉं करीब 12000 अधिवक्‍ता रहते है। 9 बजे के बाद आप जानसेनगंज, कोठापरचा, चौक, खुल्‍दाबाद, कटरा, अल्‍लापुर, बैहराना, रामबाग तथा तेलियरगंज में रहिऐ आपको इलाहाबादियों की ताकत का असल अंदाज मिलेगा। जहॉं मुझे लगता है कि आप रविवार को इलाहाबाद के चक्‍कर काट रहे थे जिस दिन लगभग आधे इलाहाबाद की मार्केट बन्‍द रहती है। इलाहाबाद की आंदाजने के लिये पर्याप्‍त समय चाहिऐ।

आपको आपकी शुभ यात्रा की हार्दिक बधाई :)

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कमलेश मदान Says....

मैने इलाहाबद को छोटा करके नहीं बताया बल्कि ये कहा कि महानगरीय ताम-झाम से परे इलाहाबाद काफ़ी शान्त है और बाकी रही रविवार की बात तो हम भाई शुक्रवार के दिन पहुँचे थे और शनिवार को वापिसी कर लिये थे ये जो इलाके आप बता रहे है उनमें से आधे इलाकों में हम घूम भी आये लेकिन कहीं घुटन महसूस नहीं हुयी.

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Udan Tashtari Says....

मैं स्वयं भी इलाहाबाद जा रहा हूँ मगर बस स्टेशन तक...इस बर मजबूरी वश रुक पाना संभव नहीं हो पा रहा है जबकि वहाँ मेरी ससुराल है और उनसे बच भागने के रास्ते कम ही होते हैं. :)

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Gyandutt Pandey Says....

भैया कमलेश अपने सही पकड़ा। कई लोग ऐसा कह चुके हैं। फोन पर मेरी बात बहुत नपी तुली होती है। मेरी पत्नी भी कहती हैं कि सामान्य बात भी फोन पर गुर्राते से बोलते लगते हो।
मेरे काम में फोन पर पोजीशन टेकिंग बहुत होती है। लिहाजा अंग्रेजी का प्रयोग और "कर्ट" भाषा शायद बोलने का अंग हो गया है। सॉरी। पर वह शायद मेरे व्यक्तित्व की खोल भर है।

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विस्फोट Says....

बड़े साफ आदमी हो यार. साफ-साफ लिख दिया.

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अविनाश वाचस्पति Says....

फिर सॉरी
ज्ञान जी
लेकर चल पड़े
फिर एक लारी.

बात अब आई
समझ में सारी
पोजिशन लेने की
है सच्ची लाचारी.

चौखट वाले चन्दन
भी पोजिशन बहुत
लेते देते हैं.

हमें भी जानना हो कुछ
उनसे तो 'पोजिशन' का
एक सन्दू (sms)सब कुछ
ब्यान कर देता है अभी भी
रहता है जारी सभी ही.

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संजय बेंगाणी Says....

ज्ञानजी से मिलेंगे तो एक समस्या होगी. वे अंग्रेजी में बोलेंगे और हमें अंग्रेजी आती नहीं. कोई रास्ता निकालने के बाद ही कार्यक्रम बनायेंगे.

आपने दृश्य को द्रश्य और निवृत को निव्रत लिखा है. एक दो शब्द और भी है. टोकने के लिए क्षमा चाहता हूँ, क्योंकि वर्तनी की भूलें मुझसे बहुत होती हैं.

संस्मरण अच्छा रहा.