गुरुवार, 17 अप्रैल 2008

अविनाश ! आपको आईना दिखा रहा हूँ, हो सके तो शर्म करना

Posted on 10:41:00 pm by kamlesh madaan

अभी तक तो लोगों ने समझा था कि अविनाश कुछ हद तक महत्वाकांक्षी हैं लेकिन अब तो लग रहा है कि उन्होने उस सीमा-रेखा को भी लांघ दिया है जहाँ से इंसान का पतन शुरू हो जाता है.

पहले-पहल आप ही सभी लोगों को लेकर साथ में मुहल्ले का निर्माण करना, फ़िर जिस थाली(ब्लॉग एग्रीग्रेटरों) का खाया उसी में छेद करना.

कुछ विवादित होने का ठप्पा लगा तो खुश होकर अति उत्साह में ब्लॉग जगत के दिग्गजों को नारद के समय अपमानित किया.

हो-हल्ला मचा तो मिमिया कर कुछ समय तक खामोश रहे, अब जबकि ब्लॉगवाणी और चिट्ठाजगत ने सहारा दिया तो फ़िर से वही विवाद, कुतर्क,गाजा(ये विषय लगभग 99% भारतीयों को पता ही नहीं), भड़ास से जान बूझकर लड़ाई को खींचना.

फ़िर से मिमिया कर चुप हो जाना क्योंकि हमेशा विरोध में शेर ही सामने पाये गये कभी किसी गीदड़ से टकराहट नहीं हुयी,

अब खीज अपनी ही साथियों पर उतारी जाने लगी क्योंकि वो लोग भी अच्छा और मौलिक लिख रहे थे, क्योंकि कभी आपको मौलिक लिखे नहीं देखा कभी किसी की गजल,किसी सूफ़ी संत का गाना,उधार के लेख ही लिखे पाया.
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ये बात तो माननी पड़ेगी कि आपको टाईटल बनाने में महारत हासिल है, तो क्यों न आप किसी साबुन-तेल बनाने वाली किसी कंपनी में ज्वाइन करते? आपको वहाँ अच्छे पैसे मिल सकते हैं भाई!
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बेटियों का ब्लॉग-- जानते हैं इस ब्लॉग को लेकर कितने लोगों के मन में उत्साह भर गया था और आज भी वो अपना सारा प्यार और दुलार लेख के माध्यम से इस ब्लॉग पर उतारना चाहते हैं? लेकिन आप !
आपने वहाँ भी किसी के लिये उमीद नहीं छोड़ी, वाकई में आप जैसा महत्वाकांक्षी और बेकार इंसान नहीं देखा जिसने अपने आपको बनाने के लिये अपने ही भाई लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ किया है

आपने जीतू भाई (जितेंद्र- नारद के कर्ता-धर्ता) जी का अपमान किया है यां ये भी कह सकते हैं कि अपने अपमान का बदला लिया है!

जो भी हो फ़िलहाल तो ब्लॉगवाणी,चिट्ठाजगत,नारद और हिन्दीब्लॉग्स.कॉम जैसे महान एग्रीग्रेटर्स जिन्होने हम जैसे अनजान लोगों को हिन्दी में लिखने को प्रेरित किया, आप उन्ही महान लोगों की प्रतिष्ठा को ताक पर रखकर अपनी मनमर्जी चला रहे हैं जो शायद इस हिन्दी चिट्ठा जगत को कतई बर्दाश्त नहीं होगी.

अगर आपमें वाकई इंसानियत थोड़ी बहुत बची हुयी है तो आप सार्वजनिक रूप में जीतू भाई से माफ़ी मांग लें(हम जैसे लोगों की गिनती नहीं है) तो शायद आप अपने अस्तित्व को बचा सकते हैं वरना मुझे लग रहा है कि आपके ब्लॉग्स का कहीं सार्वजनिक रूप से बहिष्कार न हो जाये


आपका प्रिय
कमलेश मदान

11 Response to "अविनाश ! आपको आईना दिखा रहा हूँ, हो सके तो शर्म करना"

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अनूप शुक्ल Says....

आपकी बात सही है। लेकिन समझ में न आने वाली अविनाश जी को!

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जी हां हुजूर, मैं पिनक बेचता हूं Says....

बेटा कमलेश मदान, अभी ब्‍लॉगिंग के मैदान में नये हो। जितेंदर और अनूप शुक्‍ला संघी है। मोदी प्रेमी है। तुम भी हो शायद। अविनाश का नाम बड़ा है। उसके नाम से तुम्‍हें हिट मिलती है। लिखो लिखो, खूब लिखो। तुम्‍हें मोहल्‍ले से निकाला, उसकी खुन्‍नस तुम जिंदगी भर निकालते रहोगे। सठ जाओगे बेटा, अविनाश से पार नहीं पाओगे।

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बेनामी Says....

tumhein sharm aati hai anup shukla? ye post hai comment karne layak? kyon apni khunnas mitaate rahte ho baar-baar? isse tumhari chhavi hi bigadti hai bhai? avinash to aise hamlon se ab tak patthar ho chuka hoga!

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कमलेश मदान Says....

पिनक वाले चाचा! नशेखोरी की पिनक में अपनी औकात को जाहिर कर दिये हो ,जानता हूँ आप कौन हो और कहाँ पर हो लेकिन ये भूल गये कि जिन लोगों को आप संघी और मोदी प्रशंसक बता रहे हैं उन्ही मुद्दों को उछालकर आज आप जैसे घटिया लोग हवा में उड़ रहे हैं

और दूसरी बात मैने तो जरा चोकोटी काटी है अविनाश बाबू की ! आप को मिर्ची क्यों लग रही है ? आप जैसे चमचा टाइप लोग नाम भी बदल लें लेकिन अपनी औकात तो नहीं बदल सकते ना.

मैने आज के लेख में ये भी कहा है कि कभी शेरदिल लोगों से पाल पड़ता है तो क्यों मिमिया जाते हो अगर इतना ही दम है तो सामने आओ ना!
जिसको बेटा कह कर पुचकार रहे हो हो सकता है वो बाप से बड़ा निकले....

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जी हां हुजूर, मैं पिनक बेचता हूं Says....

बेटा मैदान, तुम तो बेनामियों पर भड़क उठे। अविनाश बाबू पर तो सबसे अधिक बेनाम हमले होते हैं, वो तो कभी नहीं बिलबिलाते। कुछ सीख लो भाई।

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कमलेश मदान Says....

अरे! आप फ़िर आ गये पिनक वाले चचा, लगता है आप सभी लोगों की नींद सी उड़ गयी है इस लेख को पढकर क्योंकि इसमें आप जैसे धूर्त लोगों पर कड़ा प्रहार जो किया है मैने.

बेनामी हो तभी तो भड़क रहा हूँ क्योंकि कम से कम मूर्खता का अवार्ड देना पड़े तो किसे दूंगा चचा! हाँ मेरा मोबाइल नं भी दिया हुआ है चाहो तो अपना इनाम कल कन्फ़र्म कर लेना, पते पर भेज दूंगा पिनक वाले चचा

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हम लतियाते है पिनकियो को Says....

काहे मदान जी ऐसे आदमी को नोटिस ले रहे हो जो पिनक (थूक) उठाता फ़िरता है अट्ठनी समझ के :)इसको तो दर्द होना ही था आखिर ये अविनाश की हरामी टोली की पैदाईश है ना गांजा पट्टी से :)

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हम जुतियाते हैं पिनकियों को Says....

अविनाश का नाम बड़ा है! चार अक्षर का तो नाम है. बड़ा तो नहीं है.

पिनक बेचने वाले भाई साहब, गलतफहमी को पीछे फेंकिये. अविनाश जैसे लोग भारत के हर पचास स्क्वायर मीटर में मिलते हैं. ये नाम बड़ा की गलतफहमी मत पालिए. वैसे गलती आपकी भी नहीं है. पहले कुएं में मेढक रहते थे. आजकल चूहे भी रहते हैं.

जिसके साथ आप ये कह कर सहानुभूति दिखा रहे हैं कि उसे सबसे ज्यादा बेनामी कमेंट झेलने पड़ते हैं, तो आप को भी मालूम है कि उसके ब्लॉग पर सबसे ज्यादा बेनामी कमेंट तो उसी के लिखे हुए रहते हैं.

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Upadhyayjee Says....

अविनाश को आइना दिखाने के लिए धन्यवाद. पता नहीं उसका क्या प्रॉब्लम है जो वो हमेशा आग उगलते रहता है. आपकी ये बात अच्छी लगी "क्योंकि कभी आपको मौलिक लिखे नहीं देखा कभी किसी की गजल,किसी सूफ़ी संत का गाना,उधार के लेख ही लिखे पाया". पिछली बार भी देखे थे वो रवीश के जाती की दावा कॉपी कर के वाह वाही लुट रहा था जबकि रवीश नो वो पोस्ट डिलीट कर दिया था. उनको संपादक की कैंची का ध्यान से अध्ययन करना चाहिए और अपने लेखनी और ब्लॉग्गिंग में उसका पूरा ध्यान देना चाहिए. अविनाश के लिए एक सन्देश है की भाषा पर कण्ट्रोल का मतलब ये नहीं है की आप जनमानस का खयाल किये बिना कुछ भी लिखते रहिये. तुतापुन्जिये लेखकों को पता नहीं क्यों ऐसा लगता है की जबतक की वो विश्फोटक नहीं लिखेंगे उनकी लेखनी अधूरी रह जाती है. अविनाश को आइना में मुह देखने के बाद एक लैटर ऑफ़ नोट भेजना चाहिए संपादक महोदय को की आपने मेरी आँख खोल दी.

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जी हां हुजूर, मैं पिनक बेचता हूं Says....

कमलेश मैदान, तो उपाध्‍यायजी जैसे लगुओं-भगुओं को तुम भी जुटा ही लिये? अविनाश के भी कई लगुए-भगुवे हैं - तुम्‍हारे भी होने लगे - अच्‍छा है, अविनाश पर और लिखो।

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बेनामी Says....

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Donald Duck